भारी मन से ही सही पर दीपावली के लिये दीपक तैयार कर रहे मिट्टी के कारीगर

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बोले कारीगर, झालर और मोमबत्ती ने ख़त्म कर दिया दीपकों का क्रेज,
आधुनिकता की अंधी दौड़ में परंपराओं को भूल रहे आम लोग
फर्रुखाबाद। दीपावली के नजदीक पर आते ही लगभग महीना पहले से दिया और चोकर इत्यादि बनाने वाले कारीगर सक्रिय हो जाते हैं नगर में कई स्थानों पर पूरी तन्मयता के साथ दिए बनाए जाने का कार्य किया जा रहा है। दिया दिए बनाए जाने का एक कार्य बता रहा है कि दीपावली आ गई है खान की दिए के कारीगर पूरे वर्ष तक दीपावली की तैयारी करते हैं लेकिन दोनों के बनाने का कार्य हाल में शुरू होता है।
नगर के ऐसे तमाम क्षेत्र हैं जहां मिट्टी से बने दिए बनाए जाते हैं हालांकि वर्तमान में झालर और मोमबत्ती आदि के कारण देवों की उपयोगिता कुछ कम हुई है लेकिन दीप जलाने का पौराणिक महत्व नहीं काम हुआ यही कारण है कि कुटीर उद्योग के रूप में चलने वाला यह उद्योग अभी भी जिंदा बना हुआ है।
खासतौर से प्रजापति वर्ग के लोग मिट्टी के बर्तन बनाने का कार्य करते हैं पूरे भारतवर्ष मिट्टी का कार्य करने वाले 3 महीने पहले दीए बनाने का कार्य करते हैं उनके यहां छोटे वह बड़े दोनों तरीके के दिए बनाए जाते हैं इसके अलावा चोकर बाद दो इत्यादि भी बनते हैं पूरे परिवार के परिवार दीपावली के मौसम में इन बर्तनों को बनाने में लगते हैं घूमता हुआ चक और उसे पर हाथ से बनाए जाते दिए देखते देखते में ही भारतीय परंपरा और संस्कृति को जीवंत करते दिखाई देते हैं। एक समय था जब मोमबत्ती और जागरण तो नाम मात्र के लिए प्रयोग की जाती थी मिट्टी के बने दिए सही दीपावली होती थी तब इन कारीगरों को दीपावली के अवसर पर कर उठने तक का मौका नहीं मिलता था लेकिन जैसे-जैसे आधुनिकता का पूर्ण समाज में आया परंपराएं ढीली पड़ी है और त्योहार मनाने का अंदाज भी बदल गया अब यह मिट्टी के दिए के कारीगर काफी विच दिखाई देते हैं उनका कहना है की परंपरा निर्वाह करने के लिए वीडियो को बनाते हैं क्योंकि पीडिया से दीपावली पर उनके घरों में दिए बनते आए हैं और यदि विद्या न बने तो ऐसा लगता है जैसे अपनी और अपने पुरखों की परंपरा को छोड़ रहे हैं। कच्चे देवों को बनाकर हवा लगाया जाता है जिन्हें जिसमें दियों को पकाया जाता है। भगवान राम के लंका से वापस आने पर नगर में दिए जलाकर उनका स्वागत किया गया था तब से ही यह परंपरा चली आ रही है सतयुग की परंपरा को वर्तमान में जीवंत बनाने वाले दिए गए कारीगर भले ही व्यथित हों लेकिन अपनी पैत्रक परंपरा को जीवित बनाए हुए हैं उन्हें इंतजार है कि वक्त फिर बदलेगा और एक बार फिर का ही बोल वाला होगा। और यह सही बात भी है कि दीपावली पर दीप का महत्व कभी कमी नहीं हुआ भले ही सजावट के लिए कुछ भी लगा दिया गया हो। शहर में तुम्हारी मस्जिद के पीछे, भाऊटोला, भीखमपुरा, बीबीगंज, कादरी गेठ, पांचाल घाट, चाचूपुर , समेत तमाम स्थान पर मिट्टी का आकर बात देखा जा सकता है।

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