उन्होंने कहा था –
मैं हिंदू पैदा हुआ हूँ, यह मेरे बस में नहीं थाज् किंतु मैं हिंदू मरूँगा, यह मेरे बस में है।
उन्होंने इस्लाम या क्रिश्चियनिटी इसलिए नहीं अपनाई क्योंकि वे भारतीय संस्कृति को नहीं छोडऩा चाहते थे और हिंदू धर्म को अल्पसंख्यक में नहीं छोडऩा चाहते थे।
भारत के इतिहास में डॉ. भीमराव अंबेडकर को प्राय: दलितों के मसीहा, संविधान निर्माता और सामाजिक न्याय के प्रणेता के रूप में याद किया जाता है। लेकिन यदि हम इतिहास के गहरे पन्नों को पलटें तो यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि बाबा साहब केवल एक समाज सुधारक या विधिवेत्ता ही नहीं थे, बल्कि भारत की एकता और हिंदुत्व की रक्षा के सबसे बड़े प्रहरी भी थे।
अंग्रेजों की चाल और अछूतिस्तान की साजि़श
19३५ के दशक में जब भारत स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा था, तब अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत एक और बड़ी साजिश रची थी। जिस तरह मोहम्मद अली जिन्ना की मांग पर पाकिस्तान बना, उसी तरह अंग्रेज चाहते थे कि भारत में अछूतिस्तान या डिप्रेस्ड क्लासेस स्टेट नाम का एक अलग देश बनाया जाए। 1946 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली की कैबिनेट मिशन रिपोर्ट में दलितों के लिए अलग प्रांत या अलग देश की संभावना पर चर्चा हुई थी। निज़ाम हैदराबाद, मुस्लिम लीग और कुछ इसाई मिशनरियों ने भी बाबा साहब को अपने पक्ष में करने की कोशिश की। अमेरिकी और यूरोपीय शोध पत्रों में साफ उल्लेख मिलता है कि यदि बाबा साहब अंग्रेजों के साथ खड़े हो जाते तो भारत के नक्शे पर एक और पाकिस्तान उभरता, जिसे उस दौर में अछूतिस्तान कहा गया। तब उन्होंने कहा था, मैं हिंदू पैदा हुआ हूँ, यह मेरे बस में नहीं थाज् किंतु मैं हिंदू मरूँगा, यह मेरे बस में है।उन्होंने इस्लाम या क्रिश्चियनिटी इसलिए नहीं अपनाई क्योंकि वे भारतीय संस्कृति को नहीं छोडऩा चाहते थे और हिंदू धर्म को अल्पसंख्यक में नहीं छोडऩा चाहते थे।
इतिहास गवाह है कि बाबा साहब पर विभिन्न धर्मों ने दबाव बनाया
निज़ाम हैदराबाद चाहते थे कि वे इस्लाम स्वीकार करें। इसाई मिशनरी संगठन उन्हें ईसाई बनाने का प्रयास कर रहे थे। कई बुद्धिजीवी उन्हें यहूदियों और अन्य पश्चिमी धर्मों के पक्ष में झुकाने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन बाबा साहब ने साफ कहा कि मैं अपने धर्म का अपमान नहीं करूंगा, मैं हिंदू होकर ही रहूंगा। यही वह निर्णायक क्षण था जिसने भारत को टूटने से बचा लिया। बाबा साहब ने संविधान सभा में कहा था कि हम एक राष्ट्र के रूप में तभी टिक पाएंगे जब हम संगठित रहेंगे। जाति, मजहब और प्रांत के आधार पर विभाजन भारत की आत्मा को तोड़ देगा। यदि बाबा साहब अंग्रेजों की चाल में फँस जाते तो भारत आज चार हिस्सों में बंटा होता। लेकिन बाबा साहब के राष्ट्रवादी दृष्टिकोण ने इस विभाजन को असंभव बना दिया। बाबा साहब ने मनुस्मृति जैसी कुप्रथाओं का विरोध करते हुए भी हिंदू समाज को सुधार और पुनर्गठन की राह दिखाई। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म को वैज्ञानिक और सामाजिक न्याय पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने 1956 में बौद्ध धर्म अपनाया, लेकिन उसे भारतीय परंपरा और हिंदू संस्कृति से जुड़ा हुआ धर्म बताया।
उनका मानना था कि भारतीय सभ्यता की जड़ें हिंदुत्व में हैं और इसे बचाना हर भारतीय का कर्तव्य है। 1947 में भारत की कुल जनसंख्या लगभग 34 करोड़ थी, जिसमें से करीब 7 करोड़ अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के लोग थे। यदि अलग अछूतिस्तान बनता तो यह विश्व का चौथा सबसे बड़ा देश बन सकता था। 1951 की जनगणना में यह स्पष्ट हुआ कि दलित समाज बाबा साहब की नीतियों से मुख्यधारा में जुड़ा और भारत की एकता को मजबूत किया। संविधान सभा में बाबा साहब द्वारा दिए गए 247 से अधिक भाषणों में एक राष्ट्र, एक संविधान, एक भारत की अवधारणा बार-बार सामने आती है। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर केवल संविधान निर्माता नहीं थे, वे वास्तव में भारत के राष्ट्ररक्षक और हिंदुत्व के संरक्षक भी थे। यदि उन्होंने अंग्रेजों की बात मान ली होती तो आज भारत का नक्शा अलग होता, और हमारी संस्कृति खंडित हो जाती। इसलिए आज जब हम हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और अखंड भारत की बात करते हैं तो यह स्वीकार करना होगा कि, बाबा साहब असली राष्ट्रभक्त और हिंदुत्व के रक्षक थे।


