अयोध्या विवाद भले ही दशकों की कानूनी लड़ाई के बाद समाधान की ओर बढ़ चुका हो, लेकिन उससे जुड़े राजनीतिक विवाद आज भी उतने ही जीवंत हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का हालिया बयान इसी पुरानी बहस के दरवाज़े दोबारा खोलता दिख रहा है। सरदार पटेल की 150वीं जयंती के कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू बाबरी मस्जिद की मरम्मत सरकारी धन से करवाना चाहते थे और इसके लिए पटेल ने असहमति जताई थी।
यह दावा एक तरह से भारत के पहले प्रधानमंत्री की नीति और विचारधारा पर प्रश्नचिह्न लगाने का प्रयास प्रतीत होता है। लेकिन राजनीति में बयान जितना अहम होता है, उससे पैदा होने वाला विवाद उससे कहीं अधिक प्रभाव डालता है—और यही अब हो रहा है।
कांग्रेस ने राजनाथ सिंह के बयान को पूरी तरह झूठा और इतिहास-विरोधी बताते हुए कड़ा रुख अपनाया है। पार्टी के सांसद मणिकम टैगोर ने बेहद सटीक उदाहरण दिया—सोमनाथ मंदिर। यह वही स्थान है जिसकी पुनर्स्थापना जनता के चंदे से हुई थी और नेहरू ने स्पष्ट रूप से कहा था कि सरकार धार्मिक कार्यों में धन खर्च नहीं करेगी। यह तथ्य दर्ज इतिहास का हिस्सा है। ऐसे में यह सवाल वाजिब है कि जब नेहरू सोमनाथ के लिए सरकारी खर्च को स्वीकार नहीं कर सकते थे, तो बाबरी मस्जिद जैसी संरचना पर सरकारी धन देने की बात कैसे सोच सकते थे?
कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी “मनगढ़ंत इतिहास” के सहारे राजनीतिक लाभ लेना चाहती है। यह भी सच है कि बीते कुछ वर्षों में स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रनिर्माण से जुड़े कई स्थापित ऐतिहासिक प्रसंगों पर नई व्याख्याएँ सामने लाई गई हैं—जिन पर इतिहासकारों और विपक्ष की ओर से लगातार आपत्ति जताई जाती रही है।
राजनाथ सिंह ने अपने बयान में सोमनाथ और राम मंदिर दोनों के पुनर्निर्माण को “असली सेक्युलरिज़्म” का उदाहरण बताया। उनका तर्क यह है कि जब धार्मिक स्थल जनता के सहयोग और आस्था से पुनर्निर्मित होते हैं, तो राज्य का धर्मनिरपेक्ष चरित्र सुरक्षित रहता है। यह तर्क राजनीतिक रूप से प्रभावी हो सकता है, लेकिन इस पर भी दो विचार हो सकते हैं—क्या सरकार का धर्मनिरपेक्ष दायित्व केवल आर्थिक दूरी बनाए रखने तक सीमित है, या ऐतिहासिक तथ्यों की सही व्याख्या सुनिश्चित करना भी उसकी जिम्मेदारी है?
यह विवाद स्पष्ट संकेत देता है कि आने वाले समय में इतिहास और राजनीति की यह खींचतान और तेज़ होगी। नेहरू, पटेल, अयोध्या और बाबरी—ये शब्द भारतीय राजनीति के वे अध्याय हैं जिनकी आँच चुनावी राजनीति में बार-बार महसूस की जाती है।
पर एक बड़ा सवाल यह भी है:
क्या लोकतांत्रिक विमर्श में इतिहास बार-बार नया रूप लेता रहेगा, या हम तथ्य और राजनीति के बीच एक संतुलन खोज पाएँगे?
संपादकीय दृष्टि से यह कहना गलत नहीं होगा कि राजनीतिक लाभ के लिए इतिहास को बार-बार पुनर्परिभाषित करने का प्रचलन लोकतांत्रिक संवाद के लिए शुभ संकेत नहीं है। किसी भी राष्ट्र की नींव सत्य पर टिकी होनी चाहिए—चाहे वह कितनी भी असहज क्यों न हो।






