विनय कपूर का विश्लेषण चर्चा में — सहयोगी संघवाद से लेकर वैश्विक लोकतांत्रिक मॉडल तक
विनय कपूर
भारतीय राजनीति में एक नया विमर्श तेजी से उभर रहा है, जिसे विश्लेषक “मोदी सिद्धांत” के नाम से देख रहे हैं। राजनीतिक लेखक विनय कपूर ने अपने लेख में दावा किया है कि 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल लोकतंत्र को मजबूत किया, बल्कि इसे नए आयाम भी दिए। उनके अनुसार, मोदी ने लोकतंत्र की जड़ों को गहराई तक ले जाकर “सहकारी संघवाद” की सोच को व्यवहारिक धरातल पर उतारा।
विनय कपूर लिखते हैं कि 2014 के बाद लोकतंत्र पहले से अधिक सक्रिय, फलने-फूलने वाला और सहभागी बन गया। राज्यों को अधिक अधिकार, नीति निर्माण में सहभागिता और केंद्र–राज्यों के बीच समन्वय—इसी मॉडल को “मोदी सिद्धांत” का केंद्रीय स्तंभ बताया गया है।
उनके अनुसार,“मोदी को 2025 में लोकतंत्र की आंख खोलने वाले नेता के रूप में याद किया जाएगा। उन्होंने लोकतंत्र को सिर्फ शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि सहभागिता की कला में बदल दिया है।”
वैश्विक स्तर पर ‘मोदी सिद्धांत’ की चर्चा
विनय कपूर का दावा और रोचक तब होता है जब वे कहते हैं कि आने वाले वर्षों में दुनिया के लोकतांत्रिक देश भारत के इस मॉडल को अपनाने का प्रयास करेंगे। यह सोच ‘लोकतांत्रिक हस्तक्षेप’ को नए अर्थों में परिभाषित कर सकती है।
कपूर लिखते हैं कि दुनिया भर के शिक्षण संस्थान भी जल्द ही अपने राजनीतिक अध्ययन पाठ्यक्रम में “Modi Doctrine” को शामिल कर सकते हैं, ताकि छात्रों को लोकतंत्र के सफल संचालन का नया व्यावहारिक मॉडल मिल सके।
अपने लेख को आगे बढ़ाते हुए वे दावा करते हैं कि अगर भविष्य में वैश्विक लोकतंत्रों का कोई नया दिशानिर्देशक सिद्धांत उभरता है, तो वह “मोदी सिद्धांत” हो सकता है। उनके मुताबिक,
“मोदी सिद्धांत भविष्य में नोबेल पुरस्कार का दावेदार बन सकता है।
विनय कपूर के इन विचारों ने राजनीतिक विश्लेषकों और शिक्षाविदों के बीच नई बहस को जन्म दिया है। समर्थक इसे भारत के उभार का वैश्विक संकेतक मान रहे हैं, जबकि आलोचक इसे अतिशयोक्ति बता रहे हैं। लेकिन यह स्पष्ट है कि “मोदी सिद्धांत” शब्द अब राजनीतिक शब्दावली में अपनी जगह बनाने लगा है।


