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Friday, October 16, 2026

डिजिटल जीवनशैली का पर्यावरणीय बोझ: अदृश्य प्रदूषण की कहानी

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*डॉ. विजय गर्ग*

डिजिटल क्रांति ने हमारे रहने, सीखने, काम करने और संवाद करने के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। स्मार्टफोन, कंप्यूटर, ऑनलाइन खरीदारी, वीडियो स्ट्रीमिंग, क्लाउड स्टोरेज और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने हमारे जीवन को तेज और सुविधाजनक बना दिया है। आज जानकारी का विशाल संसार हमारी उँगलियों के इशारे पर उपलब्ध है और डिजिटल तकनीक आधुनिक समाज का अभिन्न अंग बन चुकी है।

लेकिन हर क्लिक, डाउनलोड और ऑनलाइन गतिविधि के पीछे पर्यावरण से जुड़ी एक कीमत छिपी है। डिजिटल गतिविधियों में बिजली की खपत होती है, भौतिक बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता पड़ती है और इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न होता है। डिजिटल दुनिया भले ही आभासी और स्वच्छ दिखाई देती हो, लेकिन उसका पर्यावरण पर वास्तविक प्रभाव पड़ता है, जिस पर ध्यान देना आवश्यक है।

## डिजिटल दुनिया का छिपा हुआ कार्बन पदचिह्न

हर ऑनलाइन गतिविधि के पीछे भौतिक बुनियादी ढाँचा काम करता है। जब हम ईमेल भेजते हैं, वीडियो देखते हैं, ऑनलाइन बैठक करते हैं या कृत्रिम बुद्धिमत्ता के किसी उपकरण का उपयोग करते हैं, तो डेटा संचार नेटवर्कों से गुजरता है और सर्वरों तथा कंप्यूटरों द्वारा संसाधित किया जाता है। इन प्रणालियों को चलाने के लिए बिजली की आवश्यकता होती है। डेटा केंद्रों में उपकरणों को गर्म होने से बचाने के लिए शीतलन प्रणालियाँ भी इस्तेमाल की जाती हैं।

डिजिटल गतिविधियों का पर्यावरणीय प्रभाव कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे उपकरणों और डेटा केंद्रों की ऊर्जा-दक्षता, बिजली का स्रोत, संसाधित किए जाने वाले डेटा की मात्रा और उपयोग की अवधि। जब बिजली कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों से उत्पन्न होती है, तो डिजिटल गतिविधियाँ ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में योगदान दे सकती हैं।

व्यक्तिगत रूप से अनेक ऑनलाइन गतिविधियों का पर्यावरणीय प्रभाव छोटा हो सकता है। लेकिन दुनिया भर में डिजिटल सेवाओं के व्यापक उपयोग के कारण ऊर्जा की बचत और तकनीक का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना लगातार अधिक महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है।

## डेटा केंद्र: हमारी स्क्रीन के पीछे की शक्ति

डेटा केंद्र आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इनमें तस्वीरें, दस्तावेज, वीडियो, वेबसाइटें और विशाल मात्रा में जानकारी सुरक्षित रखी जाती है। ये ऑनलाइन बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, व्यापार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी सुविधाओं को भी संचालित करते हैं।

जैसे-जैसे डिजिटल सेवाओं का विस्तार हो रहा है, कंप्यूटिंग शक्ति और डेटा भंडारण की माँग भी बढ़ रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कुछ अनुप्रयोगों को पर्याप्त कंप्यूटिंग संसाधनों की आवश्यकता होती है। इसलिए डेटा केंद्रों को ऊर्जा की कुशल खपत, शीतलन की बेहतर व्यवस्था और स्वच्छ ऊर्जा के अधिक उपयोग पर ध्यान देना चाहिए।

तकनीकी कंपनियाँ ऊर्जा-कुशल उपकरणों का इस्तेमाल करके, सर्वरों की क्षमता का बेहतर उपयोग करके, अनावश्यक कंप्यूटिंग घटाकर और कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली की उपलब्धता वाले स्थानों पर सुविधाएँ स्थापित करके अपना पर्यावरणीय प्रभाव कम कर सकती हैं। ऊर्जा की खपत और कार्बन उत्सर्जन के बारे में पारदर्शी जानकारी देना भी आवश्यक है।

## वीडियो स्ट्रीमिंग और लगातार स्क्रॉल करने की आदत

वीडियो स्ट्रीमिंग, सोशल मीडिया और ऑनलाइन मनोरंजन आधुनिक डिजिटल जीवन के प्रमुख हिस्से बन चुके हैं। उच्च गुणवत्ता वाले वीडियो, अपने आप चलने वाले वीडियो, बार-बार डाउनलोड और बड़ी फाइलों का लगातार आदान-प्रदान डेटा प्रसंस्करण तथा नेटवर्क क्षमता की माँग बढ़ाते हैं।

किसी वीडियो का पर्यावरणीय प्रभाव उसकी गुणवत्ता, देखने की अवधि, उपकरण के प्रकार तथा डेटा केंद्रों और नेटवर्कों द्वारा उपयोग की जाने वाली बिजली पर निर्भर करता है। यह मान लेना उचित नहीं है कि हर ऑनलाइन गतिविधि का कार्बन पदचिह्न समान होता है।

फिर भी, बड़े पैमाने पर अनावश्यक डेटा खपत डिजिटल बुनियादी ढाँचे की माँग बढ़ा सकती है। जब उच्च गुणवत्ता की आवश्यकता न हो, तो वीडियो का रिजॉल्यूशन कम रखना, ऑटो-प्ले बंद करना, एक ही फाइल को बार-बार डाउनलोड करने से बचना और क्लाउड में अनावश्यक प्रतियाँ कम करना अधिक जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार को बढ़ावा दे सकता है।

उद्देश्य तकनीक के उपयोग को रोकना नहीं, बल्कि ऐसी संतुलित डिजिटल जीवनशैली अपनाना है जिसमें सुविधा के साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी शामिल हो।

## इलेक्ट्रॉनिक कचरा: डिजिटल प्रगति की भौतिक कीमत

डिजिटल क्रांति के सबसे स्पष्ट पर्यावरणीय परिणामों में से एक इलेक्ट्रॉनिक कचरा है, जिसे ई-कचरा भी कहा जाता है। स्मार्टफोन, लैपटॉप, टैबलेट, चार्जर, बैटरियाँ और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण समय के साथ पुराने या अनुपयोगी हो जाते हैं।

इन उपकरणों के निर्माण के लिए कच्चे माल, ऊर्जा, पानी और जटिल औद्योगिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है। धातुओं का खनन और प्रसंस्करण पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचा सकता है, जबकि उपकरणों के निर्माण और परिवहन से भी प्रदूषण उत्पन्न होता है।

जब पुराने उपकरणों का अनुचित तरीके से निपटान किया जाता है, तो हानिकारक पदार्थ मिट्टी, हवा और पानी को दूषित कर सकते हैं। अनौपचारिक तरीकों से पुनर्चक्रण करने वाले श्रमिक भी जहरीले पदार्थों और असुरक्षित कार्य परिस्थितियों का सामना कर सकते हैं।

ठीक से काम कर रहे उपकरणों को बार-बार बदलने की आदत इस समस्या को और बढ़ाती है। केवल फैशन, विज्ञापन या मामूली तकनीकी सुधारों के कारण नए उपकरण खरीदने से संसाधनों की खपत बढ़ सकती है, जबकि उपयोगकर्ता को वास्तविक लाभ बहुत कम मिलता है।

उपकरणों की मरम्मत करवाना, उनकी उपयोग अवधि बढ़ाना, टिकाऊ उत्पाद खरीदना, काम करने योग्य उपकरण दान करना और अधिकृत पुनर्चक्रण केंद्रों का उपयोग करना पर्यावरणीय बोझ को कम कर सकता है। निर्माताओं की भी जिम्मेदारी है कि वे ऐसे उत्पाद तैयार करें जिनकी मरम्मत आसान हो, जो ऊर्जा की कम खपत करें और जिन्हें पुनर्चक्रित करना सरल हो।

## क्लाउड कंप्यूटिंग भी पर्यावरण से मुक्त नहीं

‘क्लाउड’ शब्द से ऐसा लग सकता है कि डिजिटल जानकारी किसी ऐसी जगह मौजूद है जिसका भौतिक दुनिया से कोई संबंध नहीं है। वास्तविकता यह है कि क्लाउड कंप्यूटिंग इमारतों, सर्वरों, शीतलन प्रणालियों, संचार नेटवर्कों और बिजली पर निर्भर करती है।

एक ही फाइल की कई प्रतियाँ रखना, अनावश्यक बैकअप बनाना और अनुपयोगी डिजिटल संसाधनों को सक्रिय रखना अतिरिक्त भंडारण तथा कंप्यूटिंग क्षमता की खपत कर सकता है। हालाँकि, हर पुराना ईमेल या तस्वीर मिटा देना जलवायु संकट का कोई बड़ा समाधान नहीं है। अधिक महत्त्वपूर्ण लाभ ऊर्जा-कुशल बुनियादी ढाँचे, स्वच्छ बिजली, विवेकपूर्ण डेटा प्रबंधन और जिम्मेदार खरीदारी से प्राप्त हो सकते हैं।

क्लाउड सेवाएँ पुरानी और कम कुशल प्रणालियों की जगह लेकर या अनावश्यक यात्राओं तथा संसाधनों की खपत घटाकर पर्यावरण के लिए लाभकारी भी हो सकती हैं। उनका समग्र पर्यावरणीय प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें किस प्रकार विकसित और उपयोग किया जाता है।

## कृत्रिम बुद्धिमत्ता: अवसर और पर्यावरणीय जिम्मेदारी

कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरण निगरानी में नई संभावनाएँ पैदा कर रही है। यह मौसम के पैटर्न का विश्लेषण करने, ऊर्जा प्रबंधन सुधारने, फसलों की बीमारियों की पहचान करने और स्वच्छ तकनीकों के विकास में मदद कर सकती है।

इसके साथ ही, कुछ AI प्रणालियों को प्रशिक्षित करने और संचालित करने के लिए पर्याप्त कंप्यूटिंग शक्ति की आवश्यकता होती है। उनका पर्यावरणीय प्रभाव मॉडल के आकार, हार्डवेयर की दक्षता, अनुरोधों की संख्या और जटिलता तथा बिजली के स्रोत पर निर्भर करता है।

समाधान कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसका जिम्मेदारी से विकास और उपयोग करना है। अधिक कुशल एल्गोरिदम, विशेष हार्डवेयर, नवीकरणीय ऊर्जा, पारदर्शी रिपोर्टिंग और अनावश्यक कंप्यूटिंग से बचाव इसके पर्यावरणीय प्रभाव को कम कर सकते हैं।

