झूठ का साम्राज्य और कानून के सौदागर: फतेहगढ़ कचहरी के वकील अवधेश मिश्रा का ‘माफिया नेटवर्क’ बेनकाब

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– पत्रकार शरद कटियार ने मुख्यमंत्री से की SIT जांच की मांग — झूठे मुकदमों, रंगदारी और जमीन हड़पने की पूरी साजिश उजागर की
– सपा सरकार का संरक्षण प्रकार वकील अवधेश मिश्रा ने उन पर लिखाये थे तमाम गैंगरेप, बलात्कार, धारा 307 जैसे झूठे मामले
– उच्च न्यायालय में रखा जाएगा पूरा मामला

फर्रुखाबाद।
> “जब झूठ कानून का चेहरा पहन लेता है, तो सच को भी अपराधी बना दिया जाता है।”
फतेहगढ़ कचहरी के चर्चित वकील अवधेश मिश्रा अब कानून की नहीं, अपराध की पहचान बन चुके हैं।
उनके नेतृत्व में वकीलों, माफियाओं और परिजनों का ऐसा गिरोह सक्रिय है जो झूठे बलात्कार, गैंगरेप और पाक्सो एक्ट के मुकदमे दर्ज कराकर रंगदारी और संपत्ति हथियाने का कारोबार चला रहा है।
इस षड्यंत्र का शिकार हुए दैनिक यूथ इंडिया के मुख्य संपादक शरद कटियार ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेजे प्रार्थना पत्र में इस पूरे नेटवर्क का नाम-दर-नाम खुलासा किया है।
वकील अवधेश मिश्रा ने अपनी मांग पूरी न होने पर शरद कटियार और उनकी पत्नी श्रीमती रेनू कटियार को बर्बाद करने का षड्यंत्र रचा।
मिश्रा ने अपने प्रभाव और पैसों के बल पर एक “पारिवारिक नेटवर्क” को अपने गिरोह में शामिल किया —
इस गैंग के सक्रिय सदस्य हैं:
स्नेहलता गंगवार — वादीनी अर्पिता की मां,सुमन कटियार — वादीनी की मौसी,अर्पिता गंगवार (पत्नी सौरभ कटियार) — मुखौटे के रूप में प्रयुक्त की गई। उसका भाई
अमन गंगवार — स्नेहलता का पुत्र, दबाव बनाने में सक्रिय रहा।
आनंद मोहन कटियार — सुमन कटियार का पति, बैनामों में सहयोगी,लालजी कटियार पुत्र राजेंद्र —पत्नी की बुआ के बेटे को जमीन का हिस्सा दिलाने में शामिल किया गया।
महेश चंद्र कटियार एवं गीता देवी — निर्दोष होते हुए भी अभियुक्त बनाए गए रमेश चंद्र कटियार व श्रीमती शशि प्रभा — अर्पिता के ससुर-सास, जिनसे भी रंगदारी मांगी गई।
संजीव परिया —तत्कालीन फतेहगढ़ बार सचिव, फतेहगढ़ बाहर के तत्कालीन अनुशासन समिति के अध्यक्ष माफिया अनुपम दुबे,के इशारे पर अनूप सिंह अवनीश कुमार मिश्रा,अनिल सिंह — अवधेश मिश्रा के निकट सहयोगी, न्यायालय में वकालतनामा प्रस्तुत
इन सभी नामों का उल्लेख न्यायालयी अभिलेखों और प्रार्थना पत्र दोनों में किया गया है।
4 नवम्बर 2020 को जब अवधेश मिश्रा की ₹50 लाख की मांग नहीं मानी गई, तो उसने अर्पिता गंगवार से झूठा बलात्कार मुकदमा दर्ज कराया।
10 नवम्बर को वकील अवधेश मिश्रा के इशारे पर ज्योति नामक उसकी सहयोगी को आगे कर फिर फर्जी बलात्कार का आरोप लगाया गया।
13 नवंबर को वकील अवधेश मिश्रा ने शरद कटिहार को धमकाने के लिए अर्पिता के पति सौरभ कटियार से विधिक नोटिस दिलाया।
18 नवम्बर को पुलिस जांच में मामला झूठा साबित हुआ,
लेकिन 4 दिसम्बर 2020 को मिश्रा ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट फतेहगढ़ में गैंगरेप केस दाखिल करा दिया था।
इसमें न केवल पत्रकार शरद कटियार, बल्कि थाना प्रभारी कमालगंज अजय नारायण सिंह, उनके 5-6 सिपाही,साथ ही अर्पिता के चाचा ससुर महेश चंद्र कटियार और उनकी पत्नी गीता देवी तक को अभियुक्त बना दिया गया —
ताकि परिवार के सभी विरोधी कानूनी दलदल में फँस जाएं।
6 जनवरी 2021 को कोतवाली कन्नौज में झूठा अपराध संख्या 16/2021 के तहत पाक्सो एक्ट व छेड़खानी का झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया।
विवेचक कमल भाटी ने न तो शरद कटियार के और न उसे समय उनके साथ सुरक्षा में तैनात सरकारी गनर के बयान लिए,न ही अर्पिता की मेडिकल जांच कराई, और ना उम्र का सत्यापन चिकित्सा विभाग द्वारा कराया क्योंकि दबाव था, और दबाव वकील-माफिया गठजोड़ का था।
