हर माह अवैध वसूली—पोषाहार सामग्री का निजी उपयोग—सहायिकाओं को धमकाने के आरोप
लखनऊ/बाराबंकी: महिला एवं बाल विकास विभाग (Women and Child Development Department) की ज़मीनी हकीकत एक बार फिर कटघरे में है। बाराबंकी जिले में तैनात क्षेत्रीय मुख्य सेविका नीतू सिंह के भ्रष्टाचार (corruption) और अभद्र व्यवहार से आंगनबाड़ी कार्यकर्त्रियों व सहायिकाओं में भारी आक्रोश है। आरोप है कि मुख्य सेविका हर महीने आंगनबाड़ी कार्यकर्त्रियों से अवैध वसूली करती हैं और पोषाहार सामग्री को अपने निजी उपयोग में लाती हैं। वहीं विभागीय अधिकारी पिछले कई वर्षों से चली आ रही इस अनियमितता पर कार्रवाई करने के बजाय चुप्पी साधे हुए हैं।
विश्वस्त सूत्रों के अनुसार कुपोषित बच्चों, गर्भवती व प्रसूता महिलाओं के लिए भेजी गई पोषाहार सामग्री—तेल, बेसन, दाल आदि—मुख्य सेविका नीतू सिंह के किचन तक पहुंच रही है। कुछ नजदीकी लोगों ने उनके किचन से सामग्री के फोटो भी कैप्चर किए हैं, जो गंभीर अनियमितता और अमानत में खयानत का मामला बनता है। स्थानीय समाजसेवियों ने इसकी उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। आंगनबाड़ी कार्यकर्त्रियों का आरोप है कि मुख्य सेविका हर महीने 300 से 1000 रुपये तक की अवैध वसूली करती हैं। विरोध करने पर कार्यकर्त्रियों को सेवा से हटाने, मानदेय रोकने तथा अभद्र भाषा में बात करने की धमकी दी जाती है।
नीतू सिंह का विवादों से पुराना रिश्ता रहा है। जब वे बहराइच जिले में तैनात थीं, तो:बलहा के उप प्रमुख ने उनके व्यवहार पर कड़ी आपत्ति जताई थी। मालती नामक कार्यकर्त्री ने लिखित शिकायत कर हर माह 1000 रुपये वसूली का आरोप लगाया था। आंगनबाड़ी कर्मचारी संघ बहराइच की जिलाध्यक्ष किरण पाठक ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती को पत्र लिखकर व्यापक भ्रष्टाचार की शिकायत की थी। नीतू सिंह के कथित तौर पर कुछ अराजक तत्वों से संबंध होने के चलते अधिकारी भी कार्रवाई से कतराते थे।
वर्ष 2008 में निदेशालय स्तर पर अपर निदेशक जे.बी. सिंह ने उनसे आख्या मांगी थी। परिणामस्वरूप उनका तबादला बाराबंकी किया गया। लेकिन फतेहपुर तहसील हो या अब ताजा तबादला सूरतगंज, उनके कामकाज में कोई सुधार नहीं आया। आरोप है कि नीतू सिंह बाराबंकी में रात्रि विश्राम न कर लखनऊ से अप-डाउन करती हैं, जिससे परियोजना क्षेत्रों का निरीक्षण प्रभावित होता है।
कार्यकर्त्रियों का आरोप है कि क्षेत्र भ्रमण भी वह एक मुबीन नामक व्यक्ति के साथ करती हैं और उसी के जरिए कार्यकर्त्रियों को धमकाया जाता है। पोषाहार सामग्री लाभार्थियों तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच रही, कार्यकर्त्रियां मानसिक दबाव में कार्य कर रही हैं, परियोजना का प्रभाव घट रहा है, सरकारी धन का दुरुपयोग हो रहा है, प्रबुद्धजन इसे बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य के साथ सीधी लापरवाही मानते हैं।