AI का मूल्यांकन केवल उसकी गति और क्षमताओं के आधार पर नहीं, बल्कि उसके संसाधनों की खपत और समाज को मिलने वाले लाभों के आधार पर भी किया जाना चाहिए।

## भारत का डिजिटल विकास और पर्यावरणीय चुनौतियाँ

भारत में ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, दूरसंचार और AI-आधारित सेवाओं के माध्यम से डिजिटल विकास तेजी से हो रहा है। ये सुविधाएँ जानकारी तक पहुँच बढ़ा सकती हैं, नए अवसर पैदा कर सकती हैं और आर्थिक विकास को समर्थन दे सकती हैं।

लेकिन डिजिटल बुनियादी ढाँचे के विस्तार से विश्वसनीय बिजली, कुशल शीतलन प्रणालियों, संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग और ई-कचरे के प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता भी बढ़ती है। भारत में बिजली उत्पादन के लिए कोयला अभी भी एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसलिए डिजिटल बुनियादी ढाँचे की ऊर्जा-दक्षता बढ़ाना और स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी में वृद्धि करना विशेष रूप से आवश्यक है।

भारत ई-कचरे के संग्रह और पुनर्चक्रण की व्यवस्था मजबूत करके, उपकरणों की मरम्मत तथा पुनः उपयोग को प्रोत्साहित करके, ऊर्जा-कुशल डेटा केंद्रों को बढ़ावा देकर और जन-जागरूकता बढ़ाकर टिकाऊ डिजिटल भविष्य की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसके लिए उपभोक्ताओं, तकनीकी कंपनियों, शैक्षणिक संस्थानों और नीति-निर्माताओं की साझा भूमिका है।

## हरित डिजिटल जीवनशैली की ओर व्यावहारिक कदम

पर्यावरण की रक्षा के लिए स्मार्टफोन, कंप्यूटर या ऑनलाइन सेवाओं को छोड़ना आवश्यक नहीं है। इसके लिए सोच-समझकर विकल्प चुनने और तकनीकी क्षेत्र में सुधारों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

*व्यक्तिगत स्तर पर:*

– इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की उपयोग अवधि बढ़ाएँ और जहाँ संभव हो, उनकी मरम्मत करवाएँ।
– अनावश्यक नए उपकरण खरीदने से बचें और टिकाऊ तथा ऊर्जा-कुशल उत्पाद चुनें।
– उपयोग में न आने वाले उपकरण बंद करें और ऊर्जा बचाने वाली सेटिंग्स का इस्तेमाल करें।
– अनावश्यक वीडियो स्ट्रीमिंग, ऑटो-प्ले और एक ही फाइल को बार-बार डाउनलोड करने से बचें।
– जहाँ उचित हो, अनावश्यक डिजिटल फाइलें हटाएँ, लेकिन यह समझें कि इससे समग्र पर्यावरणीय समस्या का केवल एक छोटा हिस्सा ही हल होता है।
– उपयोग योग्य उपकरण दान करें और पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अधिकृत संग्रह या पुनर्चक्रण केंद्रों पर जमा करवाएँ।

*परिवारों और शैक्षणिक संस्थानों के स्तर पर:*

– विद्यार्थियों को ई-कचरे, ऊर्जा संरक्षण और तकनीक के जिम्मेदार उपयोग के बारे में शिक्षित करें।
– पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुरक्षित रूप से एकत्र करने के लिए अभियान चलाएँ।
– जहाँ उपयुक्त हो, उपकरण साझा करने, उनका नवीनीकरण करने और मरम्मत को प्रोत्साहित करें।
– ऐसी डिजिटल आदतों को बढ़ावा दें जो उत्पादकता, व्यक्तिगत कल्याण और पर्यावरणीय जागरूकता के बीच संतुलन बनाएँ।

*सरकारों और तकनीकी कंपनियों के स्तर पर:*

– डिजिटल बुनियादी ढाँचे के लिए विश्वसनीय और कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली की उपलब्धता बढ़ाएँ।
– डेटा केंद्रों में ऊर्जा और पानी के कुशल उपयोग को बेहतर बनाएँ।
– ऐसे उपकरण तैयार करें जो टिकाऊ, मरम्मत योग्य और पुनर्चक्रण योग्य हों।
– ई-कचरे के सुरक्षित संग्रह और पुनर्चक्रण की व्यवस्था मजबूत करें।
– पर्यावरणीय प्रभाव से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करें और मापे जा सकने वाले स्थिरता लक्ष्य निर्धारित करें।
– अधिक कुशल डिजिटल सेवाओं और AI प्रणालियों का विकास करें।

## टिकाऊ डिजिटल भविष्य की ओर

डिजिटल तकनीक न तो अपने आप में हानिकारक है और न ही स्वतः पर्यावरण-अनुकूल। इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि यह कितने संसाधनों का उपयोग करती है, इसे कौन-सा बुनियादी ढाँचा समर्थन देता है और इसका इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

ऑनलाइन शिक्षा कुछ यात्राओं को कम कर सकती है, डिजिटल दस्तावेज कागज की बचत कर सकते हैं और बुद्धिमान प्रणालियाँ इमारतों, उद्योगों तथा परिवहन की दक्षता बढ़ा सकती हैं। दूसरी ओर, बिजली, कंप्यूटिंग बुनियादी ढाँचे और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बढ़ती माँग नई पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी पैदा कर सकती है।

वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल प्रगति के लाभ बिना आवश्यकता पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए प्राप्त किए जाएँ। तकनीकी नवाचार के साथ ऊर्जा संरक्षण, संसाधनों का पुनः उपयोग, जिम्मेदार विनिर्माण और पर्यावरण के प्रति जवाबदेही को भी महत्त्व देना होगा।

*डिजिटल दुनिया भले ही दिखाई न देती हो, लेकिन उसका पर्यावरणीय प्रभाव वास्तविक है। प्रत्येक उपकरण के पीछे कच्चे माल और ऊर्जा के उपयोग का इतिहास है, हर डिजिटल सेवा भौतिक बुनियादी ढाँचे पर निर्भर करती है और हर तकनीकी विकल्प के अपने परिणाम होते हैं। टिकाऊ भविष्य के लिए हमें स्क्रीन से परे देखकर उन संसाधनों को समझना होगा, जो हमारे जुड़े हुए डिजिटल जीवन को संभव बनाते हैं। हमारा लक्ष्य प्रगति को कम करना नहीं, बल्कि उसे अधिक समझदार बनाना होना चाहिए—ऐसी प्रगति, जो मानवता की सेवा करे और पृथ्वी की रक्षा भी करे।*

*डॉ. विजय गर्ग*
सेवानिवृत्त प्राचार्य | शैक्षिक स्तंभकार | प्रख्यात वैज्ञानिक
गली कौर चंद, एम.एच.आर., मलोट, पंजाब – 152107
मोबाइल: 9465682110

डिजिटल जीवनशैली का पर्यावरणीय बोझ: अदृश्य प्रदूषण की कहानी

*डॉ. विजय गर्ग*

डिजिटल क्रांति ने हमारे रहने, सीखने, काम करने और संवाद करने के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। स्मार्टफोन, कंप्यूटर, ऑनलाइन खरीदारी, वीडियो स्ट्रीमिंग, क्लाउड स्टोरेज और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने हमारे जीवन को तेज और सुविधाजनक बना दिया है। आज जानकारी का विशाल संसार हमारी उँगलियों के इशारे पर उपलब्ध है और डिजिटल तकनीक आधुनिक समाज का अभिन्न अंग बन चुकी है।

लेकिन हर क्लिक, डाउनलोड और ऑनलाइन गतिविधि के पीछे पर्यावरण से जुड़ी एक कीमत छिपी है। डिजिटल गतिविधियों में बिजली की खपत होती है, भौतिक बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता पड़ती है और इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न होता है। डिजिटल दुनिया भले ही आभासी और स्वच्छ दिखाई देती हो, लेकिन उसका पर्यावरण पर वास्तविक प्रभाव पड़ता है, जिस पर ध्यान देना आवश्यक है।

## डिजिटल दुनिया का छिपा हुआ कार्बन पदचिह्न

हर ऑनलाइन गतिविधि के पीछे भौतिक बुनियादी ढाँचा काम करता है। जब हम ईमेल भेजते हैं, वीडियो देखते हैं, ऑनलाइन बैठक करते हैं या कृत्रिम बुद्धिमत्ता के किसी उपकरण का उपयोग करते हैं, तो डेटा संचार नेटवर्कों से गुजरता है और सर्वरों तथा कंप्यूटरों द्वारा संसाधित किया जाता है। इन प्रणालियों को चलाने के लिए बिजली की आवश्यकता होती है। डेटा केंद्रों में उपकरणों को गर्म होने से बचाने के लिए शीतलन प्रणालियाँ भी इस्तेमाल की जाती हैं।

डिजिटल गतिविधियों का पर्यावरणीय प्रभाव कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे उपकरणों और डेटा केंद्रों की ऊर्जा-दक्षता, बिजली का स्रोत, संसाधित किए जाने वाले डेटा की मात्रा और उपयोग की अवधि। जब बिजली कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों से उत्पन्न होती है, तो डिजिटल गतिविधियाँ ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में योगदान दे सकती हैं।

व्यक्तिगत रूप से अनेक ऑनलाइन गतिविधियों का पर्यावरणीय प्रभाव छोटा हो सकता है। लेकिन दुनिया भर में डिजिटल सेवाओं के व्यापक उपयोग के कारण ऊर्जा की बचत और तकनीक का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना लगातार अधिक महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है।

## डेटा केंद्र: हमारी स्क्रीन के पीछे की शक्ति

डेटा केंद्र आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इनमें तस्वीरें, दस्तावेज, वीडियो, वेबसाइटें और विशाल मात्रा में जानकारी सुरक्षित रखी जाती है। ये ऑनलाइन बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, व्यापार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी सुविधाओं को भी संचालित करते हैं।

जैसे-जैसे डिजिटल सेवाओं का विस्तार हो रहा है, कंप्यूटिंग शक्ति और डेटा भंडारण की माँग भी बढ़ रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कुछ अनुप्रयोगों को पर्याप्त कंप्यूटिंग संसाधनों की आवश्यकता होती है। इसलिए डेटा केंद्रों को ऊर्जा की कुशल खपत, शीतलन की बेहतर व्यवस्था और स्वच्छ ऊर्जा के अधिक उपयोग पर ध्यान देना चाहिए।

