वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की आत्महत्या और जातिवाद की कड़ी

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हरियाणा में आईजी रैंक के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी वाई. पूरन कुमार की आत्महत्या ने केवल एक व्यक्तिगत दुखद घटना नहीं बल्कि पूरे देश के लिए गंभीर संदेश छोड़ दिया है। यह घटना विशेषकर दलित और बहुजन समाज के लिए एक गहरा आघात है, क्योंकि यह स्पष्ट कर देती है कि समाज में व्याप्त जातिवादी प्रथा और उससे जुड़े अत्याचार सत्ता और पद मिलने के बाद भी खत्म नहीं होते।

सूत्रों के अनुसार, वाई. पूरन कुमार लगातार जातिवादी शोषण और प्रताड़ना का सामना कर रहे थे। यह घटना प्रशासनिक स्तर पर सिर्फ असफलता नहीं बल्कि सरकार की नीतियों और नीयत पर सवाल उठाती है। यह दर्शाता है कि जातिवाद की जड़ें समाज के हर स्तर पर कितनी गहरी हैं और केवल पद और पदवी हासिल करने से इसका प्रभाव खत्म नहीं होता।

दलित और बहुजन समाज के लोग इस घटना को लेकर भारी आक्रोश में हैं। उनका कहना है कि यह केवल व्यक्तिगत दुख नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त जातिवाद और अत्याचार की निरंतरता का प्रमाण है। विशेषज्ञ और सामाजिक संगठन भी समयबद्ध, निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं, ताकि दोषियों को कड़ी सजा मिले और भविष्य में ऐसी शर्मनाक घटनाओं को रोका जा सके।
पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए हरियाणा सरकार से अपील की है कि इसे पूरी गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ लिया जाए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी प्रकार की लीपापोती या अधूरी कार्रवाई स्वीकार्य नहीं है और केन्द्र सरकार तथा सुप्रीम कोर्ट को भी इस मामले का उचित संज्ञान लेना चाहिए।
मायावती ने विशेष रूप से यह बात उठाई कि एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण को केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर “क्रीमी लेयर” से जोड़ने वाले लोग इस घटना से सबक लें। धन और पद मिलने के बावजूद जातिवाद पीछा नहीं छोड़ता, और हर स्तर पर शोषण और उत्पीड़न जारी रहता है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि समाज में समानता और न्याय की स्थापना अभी भी लंबी चुनौती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रशासन और सरकार को इस दुखद घटना से गंभीर सीख लेनी चाहिए। केवल कागजी नीतियों और घोषणाओं से जातिवाद को नहीं रोका जा सकता। इसके लिए ठोस कदम, गंभीर जागरूकता और समाज में वास्तविक बदलाव की आवश्यकता है। वाई. पूरन कुमार की आत्महत्या ने एक बार फिर पूरे देश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि न्याय, समानता और सामाजिक सुरक्षा के लिए संघर्ष जारी रहना चाहिए।

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