बचपन बनाम स्क्रीन: डिजिटल दुनिया की चमक के पीछे छिपता अंधेरा

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आज दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है। तकनीक के विस्तार ने जीवन को सुविधाओं से भर दिया है, लेकिन उसी तकनीक ने हमारी नई पीढ़ी के सामने एक ऐसा संकट खड़ा कर दिया है, जिसके प्रभाव आने वाले वर्षों में और गहरे दिखाई देंगे। आज का बच्चा मिट्टी की खुशबू, दोस्तों की शरारतें और परिवार का स्नेह छोड़कर स्क्रीन की चमक में अपना बचपन गुज़र रहा है। जिस उम्र में कागज़ की पतंग उड़नी चाहिए थी, वहाँ अब मोबाइल की स्क्रीन पर वर्चुअल गेम्स उड़ा रहे हैं।

बच्चों का स्क्रीन-निर्भर जीवन अब केवल एक आदत नहीं रहा, यह गहरे पैठ चुका डिजिटल नशा बन चुका है। सुबह से रात तक, जागने से सोने तक, उनकी हर गतिविधि मोबाइल से जुड़ गई है। यह निर्भरता केवल उनके मनोरंजन को नहीं बदल रही, बल्कि उनके मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास को भी प्रभावित कर रही है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह डिजिटल लत बच्चों को वास्तविक दुनिया से काट रही है। घर में रहते हुए भी वे परिवार से दूर हैं। खेल का मैदान अब गेमिंग स्क्रीन बन चुका है और दोस्त अब ऑनलाइन चैट का एक यूज़रनेम। बच्चों की मासूम बातचीत, हँसी और सामाजिक कौशल धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं।

रील्स और शॉर्ट वीडियो की तेज़ गति ने बच्चों के दिमाग की स्वाभाविक ध्यान देने की क्षमता को कमजोर कर दिया है। कुछ सेकंड के वीडियो देखने के आदी हो चुके बच्चे किसी भी कार्य या अध्ययन पर लंबे समय तक ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे। यह प्रवृत्ति भविष्य में उनके आत्मविश्वास, प्रदर्शन और मानसिक स्थिरता के लिए खतरा बन सकती है।

यह बदलाव केवल बच्चों तक सीमित नहीं है। परिवारों की संरचना, संवाद और भावनात्मक रिश्ते भी इस डिजिटल संक्रमण के सबसे बड़े शिकार बने हैं। पहले की पीढ़ियाँ अपने परिवार के साथ बैठकर दिनभर के अनुभव साझा करती थीं। दुख हो या खुशी—घर ही वह जगह था जहाँ भावनाएं दोगुनी या आधी होती थीं। लेकिन अब दृश्य उलट चुका है। परिवार साथ होकर भी दूर है, क्योंकि हर व्यक्ति अपने-अपने मोबाइल में कैद है।

हम अपनी खुशियाँ साझा नहीं करते, दिखावा करते हैं। वास्तविक मुस्कुराहट की जगह “फिल्टर वाली मुस्कुराहट” ने ले ली है। सच्चे संवाद की जगह “स्टोरी अपडेट” ने। यह परिवर्तन न केवल बच्चों में, बल्कि पूरे समाज में भावनात्मक दूरी पैदा कर रहा है।

इसी डिजिटल संकट को समझते हुए दुनिया के कई देश बच्चों की सुरक्षा को लेकर कदम बढ़ाने लगे हैं। इसी दिशा में ऑस्ट्रेलिया ने दुनिया का ध्यान खींचने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला लिया है। ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर सख्त प्रतिबंध लागू कर दिया है। यह केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को डिजिटल खतरों से बचाने की एक गंभीर चेतावनी है।

दिसंबर 2025 से लागू होने वाले इस कानून के तहत टिकटॉक, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसी कंपनियों को 16 वर्ष से कम उम्र के उपयोगकर्ताओं के अकाउंट हटाने या निष्क्रिय करने होंगे। प्लेटफॉर्म्स को पालन के लिए एक वर्ष की समयसीमा दी गई है। इस प्रतिबंध का उद्देश्य स्पष्ट है—बच्चों को साइबरबुलिंग, ग्रूमिंग, हानिकारक सामग्री और मानसिक तनाव जैसे खतरों से बचाना।

फैसले के पक्ष और विपक्ष दोनों हैं। आलोचक कह रहे हैं कि यह डिजिटल स्वतंत्रता पर रोक है, जबकि समर्थक इसे ‘मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा’ की दिशा में दुनिया का पहला ठोस कदम मान रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया की सरकार साफ कह चुकी है—बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है, बाकी सब उसके बाद।

यदि यह मॉडल सफल होता है, तो यह आने वाले समय में कई देशों के डिजिटल सुरक्षा कानूनों का आधार बन सकता है। दुनिया भर में बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक सुरक्षा एक साझा मुद्दा बन चुका है। ऐसे में यह कदम वैश्विक नीति-निर्माण में बड़ा प्रभाव डाल सकता है।

आखिर में सवाल यही है—क्या हम अपनी नई पीढ़ी को स्क्रीन की गिरफ्त से बाहर निकाल पाएंगे? तकनीक को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, लेकिन उसके इस्तेमाल को संयमित और नियंत्रित अवश्य किया जा सकता है। माता-पिता, स्कूल, समाज—हर किसी की जिम्मेदारी है कि बच्चों को डिजिटल संतुलन सिखाएँ।

क्योंकि तकनीक चाहे कितनी भी जरूरी क्यों न हो, बचपन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है, और यदि हम आज नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल स्क्रीन की चमक में अपना असली जीवन गंवा देंगी।

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