तकनीकी कंपनियाँ ऊर्जा-कुशल उपकरणों का इस्तेमाल करके, सर्वरों की क्षमता का बेहतर उपयोग करके, अनावश्यक कंप्यूटिंग घटाकर और कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली की उपलब्धता वाले स्थानों पर सुविधाएँ स्थापित करके अपना पर्यावरणीय प्रभाव कम कर सकती हैं। ऊर्जा की खपत और कार्बन उत्सर्जन के बारे में पारदर्शी जानकारी देना भी आवश्यक है।

## वीडियो स्ट्रीमिंग और लगातार स्क्रॉल करने की आदत

वीडियो स्ट्रीमिंग, सोशल मीडिया और ऑनलाइन मनोरंजन आधुनिक डिजिटल जीवन के प्रमुख हिस्से बन चुके हैं। उच्च गुणवत्ता वाले वीडियो, अपने आप चलने वाले वीडियो, बार-बार डाउनलोड और बड़ी फाइलों का लगातार आदान-प्रदान डेटा प्रसंस्करण तथा नेटवर्क क्षमता की माँग बढ़ाते हैं।

किसी वीडियो का पर्यावरणीय प्रभाव उसकी गुणवत्ता, देखने की अवधि, उपकरण के प्रकार तथा डेटा केंद्रों और नेटवर्कों द्वारा उपयोग की जाने वाली बिजली पर निर्भर करता है। यह मान लेना उचित नहीं है कि हर ऑनलाइन गतिविधि का कार्बन पदचिह्न समान होता है।

फिर भी, बड़े पैमाने पर अनावश्यक डेटा खपत डिजिटल बुनियादी ढाँचे की माँग बढ़ा सकती है। जब उच्च गुणवत्ता की आवश्यकता न हो, तो वीडियो का रिजॉल्यूशन कम रखना, ऑटो-प्ले बंद करना, एक ही फाइल को बार-बार डाउनलोड करने से बचना और क्लाउड में अनावश्यक प्रतियाँ कम करना अधिक जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार को बढ़ावा दे सकता है।

उद्देश्य तकनीक के उपयोग को रोकना नहीं, बल्कि ऐसी संतुलित डिजिटल जीवनशैली अपनाना है जिसमें सुविधा के साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी शामिल हो।

## इलेक्ट्रॉनिक कचरा: डिजिटल प्रगति की भौतिक कीमत

डिजिटल क्रांति के सबसे स्पष्ट पर्यावरणीय परिणामों में से एक इलेक्ट्रॉनिक कचरा है, जिसे ई-कचरा भी कहा जाता है। स्मार्टफोन, लैपटॉप, टैबलेट, चार्जर, बैटरियाँ और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण समय के साथ पुराने या अनुपयोगी हो जाते हैं।

इन उपकरणों के निर्माण के लिए कच्चे माल, ऊर्जा, पानी और जटिल औद्योगिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है। धातुओं का खनन और प्रसंस्करण पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचा सकता है, जबकि उपकरणों के निर्माण और परिवहन से भी प्रदूषण उत्पन्न होता है।

जब पुराने उपकरणों का अनुचित तरीके से निपटान किया जाता है, तो हानिकारक पदार्थ मिट्टी, हवा और पानी को दूषित कर सकते हैं। अनौपचारिक तरीकों से पुनर्चक्रण करने वाले श्रमिक भी जहरीले पदार्थों और असुरक्षित कार्य परिस्थितियों का सामना कर सकते हैं।

ठीक से काम कर रहे उपकरणों को बार-बार बदलने की आदत इस समस्या को और बढ़ाती है। केवल फैशन, विज्ञापन या मामूली तकनीकी सुधारों के कारण नए उपकरण खरीदने से संसाधनों की खपत बढ़ सकती है, जबकि उपयोगकर्ता को वास्तविक लाभ बहुत कम मिलता है।

उपकरणों की मरम्मत करवाना, उनकी उपयोग अवधि बढ़ाना, टिकाऊ उत्पाद खरीदना, काम करने योग्य उपकरण दान करना और अधिकृत पुनर्चक्रण केंद्रों का उपयोग करना पर्यावरणीय बोझ को कम कर सकता है। निर्माताओं की भी जिम्मेदारी है कि वे ऐसे उत्पाद तैयार करें जिनकी मरम्मत आसान हो, जो ऊर्जा की कम खपत करें और जिन्हें पुनर्चक्रित करना सरल हो।

## क्लाउड कंप्यूटिंग भी पर्यावरण से मुक्त नहीं

‘क्लाउड’ शब्द से ऐसा लग सकता है कि डिजिटल जानकारी किसी ऐसी जगह मौजूद है जिसका भौतिक दुनिया से कोई संबंध नहीं है। वास्तविकता यह है कि क्लाउड कंप्यूटिंग इमारतों, सर्वरों, शीतलन प्रणालियों, संचार नेटवर्कों और बिजली पर निर्भर करती है।

एक ही फाइल की कई प्रतियाँ रखना, अनावश्यक बैकअप बनाना और अनुपयोगी डिजिटल संसाधनों को सक्रिय रखना अतिरिक्त भंडारण तथा कंप्यूटिंग क्षमता की खपत कर सकता है। हालाँकि, हर पुराना ईमेल या तस्वीर मिटा देना जलवायु संकट का कोई बड़ा समाधान नहीं है। अधिक महत्त्वपूर्ण लाभ ऊर्जा-कुशल बुनियादी ढाँचे, स्वच्छ बिजली, विवेकपूर्ण डेटा प्रबंधन और जिम्मेदार खरीदारी से प्राप्त हो सकते हैं।

क्लाउड सेवाएँ पुरानी और कम कुशल प्रणालियों की जगह लेकर या अनावश्यक यात्राओं तथा संसाधनों की खपत घटाकर पर्यावरण के लिए लाभकारी भी हो सकती हैं। उनका समग्र पर्यावरणीय प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें किस प्रकार विकसित और उपयोग किया जाता है।

## कृत्रिम बुद्धिमत्ता: अवसर और पर्यावरणीय जिम्मेदारी

कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरण निगरानी में नई संभावनाएँ पैदा कर रही है। यह मौसम के पैटर्न का विश्लेषण करने, ऊर्जा प्रबंधन सुधारने, फसलों की बीमारियों की पहचान करने और स्वच्छ तकनीकों के विकास में मदद कर सकती है।

इसके साथ ही, कुछ AI प्रणालियों को प्रशिक्षित करने और संचालित करने के लिए पर्याप्त कंप्यूटिंग शक्ति की आवश्यकता होती है। उनका पर्यावरणीय प्रभाव मॉडल के आकार, हार्डवेयर की दक्षता, अनुरोधों की संख्या और जटिलता तथा बिजली के स्रोत पर निर्भर करता है।

समाधान कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसका जिम्मेदारी से विकास और उपयोग करना है। अधिक कुशल एल्गोरिदम, विशेष हार्डवेयर, नवीकरणीय ऊर्जा, पारदर्शी रिपोर्टिंग और अनावश्यक कंप्यूटिंग से बचाव इसके पर्यावरणीय प्रभाव को कम कर सकते हैं।

AI का मूल्यांकन केवल उसकी गति और क्षमताओं के आधार पर नहीं, बल्कि उसके संसाधनों की खपत और समाज को मिलने वाले लाभों के आधार पर भी किया जाना चाहिए।

## भारत का डिजिटल विकास और पर्यावरणीय चुनौतियाँ

भारत में ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, दूरसंचार और AI-आधारित सेवाओं के माध्यम से डिजिटल विकास तेजी से हो रहा है। ये सुविधाएँ जानकारी तक पहुँच बढ़ा सकती हैं, नए अवसर पैदा कर सकती हैं और आर्थिक विकास को समर्थन दे सकती हैं।

लेकिन डिजिटल बुनियादी ढाँचे के विस्तार से विश्वसनीय बिजली, कुशल शीतलन प्रणालियों, संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग और ई-कचरे के प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता भी बढ़ती है। भारत में बिजली उत्पादन के लिए कोयला अभी भी एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसलिए डिजिटल बुनियादी ढाँचे की ऊर्जा-दक्षता बढ़ाना और स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी में वृद्धि करना विशेष रूप से आवश्यक है।

भारत ई-कचरे के संग्रह और पुनर्चक्रण की व्यवस्था मजबूत करके, उपकरणों की मरम्मत तथा पुनः उपयोग को प्रोत्साहित करके, ऊर्जा-कुशल डेटा केंद्रों को बढ़ावा देकर और जन-जागरूकता बढ़ाकर टिकाऊ डिजिटल भविष्य की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसके लिए उपभोक्ताओं, तकनीकी कंपनियों, शैक्षणिक संस्थानों और नीति-निर्माताओं की साझा भूमिका है।

## हरित डिजिटल जीवनशैली की ओर व्यावहारिक कदम

पर्यावरण की रक्षा के लिए स्मार्टफोन, कंप्यूटर या ऑनलाइन सेवाओं को छोड़ना आवश्यक नहीं है। इसके लिए सोच-समझकर विकल्प चुनने और तकनीकी क्षेत्र में सुधारों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

*व्यक्तिगत स्तर पर:*

– इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की उपयोग अवधि बढ़ाएँ और जहाँ संभव हो, उनकी मरम्मत करवाएँ।
– अनावश्यक नए उपकरण खरीदने से बचें और टिकाऊ तथा ऊर्जा-कुशल उत्पाद चुनें।
– उपयोग में न आने वाले उपकरण बंद करें और ऊर्जा बचाने वाली सेटिंग्स का इस्तेमाल करें।
– अनावश्यक वीडियो स्ट्रीमिंग, ऑटो-प्ले और एक ही फाइल को बार-बार डाउनलोड करने से बचें।
– जहाँ उचित हो, अनावश्यक डिजिटल फाइलें हटाएँ, लेकिन यह समझें कि इससे समग्र पर्यावरणीय समस्या का केवल एक छोटा हिस्सा ही हल होता है।
– उपयोग योग्य उपकरण दान करें और पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अधिकृत संग्रह या पुनर्चक्रण केंद्रों पर जमा करवाएँ।

*परिवारों और शैक्षणिक संस्थानों के स्तर पर:*

– विद्यार्थियों को ई-कचरे, ऊर्जा संरक्षण और तकनीक के जिम्मेदार उपयोग के बारे में शिक्षित करें।
– पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुरक्षित रूप से एकत्र करने के लिए अभियान चलाएँ।
– जहाँ उपयुक्त हो, उपकरण साझा करने, उनका नवीनीकरण करने और मरम्मत को प्रोत्साहित करें।
– ऐसी डिजिटल आदतों को बढ़ावा दें जो उत्पादकता, व्यक्तिगत कल्याण और पर्यावरणीय जागरूकता के बीच संतुलन बनाएँ।

