
लखनऊ| के सुल्तानपुर रोड स्थित गुलजार उपवन में आयोजित राज्यस्तरीय ध्यान–योग कार्यक्रम केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं था, बल्कि यह आधुनिक जीवन की अनियंत्रित भाग-दौड़ के बीच मानसिक संतुलन खोजने की सामूहिक पुकार भी था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होना इस बात की पुष्टि करता है कि आध्यात्मिकता अब सिर्फ आध्यात्मिक संस्थानों का विषय नहीं रहा—यह राष्ट्र के सामाजिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर विमर्श बन चुका है।
राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन में जिस गहराई से आज की तकनीकी उन्नति के दुष्परिणामों पर प्रकाश डाला, वह हमारे समय की सच्चाई को बेहतरीन ढंग से अभिव्यक्त करता है। विज्ञान ने सुविधाएँ बढ़ाईं, परंतु मनुष्य के भीतर ईर्ष्या, अकेलापन, असुरक्षा और अविश्वास भी तेजी से बढ़े। प्रतिस्पर्धा ने रिश्तों को खोखला किया, और आभासी दुनिया ने व्यक्तिगत स्पर्श को कमजोर किया। ऐसे दौर में राष्ट्रपति का यह कहना कि “मेडिटेशन मन को साफ करता है और विचारों को स्वस्थ करता है”—सिर्फ एक आध्यात्मिक संदेश नहीं, बल्कि आधुनिक मनोविज्ञान की कसौटी पर खरा उतरने वाला वैज्ञानिक सत्य है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह कहना भी समीचीन है कि राजयोग समाज को सकारात्मक ऊर्जा देता है। वास्तव में, ध्यान—सिर्फ तनाव घटाने का साधन नहीं—यह व्यक्ति को आत्म-प्रबंधन सिखाता है। जहां युवा डिजिटल लत, अवसाद और मानसिक दबाव से जूझ रहे हैं, वहीं ध्यान मन को स्थिर कर नई दिशा देता है।
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने इसे एक जीवनशैली बताया—और यही दृष्टिकोण आज सबसे अधिक आवश्यक है। योग, ध्यान और आत्मचिंतन को केवल अवसरवादी गतिविधि न मानकर यदि हम इसे जीवन का हिस्सा बना लें, तो समाज में शांति, सहयोग और सहिष्णुता अपने आप बढ़ेगी।
गुलजार उपवन में हजारों लोगों की उपस्थिति, शांत संगीत, भजन और सामूहिक साधना का वातावरण यह दर्शाता है कि लोग आंतरिक शांति की तलाश में भटक नहीं रहे—वे समाधान की ओर बढ़ना चाहते हैं।
सवाल यही है कि क्या हमारा समाज, हमारी संस्थाएँ, और हमारी सरकारें इस दिशा में लगातार प्रयास करने को तैयार हैं?
ध्यान–योग न तो किसी मत का विषय है, न किसी वर्ग की वैचारिक सीमाओं में बंधा। यह मानव मन को संतुलित करने की प्रक्रिया है। जब राष्ट्र की प्रथम नागरिक स्वयं ध्यान को आधुनिक जीवन की अनिवार्यता बताएं, तो यह संदेश स्पष्ट है—
भारत को यदि तनावमुक्त, शांत और सकारात्मक समाज बनाना है, तो ध्यान और योग को जीवन का स्थायी हिस्सा बनाना ही होगा।
आज की तकनीकी उम्र में आध्यात्मिकता कोई विलासिता नहीं—यह समय की माँग है।






