शरद कटियार
भारत में 07 दिसंबर को मनाया जाने वाला सशस्त्र सेना झंडा दिवस सिर्फ एक दिन का कार्यक्रम नहीं है। यह वह दर्पण है, जिसमें देश अपनी जिम्मेदारियों, अपनी कृतज्ञता और अपनी कमजोरियों—तीनों को साफ-साफ देख सकता है।
आज जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने सरकारी आवास 5-कालिदास मार्ग पर फ्लैग पिन और स्मारिका का विमोचन किया, तब यह दृश्य सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था। यह संदेशों से भरा क्षण था—सम्मान का, अनुशासन का और नागरिक कर्तव्य का।
लेकिन एक कठिन सवाल भी उतनी ही शिद्दत से खड़ा होता है—
क्या हम अपने सैनिकों के साथ न्याय कर पा रहे हैं?
भारत का सैनिक सिर्फ सीमा पर खड़ा एक जवान नहीं। वह देश की आत्मा है।
जब वह -30 डिग्री तापमान में Siachen में खड़ा होता है, या थार की तपती रेत में पेट्रोलिंग करता है, या आतंकवाद की गोलियों के बीच खड़ा रहता है—तब उसका बलिदान किसी राजनेता की प्रशंसा या किसी विभाग के बजट की मोहताज नहीं होता।
पर विडंबना यह है कि सैनिकों का मुद्दा अक्सर राजनीति की सहूलियत के हिसाब से उठाया जाता है।
सत्ता में बैठे लोग फ्लैग डे पर फोटो खिंचवाते हैं, ट्वीट करते हैं, स्मारिका का विमोचन करते हैं—लेकिन
शहीद के परिवार को मिलने वाली आर्थिक सहायता महीनों फाइलों में अटकी रहती है।
पूर्व सैनिक अस्पतालों की दशा आज भी सुधार का इंतजार कर रही है।
OROP (वन रैंक, वन पेंशन) का मुद्दा आज भी पूरी तरह समाधान से दूर है।
क्या यह देश के सैनिकों के साथ न्याय है?
सशस्त्र सेना झंडा दिवस का मूल उद्देश्य यह था कि देशवासी फ्लैग खरीदकर अपना योगदान पूर्व सैनिकों और शहीद परिवारों के कल्याण को दें।
लेकिन वास्तविकता यह है कि
अधिकांश नागरिकों को पता ही नहीं कि यह धन कहाँ जाता है, कैसे उपयोग होता है, और कितना पारदर्शी है?
सैनिक कल्याण बोर्ड की कई योजनाएँ कागज़ पर बेहतर दिखती हैं, पर उनके लाभार्थियों तक पहुंचने की गति निराशाजनक है।
यह दिन सिर्फ सेना के प्रति सम्मान नहीं, बल्कि सिस्टम के लिए एक चेतावनी है कि वह सैनिकों की समस्याओं को ‘रूटीन फाइल वर्क’ समझना बंद करे।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हमेशा से सैन्य परंपराओं को सम्मान दिया है।
UP में सैनिक स्कूलों का विस्तार, शहीद परिवारों को आर्थिक सहायता, और सैन्य भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार—यह अच्छी पहलें हैं।
परंतु, चुनौतियाँ इतनी बड़ी हैं कि केवल घोषणाएँ पर्याप्त नहीं।
प्रदेश में हजारों पूर्व सैनिक गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं, पर उन्हें समय पर सैन्य स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं मिल पातीं।
कई शहीद परिवार आज भी पेंशन या सरकारी नौकरी के इंतजार में हैं।
और कई जवान घर लौटते हैं PTSD (मानसिक आघात) के साथ—जिस पर सरकारी व्यवस्था का फोकस लगभग शून्य है।
फ्लैग डे पर विमोचन और प्रतीकात्मक आयोजन महत्वपूर्ण हैं,
लेकिन सैनिकों की समस्याओं के लिए 365 दिनों की जवाबदेही उससे कहीं अधिक जरूरी है।
हम अक्सर कहते हैं—
“सैनिक हमारी ढाल हैं।”
पर यह ढाल किस कीमत पर बनी रहती है?
एक सैनिक अपने परिवार के त्योहार मिस करता है, बच्चों की जन्मदिन पार्टियाँ छोड़ता है, शादी-ब्याह में नहीं जा पाता—और कई बार अपने बच्चों को आखिरी बार देख भी नहीं पाता।
इसके बदले में समाज की जिम्मेदारी सिर्फ भावुक पोस्ट करना नहीं।
समाज को यह समझना होगा कि सैनिकों की समस्याएँ सिर्फ सेना की नहीं, पूरे राष्ट्र की समस्याएँ हैं।
यदि राष्ट्र वास्तव में सैनिकों का ऋणी है, तो उसके सम्मान को दिनों में नहीं, व्यवस्था में उतारना होगा।
इसके लिए कुछ निर्णायक कदम अनिवार्य हैं— सैनिक कल्याण फंड का पूर्ण ऑडिट और पारदर्शिता, शहीद परिवारों की सहायता को ‘अधिकार’ बनाया जाए, ‘कृपा’ नहीं, पूर्व सैनिकों के लिए मानसिक स्वास्थ्य केंद्र, सैनिक अस्पतालों के लिए राज्य और केंद्र दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी, OROP का शत-प्रतिशत, गैर-राजनीतिक समाधान, जवानों के परिवारों के लिए विशेष शिक्षा और रोजगार मॉडल तैयार हो।
यदि ये बदलाव आते हैं, तभी झंडा दिवस अपने उद्देश्य को पूरा करेगा।
इस सशस्त्र सेना झंडा दिवस पर यूथ इंडिया स्पष्ट कहना चाहता है सैनिक सम्मान कुछ घंटों का कार्यक्रम नहीं, बल्कि यह एक राष्ट्र की रीढ़ की मजबूती का पैमाना है।
हम सैनिकों को झंडा लगाकर नहीं, उनके अधिकारों की लड़ाई लड़कर सम्मानित करते हैं।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि जो जवान अपना आज कुर्बान कर देता है, हमारा कल सुरक्षित करने के लिए उसे सिर्फ सलामी नहीं, सुरक्षा, सम्मान और न्याय भी मिलना चाहिए।
सशस्त्र सेना झंडा दिवस : सैनिक सम्मान की राजनीति नहीं, ज़मीनी हकीकत की मांग