*सरकारों और तकनीकी कंपनियों के स्तर पर:*

– डिजिटल बुनियादी ढाँचे के लिए विश्वसनीय और कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली की उपलब्धता बढ़ाएँ।
– डेटा केंद्रों में ऊर्जा और पानी के कुशल उपयोग को बेहतर बनाएँ।
– ऐसे उपकरण तैयार करें जो टिकाऊ, मरम्मत योग्य और पुनर्चक्रण योग्य हों।
– ई-कचरे के सुरक्षित संग्रह और पुनर्चक्रण की व्यवस्था मजबूत करें।
– पर्यावरणीय प्रभाव से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करें और मापे जा सकने वाले स्थिरता लक्ष्य निर्धारित करें।
– अधिक कुशल डिजिटल सेवाओं और AI प्रणालियों का विकास करें।

## टिकाऊ डिजिटल भविष्य की ओर

डिजिटल तकनीक न तो अपने आप में हानिकारक है और न ही स्वतः पर्यावरण-अनुकूल। इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि यह कितने संसाधनों का उपयोग करती है, इसे कौन-सा बुनियादी ढाँचा समर्थन देता है और इसका इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

ऑनलाइन शिक्षा कुछ यात्राओं को कम कर सकती है, डिजिटल दस्तावेज कागज की बचत कर सकते हैं और बुद्धिमान प्रणालियाँ इमारतों, उद्योगों तथा परिवहन की दक्षता बढ़ा सकती हैं। दूसरी ओर, बिजली, कंप्यूटिंग बुनियादी ढाँचे और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बढ़ती माँग नई पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी पैदा कर सकती है।

वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल प्रगति के लाभ बिना आवश्यकता पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए प्राप्त किए जाएँ। तकनीकी नवाचार के साथ ऊर्जा संरक्षण, संसाधनों का पुनः उपयोग, जिम्मेदार विनिर्माण और पर्यावरण के प्रति जवाबदेही को भी महत्त्व देना होगा।

*डिजिटल दुनिया भले ही दिखाई न देती हो, लेकिन उसका पर्यावरणीय प्रभाव वास्तविक है। प्रत्येक उपकरण के पीछे कच्चे माल और ऊर्जा के उपयोग का इतिहास है, हर डिजिटल सेवा भौतिक बुनियादी ढाँचे पर निर्भर करती है और हर तकनीकी विकल्प के अपने परिणाम होते हैं। टिकाऊ भविष्य के लिए हमें स्क्रीन से परे देखकर उन संसाधनों को समझना होगा, जो हमारे जुड़े हुए डिजिटल जीवन को संभव बनाते हैं। हमारा लक्ष्य प्रगति को कम करना नहीं, बल्कि उसे अधिक समझदार बनाना होना चाहिए—ऐसी प्रगति, जो मानवता की सेवा करे और पृथ्वी की रक्षा भी करे।*

*डॉ. विजय गर्ग*
सेवानिवृत्त प्राचार्य | शैक्षिक स्तंभकार | प्रख्यात वैज्ञानिक
गली कौर चंद, एम.एच.आर., मलोट, पंजाब – 152107
मोबाइल: 9465682110

डिजिटल जीवनशैली का पर्यावरणीय बोझ: अदृश्य प्रदूषण की कहानी

*डॉ. विजय गर्ग*

डिजिटल क्रांति ने हमारे रहने, सीखने, काम करने और संवाद करने के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। स्मार्टफोन, कंप्यूटर, ऑनलाइन खरीदारी, वीडियो स्ट्रीमिंग, क्लाउड स्टोरेज और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने हमारे जीवन को तेज और सुविधाजनक बना दिया है। आज जानकारी का विशाल संसार हमारी उँगलियों के इशारे पर उपलब्ध है और डिजिटल तकनीक आधुनिक समाज का अभिन्न अंग बन चुकी है।

लेकिन हर क्लिक, डाउनलोड और ऑनलाइन गतिविधि के पीछे पर्यावरण से जुड़ी एक कीमत छिपी है। डिजिटल गतिविधियों में बिजली की खपत होती है, भौतिक बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता पड़ती है और इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न होता है। डिजिटल दुनिया भले ही आभासी और स्वच्छ दिखाई देती हो, लेकिन उसका पर्यावरण पर वास्तविक प्रभाव पड़ता है, जिस पर ध्यान देना आवश्यक है।

## डिजिटल दुनिया का छिपा हुआ कार्बन पदचिह्न

हर ऑनलाइन गतिविधि के पीछे भौतिक बुनियादी ढाँचा काम करता है। जब हम ईमेल भेजते हैं, वीडियो देखते हैं, ऑनलाइन बैठक करते हैं या कृत्रिम बुद्धिमत्ता के किसी उपकरण का उपयोग करते हैं, तो डेटा संचार नेटवर्कों से गुजरता है और सर्वरों तथा कंप्यूटरों द्वारा संसाधित किया जाता है। इन प्रणालियों को चलाने के लिए बिजली की आवश्यकता होती है। डेटा केंद्रों में उपकरणों को गर्म होने से बचाने के लिए शीतलन प्रणालियाँ भी इस्तेमाल की जाती हैं।

डिजिटल गतिविधियों का पर्यावरणीय प्रभाव कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे उपकरणों और डेटा केंद्रों की ऊर्जा-दक्षता, बिजली का स्रोत, संसाधित किए जाने वाले डेटा की मात्रा और उपयोग की अवधि। जब बिजली कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों से उत्पन्न होती है, तो डिजिटल गतिविधियाँ ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में योगदान दे सकती हैं।

व्यक्तिगत रूप से अनेक ऑनलाइन गतिविधियों का पर्यावरणीय प्रभाव छोटा हो सकता है। लेकिन दुनिया भर में डिजिटल सेवाओं के व्यापक उपयोग के कारण ऊर्जा की बचत और तकनीक का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना लगातार अधिक महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है।

## डेटा केंद्र: हमारी स्क्रीन के पीछे की शक्ति

डेटा केंद्र आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इनमें तस्वीरें, दस्तावेज, वीडियो, वेबसाइटें और विशाल मात्रा में जानकारी सुरक्षित रखी जाती है। ये ऑनलाइन बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, व्यापार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी सुविधाओं को भी संचालित करते हैं।

जैसे-जैसे डिजिटल सेवाओं का विस्तार हो रहा है, कंप्यूटिंग शक्ति और डेटा भंडारण की माँग भी बढ़ रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कुछ अनुप्रयोगों को पर्याप्त कंप्यूटिंग संसाधनों की आवश्यकता होती है। इसलिए डेटा केंद्रों को ऊर्जा की कुशल खपत, शीतलन की बेहतर व्यवस्था और स्वच्छ ऊर्जा के अधिक उपयोग पर ध्यान देना चाहिए।

तकनीकी कंपनियाँ ऊर्जा-कुशल उपकरणों का इस्तेमाल करके, सर्वरों की क्षमता का बेहतर उपयोग करके, अनावश्यक कंप्यूटिंग घटाकर और कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली की उपलब्धता वाले स्थानों पर सुविधाएँ स्थापित करके अपना पर्यावरणीय प्रभाव कम कर सकती हैं। ऊर्जा की खपत और कार्बन उत्सर्जन के बारे में पारदर्शी जानकारी देना भी आवश्यक है।

## वीडियो स्ट्रीमिंग और लगातार स्क्रॉल करने की आदत

वीडियो स्ट्रीमिंग, सोशल मीडिया और ऑनलाइन मनोरंजन आधुनिक डिजिटल जीवन के प्रमुख हिस्से बन चुके हैं। उच्च गुणवत्ता वाले वीडियो, अपने आप चलने वाले वीडियो, बार-बार डाउनलोड और बड़ी फाइलों का लगातार आदान-प्रदान डेटा प्रसंस्करण तथा नेटवर्क क्षमता की माँग बढ़ाते हैं।

किसी वीडियो का पर्यावरणीय प्रभाव उसकी गुणवत्ता, देखने की अवधि, उपकरण के प्रकार तथा डेटा केंद्रों और नेटवर्कों द्वारा उपयोग की जाने वाली बिजली पर निर्भर करता है। यह मान लेना उचित नहीं है कि हर ऑनलाइन गतिविधि का कार्बन पदचिह्न समान होता है।

फिर भी, बड़े पैमाने पर अनावश्यक डेटा खपत डिजिटल बुनियादी ढाँचे की माँग बढ़ा सकती है। जब उच्च गुणवत्ता की आवश्यकता न हो, तो वीडियो का रिजॉल्यूशन कम रखना, ऑटो-प्ले बंद करना, एक ही फाइल को बार-बार डाउनलोड करने से बचना और क्लाउड में अनावश्यक प्रतियाँ कम करना अधिक जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार को बढ़ावा दे सकता है।

उद्देश्य तकनीक के उपयोग को रोकना नहीं, बल्कि ऐसी संतुलित डिजिटल जीवनशैली अपनाना है जिसमें सुविधा के साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी शामिल हो।

## इलेक्ट्रॉनिक कचरा: डिजिटल प्रगति की भौतिक कीमत

डिजिटल क्रांति के सबसे स्पष्ट पर्यावरणीय परिणामों में से एक इलेक्ट्रॉनिक कचरा है, जिसे ई-कचरा भी कहा जाता है। स्मार्टफोन, लैपटॉप, टैबलेट, चार्जर, बैटरियाँ और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण समय के साथ पुराने या अनुपयोगी हो जाते हैं।

इन उपकरणों के निर्माण के लिए कच्चे माल, ऊर्जा, पानी और जटिल औद्योगिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है। धातुओं का खनन और प्रसंस्करण पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचा सकता है, जबकि उपकरणों के निर्माण और परिवहन से भी प्रदूषण उत्पन्न होता है।

जब पुराने उपकरणों का अनुचित तरीके से निपटान किया जाता है, तो हानिकारक पदार्थ मिट्टी, हवा और पानी को दूषित कर सकते हैं। अनौपचारिक तरीकों से पुनर्चक्रण करने वाले श्रमिक भी जहरीले पदार्थों और असुरक्षित कार्य परिस्थितियों का सामना कर सकते हैं।

ठीक से काम कर रहे उपकरणों को बार-बार बदलने की आदत इस समस्या को और बढ़ाती है। केवल फैशन, विज्ञापन या मामूली तकनीकी सुधारों के कारण नए उपकरण खरीदने से संसाधनों की खपत बढ़ सकती है, जबकि उपयोगकर्ता को वास्तविक लाभ बहुत कम मिलता है।

