लखनऊ| प्रदेश में नशीले कफ सिरप सिंडीकेट की परतें एक-एक कर खुल रही हैं और अब जांच की आंच एबॉट फॉर्मास्युटिकल कंपनी तक पहुंच गई है। जानकारी के अनुसार, सहारनपुर के विभोर राणा को कोलकाता में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बावजूद कंपनी ने उसके करीबी लोगों की फर्मों को दो बार सुपर डिस्ट्रीब्यूटर बना दिया। यूपी एसटीएफ और एफएसडीए की कड़ी कार्रवाई के बाद जब यूपी और उत्तराखंड में उनका माल बिकना बंद हुआ, तो कंपनी ने करीब 100 करोड़ रुपये का कफ सिरप वापस लेकर उसे रांची के शुभम जायसवाल की फर्म शैली ट्रेडर्स को बेच दिया।
अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) कंपनी की इन संदिग्ध गतिविधियों पर कानूनी शिकंजा कसने की तैयारी कर रहा है। ईडी जल्द ही कंपनी को नोटिस भेजकर यह पूछताछ करेगी कि सिंडीकेट से जुड़ी फर्मों को सिरप सप्लाई देने का आदेश किन अधिकारियों ने जारी किया था। जांच से यह भी साफ हो चुका है कि दिल्ली के अभिषेक शर्मा की फर्म एबी फॉर्मास्युटिकल्स और रांची की फर्म शैली ट्रेडर्स को भेजा जाने वाला फेंसेडिल सिरप तस्करी कर बांग्लादेश भेजा जा रहा था। कंपनी द्वारा यह सिरप हिमाचल प्रदेश के बद्दी प्लांट में तैयार किया जा रहा था, जिसका उत्पादन दिसंबर 2024 से बंद कर दिया गया था।
ईडी यह भी खंगाल रही है कि पिछले दस वर्षों में कंपनी ने किन-किन को सुपर डिस्ट्रीब्यूटर नियुक्त किया और किन व्यक्तियों के माध्यम से कफ सिरप निर्माण का काम कराया गया। कई जगह छापों के दौरान खुलासा हुआ कि छोटे-छोटे परिसरों में अवैध रूप से कफ सिरप तैयार किया जा रहा था—गाजियाबाद में तो पेंट की दुकान में मिनी फैक्ट्री पकड़ी गई थी।
सिंडीकेट को आर्थिक और कागजी मदद देने वाले तीन चार्टर्ड अकाउंटेंट भी ईडी के रडार पर हैं। वाराणसी के तुषार और विष्णु अग्रवाल पूर्वांचल में तस्करों की फर्मों का लेखा-जोखा संभालते थे, जबकि सहारनपुर के विभोर राणा से जुड़े मामलों में अरुण सिंघल मुख्य भूमिका निभा रहा था। इन सभी ने फर्मों के अकाउंट में बड़े स्तर पर हेराफेरी की, जिससे एजेंसियों को लंबे समय तक भनक नहीं लग सकी।
वहीं, नशे के कारोबार पर कार्रवाई को लेकर शासन की गंभीरता पर भी सवाल उठ रहे हैं। पिछले साल जहां नशे के खिलाफ एनकॉर्ड की चार बैठकें हुई थीं, वहीं इस वर्ष महज एक बैठक ही हो सकी। इतना बड़ा नेटवर्क सक्रिय रहने के बावजूद संयुक्त प्रवर्तन टीमों द्वारा कोडीनयुक्त कफ सिरप सिंडीकेट का सुराग न लगा पाना विभागीय कार्यशैली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।
एबॉट कंपनी की मिलीभगत से फूला-फला सिंडीकेट, 100 करोड़ का माल वापस लेकर रांची में खपाया
