लखनऊ| नेपाल के रास्ते भारत के खिलाफ आतंकी नेटवर्क खड़ा करने की एक खतरनाक साजिश का खुलासा हुआ है। आईएसआई तुर्किए के साथ मिलकर नेपाली युवाओं को टारगेट कर रही है—उन्हें पहले विदेश में नौकरी दिलवाकर धर्मांतरण कराया जा रहा है और फिर नेपाल लौटने पर ग्रामीण क्षेत्रों में धर्म प्रचार और नेटवर्क फैलाने की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है।
यह वही मॉड्यूल है जिसे बलरामपुर में पकड़ा गया छांगुर पीर और उसकी सहयोगी नीतू उर्फ़ नसरीन अपनाए हुए थे। दिल्ली में 9 सितंबर को पकड़ा गया नेपाल का आईएसआई एजेंट प्रभात कुमार चौरसिया भी इसी गिरोह का हिस्सा बताया जा रहा है। इसके बाद सुरक्षा एजेंसियाँ हाई-रिस्क एंट्री पॉइंट्स की लिस्ट को दोबारा अपडेट कर रही हैं।
यूएई में नौकरी, फिर धर्मांतरण — नेपाल में फैलाया जा रहा नेटवर्क
नेपाल सरकार की लेबर माइग्रेशन रिपोर्ट के अनुसार, हर महीने 66 हजार से अधिक नेपाली युवा विदेश जा रहे हैं। केवल फरवरी में 25,117 युवाओं ने यूएई के लिए वर्क परमिट लिया, जबकि दस महीनों में 1.75 लाख से अधिक युवा इस खाड़ी देश में पहुँचे।
एजेंसियों के मुताबिक, गुल्मी जिले के पाँच युवाओं ने यूएई में नौकरी के दौरान धर्म परिवर्तन कर लिया। वापसी के बाद वे भारत से सटे मधेश प्रदेश में धर्मांतरण और नेटवर्क विस्तार में जुटे हैं। इन्हें हर महीने विदेशी स्रोतों से भुगतान मिलता है।
भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की नज़र तराई इलाक़े पर
पूर्व आईबी अधिकारी संतोष सिंह के अनुसार ऐसे युवक किसी बड़े आतंकी हमले से पहले इंटेल प्री-कलेक्शन यानी जासूसी का काम करते हैं। कई की रिश्तेदारियाँ भारत में होने से वे संवेदनशील शहरों में सक्रिय होने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि नेपाल का तराई क्षेत्र अब भी भारतीय एजेंसियों के लिए बड़ा सुरक्षा खतरा बना हुआ है।
पुलवामा हमले और दिल्ली धमाकों की जांच में भी नेपाल लिंक सामने आया था। अब फिर से नेपाल में आईएसआई की गतिविधियाँ बढ़ी हैं, क्योंकि पाकिस्तान से सीधी घुसपैठ लगभग बंद है और कश्मीर में आतंकियों व टेरर फंडिंग पर सख्त अंकुश लगा है।
आईएसआई नेपाल के रास्ते धन, छोटे पैमाने पर विस्फोटक और आईईडी जैसे हथियार पहुँचाने की कोशिश कर रही है, हालांकि एसएसबी और यूपी एटीएस की सक्रियता के चलते उसे फिलहाल सफलता नहीं मिल पाई है।
यह खुलासा साफ़ दिखाता है कि नेपाल की आड़ लेकर सीमापार से भारत के खिलाफ एक नया आतंकी मॉड्यूल तैयार किया जा रहा है, जिसे समय रहते रोकना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती है।