उपकरणों की मरम्मत करवाना, उनकी उपयोग अवधि बढ़ाना, टिकाऊ उत्पाद खरीदना, काम करने योग्य उपकरण दान करना और अधिकृत पुनर्चक्रण केंद्रों का उपयोग करना पर्यावरणीय बोझ को कम कर सकता है। निर्माताओं की भी जिम्मेदारी है कि वे ऐसे उत्पाद तैयार करें जिनकी मरम्मत आसान हो, जो ऊर्जा की कम खपत करें और जिन्हें पुनर्चक्रित करना सरल हो।

## क्लाउड कंप्यूटिंग भी पर्यावरण से मुक्त नहीं

‘क्लाउड’ शब्द से ऐसा लग सकता है कि डिजिटल जानकारी किसी ऐसी जगह मौजूद है जिसका भौतिक दुनिया से कोई संबंध नहीं है। वास्तविकता यह है कि क्लाउड कंप्यूटिंग इमारतों, सर्वरों, शीतलन प्रणालियों, संचार नेटवर्कों और बिजली पर निर्भर करती है।

एक ही फाइल की कई प्रतियाँ रखना, अनावश्यक बैकअप बनाना और अनुपयोगी डिजिटल संसाधनों को सक्रिय रखना अतिरिक्त भंडारण तथा कंप्यूटिंग क्षमता की खपत कर सकता है। हालाँकि, हर पुराना ईमेल या तस्वीर मिटा देना जलवायु संकट का कोई बड़ा समाधान नहीं है। अधिक महत्त्वपूर्ण लाभ ऊर्जा-कुशल बुनियादी ढाँचे, स्वच्छ बिजली, विवेकपूर्ण डेटा प्रबंधन और जिम्मेदार खरीदारी से प्राप्त हो सकते हैं।

क्लाउड सेवाएँ पुरानी और कम कुशल प्रणालियों की जगह लेकर या अनावश्यक यात्राओं तथा संसाधनों की खपत घटाकर पर्यावरण के लिए लाभकारी भी हो सकती हैं। उनका समग्र पर्यावरणीय प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें किस प्रकार विकसित और उपयोग किया जाता है।

## कृत्रिम बुद्धिमत्ता: अवसर और पर्यावरणीय जिम्मेदारी

कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरण निगरानी में नई संभावनाएँ पैदा कर रही है। यह मौसम के पैटर्न का विश्लेषण करने, ऊर्जा प्रबंधन सुधारने, फसलों की बीमारियों की पहचान करने और स्वच्छ तकनीकों के विकास में मदद कर सकती है।

इसके साथ ही, कुछ AI प्रणालियों को प्रशिक्षित करने और संचालित करने के लिए पर्याप्त कंप्यूटिंग शक्ति की आवश्यकता होती है। उनका पर्यावरणीय प्रभाव मॉडल के आकार, हार्डवेयर की दक्षता, अनुरोधों की संख्या और जटिलता तथा बिजली के स्रोत पर निर्भर करता है।

समाधान कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसका जिम्मेदारी से विकास और उपयोग करना है। अधिक कुशल एल्गोरिदम, विशेष हार्डवेयर, नवीकरणीय ऊर्जा, पारदर्शी रिपोर्टिंग और अनावश्यक कंप्यूटिंग से बचाव इसके पर्यावरणीय प्रभाव को कम कर सकते हैं।

AI का मूल्यांकन केवल उसकी गति और क्षमताओं के आधार पर नहीं, बल्कि उसके संसाधनों की खपत और समाज को मिलने वाले लाभों के आधार पर भी किया जाना चाहिए।

## भारत का डिजिटल विकास और पर्यावरणीय चुनौतियाँ

भारत में ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, दूरसंचार और AI-आधारित सेवाओं के माध्यम से डिजिटल विकास तेजी से हो रहा है। ये सुविधाएँ जानकारी तक पहुँच बढ़ा सकती हैं, नए अवसर पैदा कर सकती हैं और आर्थिक विकास को समर्थन दे सकती हैं।

लेकिन डिजिटल बुनियादी ढाँचे के विस्तार से विश्वसनीय बिजली, कुशल शीतलन प्रणालियों, संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग और ई-कचरे के प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता भी बढ़ती है। भारत में बिजली उत्पादन के लिए कोयला अभी भी एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसलिए डिजिटल बुनियादी ढाँचे की ऊर्जा-दक्षता बढ़ाना और स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी में वृद्धि करना विशेष रूप से आवश्यक है।

भारत ई-कचरे के संग्रह और पुनर्चक्रण की व्यवस्था मजबूत करके, उपकरणों की मरम्मत तथा पुनः उपयोग को प्रोत्साहित करके, ऊर्जा-कुशल डेटा केंद्रों को बढ़ावा देकर और जन-जागरूकता बढ़ाकर टिकाऊ डिजिटल भविष्य की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसके लिए उपभोक्ताओं, तकनीकी कंपनियों, शैक्षणिक संस्थानों और नीति-निर्माताओं की साझा भूमिका है।

## हरित डिजिटल जीवनशैली की ओर व्यावहारिक कदम

पर्यावरण की रक्षा के लिए स्मार्टफोन, कंप्यूटर या ऑनलाइन सेवाओं को छोड़ना आवश्यक नहीं है। इसके लिए सोच-समझकर विकल्प चुनने और तकनीकी क्षेत्र में सुधारों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

*व्यक्तिगत स्तर पर:*

– इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की उपयोग अवधि बढ़ाएँ और जहाँ संभव हो, उनकी मरम्मत करवाएँ।
– अनावश्यक नए उपकरण खरीदने से बचें और टिकाऊ तथा ऊर्जा-कुशल उत्पाद चुनें।
– उपयोग में न आने वाले उपकरण बंद करें और ऊर्जा बचाने वाली सेटिंग्स का इस्तेमाल करें।
– अनावश्यक वीडियो स्ट्रीमिंग, ऑटो-प्ले और एक ही फाइल को बार-बार डाउनलोड करने से बचें।
– जहाँ उचित हो, अनावश्यक डिजिटल फाइलें हटाएँ, लेकिन यह समझें कि इससे समग्र पर्यावरणीय समस्या का केवल एक छोटा हिस्सा ही हल होता है।
– उपयोग योग्य उपकरण दान करें और पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अधिकृत संग्रह या पुनर्चक्रण केंद्रों पर जमा करवाएँ।

*परिवारों और शैक्षणिक संस्थानों के स्तर पर:*

– विद्यार्थियों को ई-कचरे, ऊर्जा संरक्षण और तकनीक के जिम्मेदार उपयोग के बारे में शिक्षित करें।
– पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुरक्षित रूप से एकत्र करने के लिए अभियान चलाएँ।
– जहाँ उपयुक्त हो, उपकरण साझा करने, उनका नवीनीकरण करने और मरम्मत को प्रोत्साहित करें।
– ऐसी डिजिटल आदतों को बढ़ावा दें जो उत्पादकता, व्यक्तिगत कल्याण और पर्यावरणीय जागरूकता के बीच संतुलन बनाएँ।

*सरकारों और तकनीकी कंपनियों के स्तर पर:*

– डिजिटल बुनियादी ढाँचे के लिए विश्वसनीय और कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली की उपलब्धता बढ़ाएँ।
– डेटा केंद्रों में ऊर्जा और पानी के कुशल उपयोग को बेहतर बनाएँ।
– ऐसे उपकरण तैयार करें जो टिकाऊ, मरम्मत योग्य और पुनर्चक्रण योग्य हों।
– ई-कचरे के सुरक्षित संग्रह और पुनर्चक्रण की व्यवस्था मजबूत करें।
– पर्यावरणीय प्रभाव से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करें और मापे जा सकने वाले स्थिरता लक्ष्य निर्धारित करें।
– अधिक कुशल डिजिटल सेवाओं और AI प्रणालियों का विकास करें।

## टिकाऊ डिजिटल भविष्य की ओर

डिजिटल तकनीक न तो अपने आप में हानिकारक है और न ही स्वतः पर्यावरण-अनुकूल। इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि यह कितने संसाधनों का उपयोग करती है, इसे कौन-सा बुनियादी ढाँचा समर्थन देता है और इसका इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

ऑनलाइन शिक्षा कुछ यात्राओं को कम कर सकती है, डिजिटल दस्तावेज कागज की बचत कर सकते हैं और बुद्धिमान प्रणालियाँ इमारतों, उद्योगों तथा परिवहन की दक्षता बढ़ा सकती हैं। दूसरी ओर, बिजली, कंप्यूटिंग बुनियादी ढाँचे और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बढ़ती माँग नई पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी पैदा कर सकती है।

वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल प्रगति के लाभ बिना आवश्यकता पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए प्राप्त किए जाएँ। तकनीकी नवाचार के साथ ऊर्जा संरक्षण, संसाधनों का पुनः उपयोग, जिम्मेदार विनिर्माण और पर्यावरण के प्रति जवाबदेही को भी महत्त्व देना होगा।

*डिजिटल दुनिया भले ही दिखाई न देती हो, लेकिन उसका पर्यावरणीय प्रभाव वास्तविक है। प्रत्येक उपकरण के पीछे कच्चे माल और ऊर्जा के उपयोग का इतिहास है, हर डिजिटल सेवा भौतिक बुनियादी ढाँचे पर निर्भर करती है और हर तकनीकी विकल्प के अपने परिणाम होते हैं। टिकाऊ भविष्य के लिए हमें स्क्रीन से परे देखकर उन संसाधनों को समझना होगा, जो हमारे जुड़े हुए डिजिटल जीवन को संभव बनाते हैं। हमारा लक्ष्य प्रगति को कम करना नहीं, बल्कि उसे अधिक समझदार बनाना होना चाहिए—ऐसी प्रगति, जो मानवता की सेवा करे और पृथ्वी की रक्षा भी करे।*

*डॉ. विजय गर्ग*
सेवानिवृत्त प्राचार्य | शैक्षिक स्तंभकार | प्रख्यात वैज्ञानिक
गली कौर चंद, एम.एच.आर., मलोट, पंजाब – 152107
मोबाइल: 9465682110

डिजिटल जीवनशैली का पर्यावरणीय बोझ: अदृश्य प्रदूषण की कहानी

*डॉ. विजय गर्ग*

डिजिटल क्रांति ने हमारे रहने, सीखने, काम करने और संवाद करने के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। स्मार्टफोन, कंप्यूटर, ऑनलाइन खरीदारी, वीडियो स्ट्रीमिंग, क्लाउड स्टोरेज और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने हमारे जीवन को तेज और सुविधाजनक बना दिया है। आज जानकारी का विशाल संसार हमारी उँगलियों के इशारे पर उपलब्ध है और डिजिटल तकनीक आधुनिक समाज का अभिन्न अंग बन चुकी है।

