आंबेडकर परिनिर्वाण दिवस: दलित ओबीसी की लड़ाई को धार देने वाला दिन, अन्याय और संविधान से छेड़छाड़ पर करारी चेतावनी

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प्रशांत कटियार

आंबेडकर परिनिर्वाण दिवस सिर्फ श्रद्धांजलि का दिन नहीं, बल्कि वह दिन है जब हम उस आग को याद करते हैं जिसने सदियों से दलित और ओबीसी समाज को दबाए रखने वाली सोच को राख में बदल दिया। डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर वह नाम हैं जिन्होंने अन्याय को सीधी चुनौती दी, जातिगत घमंड को चकनाचूर किया और हर उस ताकत के खिलाफ खड़े हुए जो इंसान को इंसान नहीं मानती थी। आज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ स्थित आंबेडकर स्मारक स्थल पर श्रद्धांजलि अर्पित की, लेकिन असली सम्मान सिर्फ फूल चढ़ाने से नहीं, बल्कि उनके सिद्धांतों को जमीन पर लागू करने से मिलता है।
बाबा साहेब ने दलितों के दर्द को पढ़ा नहीं, उसे जिया। उन्होंने उस समाज को आईना दिखाया जो खुद को सभ्य कहता था, पर इंसानियत की परिभाषा तक नहीं समझता था। उनकी एक बात आज भी अत्याचारियों की रगों में तीखी चुभन की तरह उतरती है जो समाज इंसान को इंसान न समझे, वह समाज अपनी प्रगति पर शर्म करे। यह सीधी चोट उन लोगों पर थी जो सदियों से दलितों को पैरों तले रौंदते आए और आज भी बराबरी का नाम सुनकर तिलमिला उठते हैं।ओबीसी समाज के अधिकारों की वैचारिक नींव भी बाबा साहेब ने ही डाली थी। उन्होंने साफ कहा था कि जो वर्ग पिछड़ा है, उसे आगे बढ़ाना सरकार और समाज की जिम्मेदारी है। लेकिन यह बात उन लोगों को चुभती थी जो जन्म के आधार पर खुद को ऊँचा और दूसरों को नीचा मानते थे। आंबेडकर ने इस मानसिकता को तोड़कर समाज को बराबरी के रास्ते पर खड़ा किया और साबित किया कि शक्ति वंश से नहीं, संघर्ष से मिलती है।
संविधान बनाते समय बाबा साहेब ने दलितों और ओबीसी समाज को वह ढाल दी जिसकी वजह से आज भी हम अपने अधिकारों पर अडिग खड़े हैं समान अवसर, सम्मानजनक जीवन, भेदभाव विरोधी सुरक्षा और राजनीतिक भागीदारी। लेकिन आज वही संविधान, जिसकी नींव आंबेडकर ने सामाजिक न्याय के आधार पर रखी थी, उस पर लगातार चोट की जा रही है। नए नियमों और संशोधनों के नाम पर संविधान की आत्मा को कमजोर करने की कोशिशें हो रही हैं। आरक्षण की जड़ों पर वार किया जा रहा है, सामाजिक न्याय के प्रावधानों को धीरे धीरे खाली किया जा रहा है। यह प्रवृत्ति न सिर्फ दलित और ओबीसी समाज के लिए खतरा है, बल्कि आंबेडकर के सपनों पर सीधा प्रहार है।

आज का दिन चेतावनी भी है यदि हम खामोश रहे, तो वही ताकतें फिर से समाज को उसी अंधकार में धकेल देंगी जहाँ से बाबा साहेब ने हमें संघर्ष करके निकाला था। आंबेडकर ने कहा था कि संविधान तभी सुरक्षित है जब उसे लागू करने वाले ईमानदार हों। लेकिन आज जब सत्ता के गलियारों में संविधान को मोड़ने बदलने की होड़ लगी है, तो यह खतरे की घंटी है जिसे अनसुना करना आत्मघात होगा।
आंबेडकर परिनिर्वाण दिवस हमें यह याद दिलाता है कि बराबरी कोई दया नहीं यह हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।
और अधिकार लड़कर लिए जाते हैं, हाथ जोड़कर नहीं।
आज जरूरत है बाबा साहेब के उसी तेज़, कठोर और निर्भीक विचार को जिंदा रखने की, क्योंकि अन्याय के खिलाफ खड़े होना ही असली श्रद्धांजलि है।

लेखक दैनिक यूथ इंडिया के स्टेट हेड है।

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