मुकदमे की आड़ में, अर्पिता गंगवार, उसकी मां स्नेहलता गंगवार, मौसी सुमन कटियार और भाई अमन गंगवार ने अपनी सगी मौसी रेनू कटियार की माँ 76 वर्षीय नानी श्रीमती शांति देवी को भ्रमित कर शरद कटियार को मुकदमे में फसाने के बाद 1 अप्रैल 2022 को कानपुर नगर की तहसील बिल्हौर के ग्राम रोगांव स्थित 0.2790 हेक्टेयर कृषि भूमि अपने नाम बैनामा करा ली।
इसके बाद कन्नौज जिले की सराय मीरा की कीमती 22 डिसमिल जमीन षड्यंत्र में शामिल लाल जी कटियार पुत्र राजेंद्र निवासी सराय मीरा को दी गई और बकाया दोनों बहनों यानी अर्पिता की मां स्नेह लता और मौसी सुमन ने पावर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से आपस में बाँट ली गई। पूरे खेल में लाल जी कटियार और अर्पिता के भाई अमन गंगवार का शातिर दिमाग पीछे था।
इन बैनामों में वकील अवधेश मिश्रा के संपर्क और कानूनी चालाकी का पूरा इस्तेमाल किया गया — और इसके एवज में करीब ₹50 लाख की राशि मिश्रा को दी गई।
जब शरद कटियार ने पाकसो के झूठे मुक़दमे को लेकर उच्च न्यायालय इलाहाबाद में याचिका संख्या 15073/2022 दायर की,
तो 22 सितम्बर 2022 को माननीय न्यायालय ने कन्नौज न्यायालय की चल रही कार्यवाही को स्थगित करने का आदेश पारित किया।
यह न केवल राहत थी, बल्कि यह साबित करने के लिए पर्याप्त था कि मामला गढ़ा गया था, न्याय नहीं था।
अब सवाल सिर्फ शरद कटियार का नहीं पूरी न्याय व्यवस्था का है
यह प्रकरण एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं, बल्कि उस सड़ी-गली मानसिकता का पर्दाफाश है,
जहाँ कानून को रोजगार और न्याय को मुनाफ़ा बना दिया गया है।
अगर एक पत्रकार को इस तरह झूठे मुकदमों में फँसाकर उसकी पत्नी की पैतृक भूमि तक हड़प ली जाती है,तो सवाल उठता है — फिर जनता का कौन बचेगा?मुख्यमंत्री से अपेक्षा है,अब यह न्याय नहीं, व्यवस्था की साख का सवाल है। इतना ही नहीं इस कहानी से पूर्व सपा सरकार के कार्यकाल में वर्ष 2015 से 17 तक सपा नेता समर्थक वकील अवधेश मिश्रा ने अपनी गैंग की सदस्य आशिया पुत्री नबी हसन और नरगिस पत्नी कमलेश निवासी नट नगला हाथीपुर थाना मऊ दरवाजा से भी अलग-अलग अपहरण और गैंगरेप के झूठे मुकदमे शरद कटियार व उनके साथियों पर न्यायालय के जरिए लिखाकर उत्पीड़न कराया और मोटी धनराशि की मांग की,इसी क्रम में अपने अधिवक्ता साथी सपा नेता उमेश यादव द्वारा प्लांट कराकर उनके विरुद्ध कोतवाली मोहम्मदाबाद में धारा 307 के तहत मुकदमा पंजीकृत कराकर उनका वह कई पत्रकार साथियों का उत्पीड़न कराया, इस मुकदमे में आज तक मेडिकल रिपोर्ट तक नहीं आई लेकिन शरद कटियार को निर्दोष रहते हुए 87 दिन जिला जेल में निरुद्ध रहना पड़ा, अवधेश मिश्रा और पूरे गिरोह पर सपा सरकार का संरक्षण होने के कारण एक ही मुकदमे में इस माफिया गिरोह ने उनके घर की करीब 300 पुलिस कर्मियों और सभी थानों के प्रभारी निरीक्षकों महिला थाना द्वारा क्षेत्राधिकार पुलिस उप जिलाधिकारी सदर की मौजूदगी में दो बार कुर्की कराकर विधि विरुद्ध दिनदहाड़े डकैती डलवाई गई। खुद भी कोतवाली फतेहगढ़ में अपनी ओर से झूठे मुकदमे लिखाये,और अपने साथी माफिया संजीव परिया द्वारा एक माह में शरद कटियार के विरुद्ध धारा 500 के तहत 12 परिवाद फ़तेहगढ न्यायालय में डलवाए,और एक कोतवाली फतेहगढ़ में लिखवाया अपने कई साथियों से एनसीआर और मुकदमे लिखवाये जो बाद में झूठे पाए गए।
शरद कटियार ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से तीन माँगें रखी हैं, अवधेश मिश्रा व उसके गिरोह की SIT जांच कराई जाए।श्रीमती रेनू कटियार की पैतृक भूमि की मौलिक स्वामित्व स्थिति बहाल की जाए।साथ ही इस संगठित कानूनी माफियागीरी में शामिल सभी लोगों पर कठोर विधिक कार्रवाई की जाए।
> “जब न्याय बिकता है, तो झूठ अमीर हो जाता है।”
फतेहगढ़ कचहरी का यह प्रकरण केवल एक पत्रकार के खिलाफ षड्यंत्र नहीं,बल्कि न्यायालय की दीवारों पर लिखा हुआ वह सच्चा सवाल है
जो अब मुख्यमंत्री के सामने है:
क्या उत्तर प्रदेश में कानून को भी वकीलों ने बंधक बना लिया है?

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