लेकिन हर क्लिक, डाउनलोड और ऑनलाइन गतिविधि के पीछे पर्यावरण से जुड़ी एक कीमत छिपी है। डिजिटल गतिविधियों में बिजली की खपत होती है, भौतिक बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता पड़ती है और इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न होता है। डिजिटल दुनिया भले ही आभासी और स्वच्छ दिखाई देती हो, लेकिन उसका पर्यावरण पर वास्तविक प्रभाव पड़ता है, जिस पर ध्यान देना आवश्यक है।

## डिजिटल दुनिया का छिपा हुआ कार्बन पदचिह्न

हर ऑनलाइन गतिविधि के पीछे भौतिक बुनियादी ढाँचा काम करता है। जब हम ईमेल भेजते हैं, वीडियो देखते हैं, ऑनलाइन बैठक करते हैं या कृत्रिम बुद्धिमत्ता के किसी उपकरण का उपयोग करते हैं, तो डेटा संचार नेटवर्कों से गुजरता है और सर्वरों तथा कंप्यूटरों द्वारा संसाधित किया जाता है। इन प्रणालियों को चलाने के लिए बिजली की आवश्यकता होती है। डेटा केंद्रों में उपकरणों को गर्म होने से बचाने के लिए शीतलन प्रणालियाँ भी इस्तेमाल की जाती हैं।

डिजिटल गतिविधियों का पर्यावरणीय प्रभाव कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे उपकरणों और डेटा केंद्रों की ऊर्जा-दक्षता, बिजली का स्रोत, संसाधित किए जाने वाले डेटा की मात्रा और उपयोग की अवधि। जब बिजली कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों से उत्पन्न होती है, तो डिजिटल गतिविधियाँ ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में योगदान दे सकती हैं।

व्यक्तिगत रूप से अनेक ऑनलाइन गतिविधियों का पर्यावरणीय प्रभाव छोटा हो सकता है। लेकिन दुनिया भर में डिजिटल सेवाओं के व्यापक उपयोग के कारण ऊर्जा की बचत और तकनीक का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना लगातार अधिक महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है।

## डेटा केंद्र: हमारी स्क्रीन के पीछे की शक्ति

डेटा केंद्र आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इनमें तस्वीरें, दस्तावेज, वीडियो, वेबसाइटें और विशाल मात्रा में जानकारी सुरक्षित रखी जाती है। ये ऑनलाइन बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, व्यापार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी सुविधाओं को भी संचालित करते हैं।

जैसे-जैसे डिजिटल सेवाओं का विस्तार हो रहा है, कंप्यूटिंग शक्ति और डेटा भंडारण की माँग भी बढ़ रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कुछ अनुप्रयोगों को पर्याप्त कंप्यूटिंग संसाधनों की आवश्यकता होती है। इसलिए डेटा केंद्रों को ऊर्जा की कुशल खपत, शीतलन की बेहतर व्यवस्था और स्वच्छ ऊर्जा के अधिक उपयोग पर ध्यान देना चाहिए।

तकनीकी कंपनियाँ ऊर्जा-कुशल उपकरणों का इस्तेमाल करके, सर्वरों की क्षमता का बेहतर उपयोग करके, अनावश्यक कंप्यूटिंग घटाकर और कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली की उपलब्धता वाले स्थानों पर सुविधाएँ स्थापित करके अपना पर्यावरणीय प्रभाव कम कर सकती हैं। ऊर्जा की खपत और कार्बन उत्सर्जन के बारे में पारदर्शी जानकारी देना भी आवश्यक है।

## वीडियो स्ट्रीमिंग और लगातार स्क्रॉल करने की आदत

वीडियो स्ट्रीमिंग, सोशल मीडिया और ऑनलाइन मनोरंजन आधुनिक डिजिटल जीवन के प्रमुख हिस्से बन चुके हैं। उच्च गुणवत्ता वाले वीडियो, अपने आप चलने वाले वीडियो, बार-बार डाउनलोड और बड़ी फाइलों का लगातार आदान-प्रदान डेटा प्रसंस्करण तथा नेटवर्क क्षमता की माँग बढ़ाते हैं।

किसी वीडियो का पर्यावरणीय प्रभाव उसकी गुणवत्ता, देखने की अवधि, उपकरण के प्रकार तथा डेटा केंद्रों और नेटवर्कों द्वारा उपयोग की जाने वाली बिजली पर निर्भर करता है। यह मान लेना उचित नहीं है कि हर ऑनलाइन गतिविधि का कार्बन पदचिह्न समान होता है।

फिर भी, बड़े पैमाने पर अनावश्यक डेटा खपत डिजिटल बुनियादी ढाँचे की माँग बढ़ा सकती है। जब उच्च गुणवत्ता की आवश्यकता न हो, तो वीडियो का रिजॉल्यूशन कम रखना, ऑटो-प्ले बंद करना, एक ही फाइल को बार-बार डाउनलोड करने से बचना और क्लाउड में अनावश्यक प्रतियाँ कम करना अधिक जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार को बढ़ावा दे सकता है।

उद्देश्य तकनीक के उपयोग को रोकना नहीं, बल्कि ऐसी संतुलित डिजिटल जीवनशैली अपनाना है जिसमें सुविधा के साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी शामिल हो।

## इलेक्ट्रॉनिक कचरा: डिजिटल प्रगति की भौतिक कीमत

डिजिटल क्रांति के सबसे स्पष्ट पर्यावरणीय परिणामों में से एक इलेक्ट्रॉनिक कचरा है, जिसे ई-कचरा भी कहा जाता है। स्मार्टफोन, लैपटॉप, टैबलेट, चार्जर, बैटरियाँ और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण समय के साथ पुराने या अनुपयोगी हो जाते हैं।

इन उपकरणों के निर्माण के लिए कच्चे माल, ऊर्जा, पानी और जटिल औद्योगिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है। धातुओं का खनन और प्रसंस्करण पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचा सकता है, जबकि उपकरणों के निर्माण और परिवहन से भी प्रदूषण उत्पन्न होता है।

जब पुराने उपकरणों का अनुचित तरीके से निपटान किया जाता है, तो हानिकारक पदार्थ मिट्टी, हवा और पानी को दूषित कर सकते हैं। अनौपचारिक तरीकों से पुनर्चक्रण करने वाले श्रमिक भी जहरीले पदार्थों और असुरक्षित कार्य परिस्थितियों का सामना कर सकते हैं।

ठीक से काम कर रहे उपकरणों को बार-बार बदलने की आदत इस समस्या को और बढ़ाती है। केवल फैशन, विज्ञापन या मामूली तकनीकी सुधारों के कारण नए उपकरण खरीदने से संसाधनों की खपत बढ़ सकती है, जबकि उपयोगकर्ता को वास्तविक लाभ बहुत कम मिलता है।

उपकरणों की मरम्मत करवाना, उनकी उपयोग अवधि बढ़ाना, टिकाऊ उत्पाद खरीदना, काम करने योग्य उपकरण दान करना और अधिकृत पुनर्चक्रण केंद्रों का उपयोग करना पर्यावरणीय बोझ को कम कर सकता है। निर्माताओं की भी जिम्मेदारी है कि वे ऐसे उत्पाद तैयार करें जिनकी मरम्मत आसान हो, जो ऊर्जा की कम खपत करें और जिन्हें पुनर्चक्रित करना सरल हो।

## क्लाउड कंप्यूटिंग भी पर्यावरण से मुक्त नहीं

‘क्लाउड’ शब्द से ऐसा लग सकता है कि डिजिटल जानकारी किसी ऐसी जगह मौजूद है जिसका भौतिक दुनिया से कोई संबंध नहीं है। वास्तविकता यह है कि क्लाउड कंप्यूटिंग इमारतों, सर्वरों, शीतलन प्रणालियों, संचार नेटवर्कों और बिजली पर निर्भर करती है।

एक ही फाइल की कई प्रतियाँ रखना, अनावश्यक बैकअप बनाना और अनुपयोगी डिजिटल संसाधनों को सक्रिय रखना अतिरिक्त भंडारण तथा कंप्यूटिंग क्षमता की खपत कर सकता है। हालाँकि, हर पुराना ईमेल या तस्वीर मिटा देना जलवायु संकट का कोई बड़ा समाधान नहीं है। अधिक महत्त्वपूर्ण लाभ ऊर्जा-कुशल बुनियादी ढाँचे, स्वच्छ बिजली, विवेकपूर्ण डेटा प्रबंधन और जिम्मेदार खरीदारी से प्राप्त हो सकते हैं।

क्लाउड सेवाएँ पुरानी और कम कुशल प्रणालियों की जगह लेकर या अनावश्यक यात्राओं तथा संसाधनों की खपत घटाकर पर्यावरण के लिए लाभकारी भी हो सकती हैं। उनका समग्र पर्यावरणीय प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें किस प्रकार विकसित और उपयोग किया जाता है।

## कृत्रिम बुद्धिमत्ता: अवसर और पर्यावरणीय जिम्मेदारी

कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरण निगरानी में नई संभावनाएँ पैदा कर रही है। यह मौसम के पैटर्न का विश्लेषण करने, ऊर्जा प्रबंधन सुधारने, फसलों की बीमारियों की पहचान करने और स्वच्छ तकनीकों के विकास में मदद कर सकती है।

इसके साथ ही, कुछ AI प्रणालियों को प्रशिक्षित करने और संचालित करने के लिए पर्याप्त कंप्यूटिंग शक्ति की आवश्यकता होती है। उनका पर्यावरणीय प्रभाव मॉडल के आकार, हार्डवेयर की दक्षता, अनुरोधों की संख्या और जटिलता तथा बिजली के स्रोत पर निर्भर करता है।

समाधान कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसका जिम्मेदारी से विकास और उपयोग करना है। अधिक कुशल एल्गोरिदम, विशेष हार्डवेयर, नवीकरणीय ऊर्जा, पारदर्शी रिपोर्टिंग और अनावश्यक कंप्यूटिंग से बचाव इसके पर्यावरणीय प्रभाव को कम कर सकते हैं।

AI का मूल्यांकन केवल उसकी गति और क्षमताओं के आधार पर नहीं, बल्कि उसके संसाधनों की खपत और समाज को मिलने वाले लाभों के आधार पर भी किया जाना चाहिए।

## भारत का डिजिटल विकास और पर्यावरणीय चुनौतियाँ

भारत में ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, दूरसंचार और AI-आधारित सेवाओं के माध्यम से डिजिटल विकास तेजी से हो रहा है। ये सुविधाएँ जानकारी तक पहुँच बढ़ा सकती हैं, नए अवसर पैदा कर सकती हैं और आर्थिक विकास को समर्थन दे सकती हैं।

