कफ सिरप कांड की ‘जेल कनेक्शन’ से सनसनी, बाहुबलियों की परछाइयों में पल रहे वार्डर की पोल खुली

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मॉडल जेल में मचा हड़कंप, गिरफ्तारियों, पैसों के लेनदेन और लग्जरी कारों की गूंज ने पूरे विभाग को झकझोरा

लखनऊ| चर्चित कफ सिरप कांड की परतें अब इतनी गहरी हो चुकी हैं कि उसकी स्याही सीधे जेल की दीवारों तक फैल गई है। एसटीएफ के बर्खास्त सिपाही और कांड के मुख्य आरोपी आलोक सिंह के बेहद करीबी जेल वार्डर महेंद्र प्रताप सिंह की संदिग्ध हरकतें सामने आने के बाद पूरे जेल प्रशासन में हड़कंप मचा हुआ है।
डीजी जेल पी.सी. मीना ने शनिवार रात ही तत्काल प्रभाव से निलंबन का आदेश जारी किया और रविवार सुबह होते-होते आरोपी वार्डर के घर पर निलंबन आदेश चस्पा कर दिया गया। इससे मॉडल जेल के भीतर अफसरों और कर्मचारियों में भारी खलबली मच गई, क्योंकि यह मुद्दा सिर्फ कदाचार का नहीं, बल्कि अपराधियों से गठजोड़ का खुला प्रमाण बनकर उभरा हैअंबेडकरनगर निवासी महेंद्र प्रताप सिंह की तैनाती लखनऊ की आदर्श कारागार (मॉडल जेल) में है, लेकिन उसके रिश्तों की जड़ें राजधानी की जेल से कहीं बाहर और कहीं ज्यादा गहरी हैं। सूत्रों का कहना है कि महेंद्र एक बाहुबली पूर्व सांसद का बेहद भरोसेमंद और रोजमर्रा के कामों में सक्रिय ‘दाहिना हाथ’ माना जाता है। यही नहीं, उसका बर्खास्त सिपाही आलोक सिंह से भी इतना करीबी रिश्ता है कि दोनों के बीच वर्षों से चल रही दोस्ती अब जांच एजेंसियों की नजरों में एक बड़े गठजोड़ के रूप में उभर रही है।
गौरतलब है कि आलोक सिंह इस समय मॉडल जेल के ठीक पीछे स्थित जिला जेल में बंद है।शनिवार शाम सोशल मीडिया पर एक साथ कई फोटो और वीडियो वायरल हुए, जिनमें महेंद्र प्रताप सिंह कफ सिरप कांड के मास्टरमाइंड शुभम जायसवाल और गिरोह के अन्य सदस्यों के साथ नजर आ रहा है। वीडियो जितना आगे बढ़ा, मामला उतना गंभीर होता गया। जिस तरह से दृश्यों में आपसी निकटता, मेलजोल और बार-बार की मुलाकातें दिखीं, उससे जेल विभाग तक मामला तुरंत पहुंचा। डीजी जेल ने बिना देरी किए कार्रवाई के आदेश दिए।मॉडल जेल के प्रभारी अधीक्षक राजेश पांडेय ने निलंबन की संस्तुति मुख्यालय भेजी और शनिवार देर रात ही वरिष्ठ अधीक्षक मुख्यालय शशिकांत सिंह ने महेंद्र का निलंबन आदेश जारी कर दिया।
निलंबन आदेश में दर्ज किए गए आरोपों से विभाग सन्न रह गयाl
महेंद्र की पत्नी के बैंक अकाउंट में आरोपी आलोक सिंह द्वारा लाखों रुपये का सीधा लेनदेन,वार्डर का शुभम जायसवाल गैंग की 9777 सीरीज वाली सफेद लग्जरी एसयूवी में घूमना,और अपराधी गिरोह से लगातार संपर्क में रहना।
इन आरोपों ने साफ संकेत दिया है कि कफ सिरप कांड की ‘जड़’ जेल की चौकियों, बैरकों और अधिकारियों के बीच तक फैल चुकी थी।वरिष्ठ अधीक्षक की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि वार्डर और मुख्य आरोपी के बीच संपर्क होने की बातें बेहद गंभीर हैं। विभागीय जांच तेज की गई है और दोषी पाए जाने पर कठोरतम कार्रवाई सुनिश्चित होगी।

बाहुबलियों से रिश्तों का पुराना इतिहास महेंद्र की ‘काली डायरी’ खुली तो परत दर परत रहस्य सामने आए

निलंबित जेल वार्डर महेंद्र प्रताप सिंह की कहानी सिर्फ एक आरोपी वार्डर की नहीं, बल्कि बाहुबलियों की छाया में पला-बढ़ा नेटवर्क है।
उन्नाव जिला जेल में तैनाती के दौरान वह कुख्यात बाहुबली पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के बेहद नजदीक हो गया था। सेंगर के जेल जाने के बाद महेंद्र की नजदीकियां धीरे-धीरे पूर्वांचल के एक और बड़े बाहुबली पूर्व सांसद से बढ़ने लगीं।
कुछ ही वर्षों में उसने अपराधियों, बाहुबलियों और जेल के भीतर-बाहर की ‘सिस्टम लाइनों’ में इतना गहरा दखल बना लिया कि वह खास संदेश, अंदरूनी सौदे और मुलाकातों का सेतु बन गया।
अब सोशल मीडिया पर महेंद्र की पूर्व सांसद, आलोक सिंह, शुभम जायसवाल और अमित सिंह टाटा के साथ रीलें, फोटो और लाइव वीडियो धड़ाधड़ वायरल हो रहे हैं, जो उसकी अंदरूनी सक्रियता की परतें उजागर कर रहे हैं।
हर वायरल वीडियो इस बात का प्रमाण है कि महेंद्र सिर्फ एक जेल वार्डर नहीं था, बल्कि बाहुबलियों और अपराधियों के बीच एक ‘कड़ी’, एक ‘फिक्सर’ और एक ‘सिस्टम हैंडलर’ की भूमिका निभा रहा था।

जांच एजेंसियों की नजर अब सिर्फ महेंद्र पर नहीं, पूरी ‘जेल लिंक चेन’ पर

कफ सिरप कांड पहले ही उत्तर प्रदेश में एक बड़ी आपराधिक साजिश के रूप में सामने आ चुका है। अब जेल वार्डर महेंद्र प्रताप सिंह का नाम उस नेटवर्क में जुड़ने से यह साफ हो गया है कि कांड के आरोपी जेल में भी सहज सुविधाएं पा रहे थे,
पैसों का आदान-प्रदान जेल कर्मचारियों के माध्यम से हो रहा था,
और गिरोह की गतिविधियां जेल के भीतर-बाहर सक्रिय थीं।अब जांच सिर्फ महेंद्र तक सीमित नहीं रहने वाली।जेल प्रशासन, पुलिस विभाग और एसटीएफ मिलकर यह पता लगाने में जुटे हैं कि इस पूरे मामले में और कौन-कौन शामिल था।
कफ सिरप कांड की आग जेल की दहलीज तक पहुंच चुकी है—और अब विभाग की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस ‘अंदरूनी गठजोड़’ की जड़ें आखिर कितनी गहरी हैं।

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