भारत रत्न,,देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान। सिद्धांत रूप से यह राष्ट्र के प्रति असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है, लेकिन व्यवहार में यह सम्मान अक्सर राजनीति, वोटबैंक और समीकरणों का मोहरा बनकर रह गया है। इसी संदर्भ में एक बड़ा प्रश्न बार-बार उठता है—क्या कारण है कि मंडल युग की धुरी रहे प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह आज भी भारत रत्न से वंचित हैं?
वी.पी. सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर भारतीय समाज में सामाजिक न्याय की एक ऐसी ऐतिहासिक रेखा खींची, जिसने सत्ता, समाज और राजनीति—तीनों को नई दिशा दी। लेकिन यही फैसला उन्हें अपने ही समाज में खलनायक बना गया। कहा जाता है कि बनारस में यज्ञ कराया गया कि वी.पी. सिंह “बीमार पड़ जाएं।” ऐसी प्रतिकूलता किसी भी राजनेता के लिए असामान्य थी, लेकिन सिंह जानते थे कि इतिहास उन्हें वहीं देखेगा, जहाँ राजनीति उन्हें नहीं देखने देती।
विडंबना यह है कि सामाजिक न्याय के लिए अपने समाज की नाराजगी झेलने वाले सिंह को वह समाज भी पूरी तरह नहीं अपनाता, जिसकी उन्नति के लिए उन्होंने सत्ता त्याग दी। यही वह दोहरी मार है जिसका सामना प्रगतिशील सवर्ण नेता अक्सर करते हैं—नेहरू हों या वी.पी. सिंह।
हमारा समाज अभी भी व्यक्ति के विचारों और योगदान को उसकी जाति की चौखट में कसकर मापता है। कई विश्वविद्यालयों में मंडल दिवस मनाया जाता है, लेकिन वी.पी. सिंह का नाम लेने में संकोच होता है—यह अतिवाद न केवल इतिहास के साथ अन्याय है, बल्कि सामाजिक न्याय की लड़ाई को भी कमजोर करता है।
वी.पी. सिंह का वह ऐतिहासिक कथन याद आता है,
“केंचुए को मरना पड़ता है तितली के जन्म के लिए।”
राजनीतिक नुकसान की कीमत पर भी सामाजिक न्याय का मार्ग चुनने वाले नेता विरले ही होते हैं।
तुलनाएँ भी परेशान करती हैं। जब प्रदेशीय नेताओं, खेल हस्तियों और सत्ता समीकरणों के अनुरूप लोगों को भारत रत्न मिल सकता है, तो सामाजिक न्याय की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ने वाले नेता को क्यों नहीं? क्या यह सम्मान योग्यता से तय होता है या चुनावी गणित से?
सच्चाई यह है कि यदि वी.पी. सिंह किसी पिछड़ी जाति से होते, तो शायद ओबीसी राजनीति में उन्हें उसी ऊँचाई पर रखा जाता जहाँ आज अंबेडकर हैं। लेकिन विडंबना देखिए—सामाजिक न्याय की राजनीति के स्वयंभू ठेकेदार भी उनकी विरासत का नाम लेना पसंद नहीं करते।
और आज वही ओबीसी नेतृत्व, जिसकी उन्नति की निर्णायक नींव वी.पी. सिंह ने रखी थी, वही शक्ति के लिए ऐसे समीकरणों में जा मिला है, जो मनुस्मृति की विचारधारा को पुनर्जीवित करने का आरोप झेलते हैं।
वी.पी. सिंह जैसे नेता सदियों में पैदा होते हैं—सत्ता त्यागकर सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले, अपने समाज की आलोचना झेलने वाले, और इतिहास को दिशा देने वाले।
इस देश में अक्सर कहा जाता है कि त्याग ही किसी को “भगवान” बनाता है। राम, कृष्ण और बुद्ध की परंपरा में अगर कोई आधुनिक राजनीतिक उदाहरण फिट बैठता है तो वह निश्चित ही वी.पी. सिंह का है—क्योंकि उन्होंने सत्ता को त्यागा, पर न्याय को नहीं।
आज समय है यह प्रश्न सीधे केंद्र की ओर उठाने का,क्या भारत रत्न का सम्मान अब भी राष्ट्रसेवा के आधार पर दिया जाता है, या वह भी राजनीतिक लाभ का एक उपकरण बन चुका है?
वी.पी. सिंह को भारत रत्न देना सिर्फ एक सम्मान नहीं होगा,
यह सामाजिक न्याय की उस लड़ाई को मान्यता देना होगा,
जिसके लिए उन्होंने स्वयं को इतिहास की कठोर आलोचनाओं के हवाले कर दिया।