लेकिन डिजिटल बुनियादी ढाँचे के विस्तार से विश्वसनीय बिजली, कुशल शीतलन प्रणालियों, संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग और ई-कचरे के प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता भी बढ़ती है। भारत में बिजली उत्पादन के लिए कोयला अभी भी एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसलिए डिजिटल बुनियादी ढाँचे की ऊर्जा-दक्षता बढ़ाना और स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी में वृद्धि करना विशेष रूप से आवश्यक है।

भारत ई-कचरे के संग्रह और पुनर्चक्रण की व्यवस्था मजबूत करके, उपकरणों की मरम्मत तथा पुनः उपयोग को प्रोत्साहित करके, ऊर्जा-कुशल डेटा केंद्रों को बढ़ावा देकर और जन-जागरूकता बढ़ाकर टिकाऊ डिजिटल भविष्य की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसके लिए उपभोक्ताओं, तकनीकी कंपनियों, शैक्षणिक संस्थानों और नीति-निर्माताओं की साझा भूमिका है।

## हरित डिजिटल जीवनशैली की ओर व्यावहारिक कदम

पर्यावरण की रक्षा के लिए स्मार्टफोन, कंप्यूटर या ऑनलाइन सेवाओं को छोड़ना आवश्यक नहीं है। इसके लिए सोच-समझकर विकल्प चुनने और तकनीकी क्षेत्र में सुधारों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

*व्यक्तिगत स्तर पर:*

– इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की उपयोग अवधि बढ़ाएँ और जहाँ संभव हो, उनकी मरम्मत करवाएँ।
– अनावश्यक नए उपकरण खरीदने से बचें और टिकाऊ तथा ऊर्जा-कुशल उत्पाद चुनें।
– उपयोग में न आने वाले उपकरण बंद करें और ऊर्जा बचाने वाली सेटिंग्स का इस्तेमाल करें।
– अनावश्यक वीडियो स्ट्रीमिंग, ऑटो-प्ले और एक ही फाइल को बार-बार डाउनलोड करने से बचें।
– जहाँ उचित हो, अनावश्यक डिजिटल फाइलें हटाएँ, लेकिन यह समझें कि इससे समग्र पर्यावरणीय समस्या का केवल एक छोटा हिस्सा ही हल होता है।
– उपयोग योग्य उपकरण दान करें और पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अधिकृत संग्रह या पुनर्चक्रण केंद्रों पर जमा करवाएँ।

*परिवारों और शैक्षणिक संस्थानों के स्तर पर:*

– विद्यार्थियों को ई-कचरे, ऊर्जा संरक्षण और तकनीक के जिम्मेदार उपयोग के बारे में शिक्षित करें।
– पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुरक्षित रूप से एकत्र करने के लिए अभियान चलाएँ।
– जहाँ उपयुक्त हो, उपकरण साझा करने, उनका नवीनीकरण करने और मरम्मत को प्रोत्साहित करें।
– ऐसी डिजिटल आदतों को बढ़ावा दें जो उत्पादकता, व्यक्तिगत कल्याण और पर्यावरणीय जागरूकता के बीच संतुलन बनाएँ।

*सरकारों और तकनीकी कंपनियों के स्तर पर:*

– डिजिटल बुनियादी ढाँचे के लिए विश्वसनीय और कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली की उपलब्धता बढ़ाएँ।
– डेटा केंद्रों में ऊर्जा और पानी के कुशल उपयोग को बेहतर बनाएँ।
– ऐसे उपकरण तैयार करें जो टिकाऊ, मरम्मत योग्य और पुनर्चक्रण योग्य हों।
– ई-कचरे के सुरक्षित संग्रह और पुनर्चक्रण की व्यवस्था मजबूत करें।
– पर्यावरणीय प्रभाव से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करें और मापे जा सकने वाले स्थिरता लक्ष्य निर्धारित करें।
– अधिक कुशल डिजिटल सेवाओं और AI प्रणालियों का विकास करें।

## टिकाऊ डिजिटल भविष्य की ओर

डिजिटल तकनीक न तो अपने आप में हानिकारक है और न ही स्वतः पर्यावरण-अनुकूल। इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि यह कितने संसाधनों का उपयोग करती है, इसे कौन-सा बुनियादी ढाँचा समर्थन देता है और इसका इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

ऑनलाइन शिक्षा कुछ यात्राओं को कम कर सकती है, डिजिटल दस्तावेज कागज की बचत कर सकते हैं और बुद्धिमान प्रणालियाँ इमारतों, उद्योगों तथा परिवहन की दक्षता बढ़ा सकती हैं। दूसरी ओर, बिजली, कंप्यूटिंग बुनियादी ढाँचे और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बढ़ती माँग नई पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी पैदा कर सकती है।

वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल प्रगति के लाभ बिना आवश्यकता पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए प्राप्त किए जाएँ। तकनीकी नवाचार के साथ ऊर्जा संरक्षण, संसाधनों का पुनः उपयोग, जिम्मेदार विनिर्माण और पर्यावरण के प्रति जवाबदेही को भी महत्त्व देना होगा।

*डिजिटल दुनिया भले ही दिखाई न देती हो, लेकिन उसका पर्यावरणीय प्रभाव वास्तविक है। प्रत्येक उपकरण के पीछे कच्चे माल और ऊर्जा के उपयोग का इतिहास है, हर डिजिटल सेवा भौतिक बुनियादी ढाँचे पर निर्भर करती है और हर तकनीकी विकल्प के अपने परिणाम होते हैं। टिकाऊ भविष्य के लिए हमें स्क्रीन से परे देखकर उन संसाधनों को समझना होगा, जो हमारे जुड़े हुए डिजिटल जीवन को संभव बनाते हैं। हमारा लक्ष्य प्रगति को कम करना नहीं, बल्कि उसे अधिक समझदार बनाना होना चाहिए—ऐसी प्रगति, जो मानवता की सेवा करे और पृथ्वी की रक्षा भी करे।*

*डॉ. विजय गर्ग*
सेवानिवृत्त प्राचार्य | शैक्षिक स्तंभकार | प्रख्यात वैज्ञानिक
गली कौर चंद, एम.एच.आर., मलोट, पंजाब – 152107
मोबाइल: 9465682110

डिजिटल जीवनशैली का पर्यावरणीय बोझ: अदृश्य प्रदूषण की कहानी

*डॉ. विजय गर्ग*

डिजिटल क्रांति ने हमारे रहने, सीखने, काम करने और संवाद करने के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। स्मार्टफोन, कंप्यूटर, ऑनलाइन खरीदारी, वीडियो स्ट्रीमिंग, क्लाउड स्टोरेज और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने हमारे जीवन को तेज और सुविधाजनक बना दिया है। आज जानकारी का विशाल संसार हमारी उँगलियों के इशारे पर उपलब्ध है और डिजिटल तकनीक आधुनिक समाज का अभिन्न अंग बन चुकी है।

लेकिन हर क्लिक, डाउनलोड और ऑनलाइन गतिविधि के पीछे पर्यावरण से जुड़ी एक कीमत छिपी है। डिजिटल गतिविधियों में बिजली की खपत होती है, भौतिक बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता पड़ती है और इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न होता है। डिजिटल दुनिया भले ही आभासी और स्वच्छ दिखाई देती हो, लेकिन उसका पर्यावरण पर वास्तविक प्रभाव पड़ता है, जिस पर ध्यान देना आवश्यक है।

## डिजिटल दुनिया का छिपा हुआ कार्बन पदचिह्न

हर ऑनलाइन गतिविधि के पीछे भौतिक बुनियादी ढाँचा काम करता है। जब हम ईमेल भेजते हैं, वीडियो देखते हैं, ऑनलाइन बैठक करते हैं या कृत्रिम बुद्धिमत्ता के किसी उपकरण का उपयोग करते हैं, तो डेटा संचार नेटवर्कों से गुजरता है और सर्वरों तथा कंप्यूटरों द्वारा संसाधित किया जाता है। इन प्रणालियों को चलाने के लिए बिजली की आवश्यकता होती है। डेटा केंद्रों में उपकरणों को गर्म होने से बचाने के लिए शीतलन प्रणालियाँ भी इस्तेमाल की जाती हैं।

डिजिटल गतिविधियों का पर्यावरणीय प्रभाव कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे उपकरणों और डेटा केंद्रों की ऊर्जा-दक्षता, बिजली का स्रोत, संसाधित किए जाने वाले डेटा की मात्रा और उपयोग की अवधि। जब बिजली कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों से उत्पन्न होती है, तो डिजिटल गतिविधियाँ ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में योगदान दे सकती हैं।

व्यक्तिगत रूप से अनेक ऑनलाइन गतिविधियों का पर्यावरणीय प्रभाव छोटा हो सकता है। लेकिन दुनिया भर में डिजिटल सेवाओं के व्यापक उपयोग के कारण ऊर्जा की बचत और तकनीक का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना लगातार अधिक महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है।

## डेटा केंद्र: हमारी स्क्रीन के पीछे की शक्ति

डेटा केंद्र आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इनमें तस्वीरें, दस्तावेज, वीडियो, वेबसाइटें और विशाल मात्रा में जानकारी सुरक्षित रखी जाती है। ये ऑनलाइन बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, व्यापार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी सुविधाओं को भी संचालित करते हैं।

जैसे-जैसे डिजिटल सेवाओं का विस्तार हो रहा है, कंप्यूटिंग शक्ति और डेटा भंडारण की माँग भी बढ़ रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कुछ अनुप्रयोगों को पर्याप्त कंप्यूटिंग संसाधनों की आवश्यकता होती है। इसलिए डेटा केंद्रों को ऊर्जा की कुशल खपत, शीतलन की बेहतर व्यवस्था और स्वच्छ ऊर्जा के अधिक उपयोग पर ध्यान देना चाहिए।

तकनीकी कंपनियाँ ऊर्जा-कुशल उपकरणों का इस्तेमाल करके, सर्वरों की क्षमता का बेहतर उपयोग करके, अनावश्यक कंप्यूटिंग घटाकर और कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली की उपलब्धता वाले स्थानों पर सुविधाएँ स्थापित करके अपना पर्यावरणीय प्रभाव कम कर सकती हैं। ऊर्जा की खपत और कार्बन उत्सर्जन के बारे में पारदर्शी जानकारी देना भी आवश्यक है।

## वीडियो स्ट्रीमिंग और लगातार स्क्रॉल करने की आदत

वीडियो स्ट्रीमिंग, सोशल मीडिया और ऑनलाइन मनोरंजन आधुनिक डिजिटल जीवन के प्रमुख हिस्से बन चुके हैं। उच्च गुणवत्ता वाले वीडियो, अपने आप चलने वाले वीडियो, बार-बार डाउनलोड और बड़ी फाइलों का लगातार आदान-प्रदान डेटा प्रसंस्करण तथा नेटवर्क क्षमता की माँग बढ़ाते हैं।

