राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन की मान्यता खत्म किए जाने के मुद्दे पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना की है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराने के मौलिक अधिकार को धीरे-धीरे सीमित किया जा रहा है। सिब्बल के इस बयान से राजनीतिक गलियारों में बहस तेज होने की संभावना है।
कपिल सिब्बल ने कहा कि लोकतंत्र में नागरिकों को सरकार की नीतियों और फैसलों के खिलाफ अपनी आवाज उठाने का अधिकार होना चाहिए। उनके मुताबिक, शांतिपूर्ण प्रदर्शन जनता की असहमति जाहिर करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने चिंता जताई कि यदि विरोध के लिए निर्धारित स्थानों पर भी पाबंदियां लगाई जाती हैं, तो इससे नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
जंतर-मंतर दिल्ली में लंबे समय से राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन करने वाले लोगों का प्रमुख केंद्र रहा है। ऐसे में यहां विरोध-प्रदर्शन से जुड़ी व्यवस्था में बदलाव का मुद्दा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सिब्बल ने केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की जरूरत पर जोर दिया।
इस मामले को लेकर सरकार की नीतियों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार के बीच संतुलन पर चर्चा तेज हो सकती है। हालांकि, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की मान्यता खत्म किए जाने से संबंधित आदेश, उसके दायरे और आधिकारिक कारणों की पुष्टि जरूरी है। फिलहाल कपिल सिब्बल के बयान ने विरोध-प्रदर्शन की स्वतंत्रता और लोकतंत्र में असहमति की भूमिका को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।