लखनऊl प्रदेश में नशीले कफ सिरप के गोरखधंधे ने उस समय बड़ा रूप लिया जब नामचीन एबॉट फॉर्मास्युटिकल कंपनी खुद इस पूरे सिंडीकेट की सहयोगी निकली। जांच में खुलासा हुआ कि सहारनपुर निवासी कुख्यात तस्कर विभोर राणा की गिरफ्तारी के बावजूद कंपनी ने उसके नज़दीकी लोगों के नाम खोली गई दो संदिग्ध फर्मों—दिल्ली की एबी फॉर्मास्युटिकल्स (अभिषेक शर्मा) और रांची की शैली ट्रेडर्स (शुभम जायसवाल)—को सुपर डिस्ट्रीब्यूटर बना दिया।
जब यूपी एसटीएफ और औषधि विभाग की कार्रवाई तेज हुई और यूपी-उत्तराखंड में कंपनी का माल बिकना बंद हुआ, तब एबॉट ने लगभग 100 करोड़ रुपये का सिरप वापस लेकर उसे रांची की शैली ट्रेडर्स में खपा दिया। यह सौदा खुद इस बात का प्रमाण है कि कंपनी को माल के गलत हाथों में जाने की जानकारी थी, फिर भी सिंडीकेट को खड़ा रखने की हर कोशिश की गई।
ईडी अब कंपनी के इसी ‘खेल’ पर शिकंजा कसने जा रही है। जल्द ही कंपनी के उन अधिकारियों से जवाब-तलब किया जाएगा जिन्होंने सिंडीकेट की फर्जी फर्मों को फेंसेडिल सप्लाई का आदेश दिया।
पुलिस जांच में पुख्ता हुआ है कि एबी फॉर्मास्युटिकल्स और शैली ट्रेडर्स को भेजा जाने वाला फेंसेडिल कफ सिरप बांग्लादेश में तस्करी होकर पहुंचता था। यह सिरप हिमाचल प्रदेश के बद्दी स्थित एबॉट प्लांट में बनता था, जिसका उत्पादन दिसंबर 2024 में रोक दिया गया।
जांच एजेंसियों को यह भी पता चला है कि बीते 10 वर्षों में कंपनी ने कितने सुपर डिस्ट्रीब्यूटर नियुक्त किए और किन-किन को उत्पादन का ठेका दिया। कई स्थानों पर छापों में सामने आया कि छोटे-छोटे परिसरों—यहां तक कि गाजियाबाद में पेंट की दुकान—में अवैध रूप से कोडीनयुक्त सिरप बनाया जा रहा था।
सिंडीकेट के तीन सीए भी ईडी के रडार पर
इस अवैध कारोबार को बचाने में तीन चार्टर्ड अकाउंटेंट भी आगे रहे। वाराणसी के तुषार और विष्णु अग्रवाल पूर्वांचल में तस्करों की फर्मों के खातों को ‘साफ’ कर रहे थे, जबकि अरुण सिंघल सहारनपुर के विभोर राणा और उसके नेटवर्क की फर्मों का हिसाब-किताब संभालता था। इन तीनों ने फर्जी लेन-देन और अकाउंट में अदल-बदल कर एजेंसियों की नजर से तस्करों को बचाने की कोशिश की।
शासन की लापरवाही ने बढ़ाया नशे का कारोबार
सबसे हैरानी की बात यह है कि नशा रोकथाम की शीर्ष कमेटी एनकॉर्ड की पिछले वर्ष चार बैठकें हुईं, मगर इस वर्ष केवल एक बैठक हुई। इतने बड़े स्तर पर चल रहे कफ सिरप सिंडीकेट का सुराग तक न लगा पाना विभागीय प्रवर्तन टीमों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है, जबकि कई विभागों की संयुक्त टीमें नशे के कारोबार को तोड़ने के लिए बनाई जाती हैं।
प्रदेश में नशीले कफ सिरप का यह पूरा खेल सिर्फ तस्करों के कारण नहीं, बल्कि कंपनी–सिंडीकेट–अकाउंटेंट–सिस्टम की गठजोड़ का नतीजा है। अब जब ईडी ने मामला हाथ में लिया है, प्रदेश यह उम्मीद कर रहा है कि इस गंदे नेटवर्क का पूरा चेहरा बेनकाब होकर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित होगी।






