फर्रुखाबाद और उसके आसपास का इलाका लंबे समय तक अपराधी अनुपम दुबे के आतंक से कांपता रहा। वह केवल एक अपराधी नहीं था, बल्कि दहशत का पर्याय बन चुका था। गोलियों की तड़तड़ाहट में रिश्ते, समाज और इंसानियत सब कुछ रौंद देने वाला यह चेहरा अब कानून के शिकंजे में कैद है। इंस्पेक्टर हत्याकांड के बाद ठेकेदार समीम हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून चाहे जितना देर से चले, पर उसकी पकड़ मजबूत होती है और न्याय की डगर कभी खोती नहीं।
अनुपम दुबे ने न केवल अपने दुश्मनों को मौत के घाट उतारा बल्कि अपने ही चाचा-चाची तक को गोलियों से भून डाला। समाज में भय का ऐसा माहौल बनाया कि लोग उसकी परछाई से भी कांपते थे। फतेहगढ़ के बाजार में दिनदहाड़े युवाओं की हत्या और कन्नौज में संभ्रांत परिवारों को झूठे मुकदमों में फंसाने जैसे अपराध उसकी काली करतूतों के चंद उदाहरण हैं। किंतु अंततः कानून का हथौड़ा चला और यह साबित हुआ कि लोकतंत्र में अपराध चाहे जितना बड़ा हो, सत्ता चाहे जितनी मजबूत लगे, मगर न्याय की नींव और जनता की उम्मीदें उससे कहीं ज्यादा मजबूत हैं।
पीड़ित परिवारों ने वर्षों तक इस आतंक का दंश झेला। बेटों की लाशें, उजड़े हुए घर, अधूरी रह गई शादियां—इन सबने समाज को भीतर तक तोड़ दिया था। ऐसे में अनुपम दुबे को सजा मिलना केवल कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि पीड़ित परिवारों के लिए राहत और न्याय का संबल है। यह उन लोगों के लिए भी आश्वस्ति है जिन्होंने कभी सोचा था कि अपराध और जातिवाद की ढाल के पीछे छिपकर यह गैंग हमेशा बच निकलेगा।
दुर्भाग्य से आज भी कुछ तत्व सोशल मीडिया पर जातिवाद का जहर घोलकर माफिया के समर्थन में माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। यह समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। अपराधी का कोई जाति, धर्म या समुदाय नहीं होता। उसकी पहचान केवल और केवल उसके अपराध होते हैं। ऐसे में पुलिस और प्रशासन की यह सख्ती सराहनीय है कि वे इन तत्वों पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।
अनुपम दुबे को मिली यह सजा केवल एक अपराधी को जेल की सलाखों तक सीमित करने का मामला नहीं है। यह संदेश है कि कानून का राज सर्वोपरि है। यह सजा उन तमाम माफियाओं, बाहुबलियों और अपराधी मानसिकता वालों के लिए सबक है जो समाज को अपनी बंदूक के दम पर बंधक बनाना चाहते हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि अंततः न्याय की विजय होती है, न कि अपराध की।
आज फर्रुखाबाद ही नहीं, पूरा प्रदेश यह महसूस कर रहा है कि अपराध चाहे कितना ही संगठित क्यों न हो, कानून की रोशनी उसके अंधकार को मिटाकर ही दम लेती है। यह फैसला समाज को भरोसा दिलाता है कि न्याय जीवित है, कानून जागृत है और लोकतंत्र में अपराध का साम्राज्य कभी स्थायी नहीं हो सकता।