किसी वीडियो का पर्यावरणीय प्रभाव उसकी गुणवत्ता, देखने की अवधि, उपकरण के प्रकार तथा डेटा केंद्रों और नेटवर्कों द्वारा उपयोग की जाने वाली बिजली पर निर्भर करता है। यह मान लेना उचित नहीं है कि हर ऑनलाइन गतिविधि का कार्बन पदचिह्न समान होता है।

फिर भी, बड़े पैमाने पर अनावश्यक डेटा खपत डिजिटल बुनियादी ढाँचे की माँग बढ़ा सकती है। जब उच्च गुणवत्ता की आवश्यकता न हो, तो वीडियो का रिजॉल्यूशन कम रखना, ऑटो-प्ले बंद करना, एक ही फाइल को बार-बार डाउनलोड करने से बचना और क्लाउड में अनावश्यक प्रतियाँ कम करना अधिक जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार को बढ़ावा दे सकता है।

उद्देश्य तकनीक के उपयोग को रोकना नहीं, बल्कि ऐसी संतुलित डिजिटल जीवनशैली अपनाना है जिसमें सुविधा के साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी शामिल हो।

## इलेक्ट्रॉनिक कचरा: डिजिटल प्रगति की भौतिक कीमत

डिजिटल क्रांति के सबसे स्पष्ट पर्यावरणीय परिणामों में से एक इलेक्ट्रॉनिक कचरा है, जिसे ई-कचरा भी कहा जाता है। स्मार्टफोन, लैपटॉप, टैबलेट, चार्जर, बैटरियाँ और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण समय के साथ पुराने या अनुपयोगी हो जाते हैं।

इन उपकरणों के निर्माण के लिए कच्चे माल, ऊर्जा, पानी और जटिल औद्योगिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है। धातुओं का खनन और प्रसंस्करण पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचा सकता है, जबकि उपकरणों के निर्माण और परिवहन से भी प्रदूषण उत्पन्न होता है।

जब पुराने उपकरणों का अनुचित तरीके से निपटान किया जाता है, तो हानिकारक पदार्थ मिट्टी, हवा और पानी को दूषित कर सकते हैं। अनौपचारिक तरीकों से पुनर्चक्रण करने वाले श्रमिक भी जहरीले पदार्थों और असुरक्षित कार्य परिस्थितियों का सामना कर सकते हैं।

ठीक से काम कर रहे उपकरणों को बार-बार बदलने की आदत इस समस्या को और बढ़ाती है। केवल फैशन, विज्ञापन या मामूली तकनीकी सुधारों के कारण नए उपकरण खरीदने से संसाधनों की खपत बढ़ सकती है, जबकि उपयोगकर्ता को वास्तविक लाभ बहुत कम मिलता है।

उपकरणों की मरम्मत करवाना, उनकी उपयोग अवधि बढ़ाना, टिकाऊ उत्पाद खरीदना, काम करने योग्य उपकरण दान करना और अधिकृत पुनर्चक्रण केंद्रों का उपयोग करना पर्यावरणीय बोझ को कम कर सकता है। निर्माताओं की भी जिम्मेदारी है कि वे ऐसे उत्पाद तैयार करें जिनकी मरम्मत आसान हो, जो ऊर्जा की कम खपत करें और जिन्हें पुनर्चक्रित करना सरल हो।

## क्लाउड कंप्यूटिंग भी पर्यावरण से मुक्त नहीं

‘क्लाउड’ शब्द से ऐसा लग सकता है कि डिजिटल जानकारी किसी ऐसी जगह मौजूद है जिसका भौतिक दुनिया से कोई संबंध नहीं है। वास्तविकता यह है कि क्लाउड कंप्यूटिंग इमारतों, सर्वरों, शीतलन प्रणालियों, संचार नेटवर्कों और बिजली पर निर्भर करती है।

एक ही फाइल की कई प्रतियाँ रखना, अनावश्यक बैकअप बनाना और अनुपयोगी डिजिटल संसाधनों को सक्रिय रखना अतिरिक्त भंडारण तथा कंप्यूटिंग क्षमता की खपत कर सकता है। हालाँकि, हर पुराना ईमेल या तस्वीर मिटा देना जलवायु संकट का कोई बड़ा समाधान नहीं है। अधिक महत्त्वपूर्ण लाभ ऊर्जा-कुशल बुनियादी ढाँचे, स्वच्छ बिजली, विवेकपूर्ण डेटा प्रबंधन और जिम्मेदार खरीदारी से प्राप्त हो सकते हैं।

क्लाउड सेवाएँ पुरानी और कम कुशल प्रणालियों की जगह लेकर या अनावश्यक यात्राओं तथा संसाधनों की खपत घटाकर पर्यावरण के लिए लाभकारी भी हो सकती हैं। उनका समग्र पर्यावरणीय प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें किस प्रकार विकसित और उपयोग किया जाता है।

## कृत्रिम बुद्धिमत्ता: अवसर और पर्यावरणीय जिम्मेदारी

कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरण निगरानी में नई संभावनाएँ पैदा कर रही है। यह मौसम के पैटर्न का विश्लेषण करने, ऊर्जा प्रबंधन सुधारने, फसलों की बीमारियों की पहचान करने और स्वच्छ तकनीकों के विकास में मदद कर सकती है।

इसके साथ ही, कुछ AI प्रणालियों को प्रशिक्षित करने और संचालित करने के लिए पर्याप्त कंप्यूटिंग शक्ति की आवश्यकता होती है। उनका पर्यावरणीय प्रभाव मॉडल के आकार, हार्डवेयर की दक्षता, अनुरोधों की संख्या और जटिलता तथा बिजली के स्रोत पर निर्भर करता है।

समाधान कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसका जिम्मेदारी से विकास और उपयोग करना है। अधिक कुशल एल्गोरिदम, विशेष हार्डवेयर, नवीकरणीय ऊर्जा, पारदर्शी रिपोर्टिंग और अनावश्यक कंप्यूटिंग से बचाव इसके पर्यावरणीय प्रभाव को कम कर सकते हैं।

AI का मूल्यांकन केवल उसकी गति और क्षमताओं के आधार पर नहीं, बल्कि उसके संसाधनों की खपत और समाज को मिलने वाले लाभों के आधार पर भी किया जाना चाहिए।

## भारत का डिजिटल विकास और पर्यावरणीय चुनौतियाँ

भारत में ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, दूरसंचार और AI-आधारित सेवाओं के माध्यम से डिजिटल विकास तेजी से हो रहा है। ये सुविधाएँ जानकारी तक पहुँच बढ़ा सकती हैं, नए अवसर पैदा कर सकती हैं और आर्थिक विकास को समर्थन दे सकती हैं।

लेकिन डिजिटल बुनियादी ढाँचे के विस्तार से विश्वसनीय बिजली, कुशल शीतलन प्रणालियों, संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग और ई-कचरे के प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता भी बढ़ती है। भारत में बिजली उत्पादन के लिए कोयला अभी भी एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसलिए डिजिटल बुनियादी ढाँचे की ऊर्जा-दक्षता बढ़ाना और स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी में वृद्धि करना विशेष रूप से आवश्यक है।

भारत ई-कचरे के संग्रह और पुनर्चक्रण की व्यवस्था मजबूत करके, उपकरणों की मरम्मत तथा पुनः उपयोग को प्रोत्साहित करके, ऊर्जा-कुशल डेटा केंद्रों को बढ़ावा देकर और जन-जागरूकता बढ़ाकर टिकाऊ डिजिटल भविष्य की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसके लिए उपभोक्ताओं, तकनीकी कंपनियों, शैक्षणिक संस्थानों और नीति-निर्माताओं की साझा भूमिका है।

## हरित डिजिटल जीवनशैली की ओर व्यावहारिक कदम

पर्यावरण की रक्षा के लिए स्मार्टफोन, कंप्यूटर या ऑनलाइन सेवाओं को छोड़ना आवश्यक नहीं है। इसके लिए सोच-समझकर विकल्प चुनने और तकनीकी क्षेत्र में सुधारों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

*व्यक्तिगत स्तर पर:*

– इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की उपयोग अवधि बढ़ाएँ और जहाँ संभव हो, उनकी मरम्मत करवाएँ।
– अनावश्यक नए उपकरण खरीदने से बचें और टिकाऊ तथा ऊर्जा-कुशल उत्पाद चुनें।
– उपयोग में न आने वाले उपकरण बंद करें और ऊर्जा बचाने वाली सेटिंग्स का इस्तेमाल करें।
– अनावश्यक वीडियो स्ट्रीमिंग, ऑटो-प्ले और एक ही फाइल को बार-बार डाउनलोड करने से बचें।
– जहाँ उचित हो, अनावश्यक डिजिटल फाइलें हटाएँ, लेकिन यह समझें कि इससे समग्र पर्यावरणीय समस्या का केवल एक छोटा हिस्सा ही हल होता है।
– उपयोग योग्य उपकरण दान करें और पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अधिकृत संग्रह या पुनर्चक्रण केंद्रों पर जमा करवाएँ।

*परिवारों और शैक्षणिक संस्थानों के स्तर पर:*

– विद्यार्थियों को ई-कचरे, ऊर्जा संरक्षण और तकनीक के जिम्मेदार उपयोग के बारे में शिक्षित करें।
– पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुरक्षित रूप से एकत्र करने के लिए अभियान चलाएँ।
– जहाँ उपयुक्त हो, उपकरण साझा करने, उनका नवीनीकरण करने और मरम्मत को प्रोत्साहित करें।
– ऐसी डिजिटल आदतों को बढ़ावा दें जो उत्पादकता, व्यक्तिगत कल्याण और पर्यावरणीय जागरूकता के बीच संतुलन बनाएँ।

*सरकारों और तकनीकी कंपनियों के स्तर पर:*

– डिजिटल बुनियादी ढाँचे के लिए विश्वसनीय और कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली की उपलब्धता बढ़ाएँ।
– डेटा केंद्रों में ऊर्जा और पानी के कुशल उपयोग को बेहतर बनाएँ।
– ऐसे उपकरण तैयार करें जो टिकाऊ, मरम्मत योग्य और पुनर्चक्रण योग्य हों।
– ई-कचरे के सुरक्षित संग्रह और पुनर्चक्रण की व्यवस्था मजबूत करें।
– पर्यावरणीय प्रभाव से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करें और मापे जा सकने वाले स्थिरता लक्ष्य निर्धारित करें।
– अधिक कुशल डिजिटल सेवाओं और AI प्रणालियों का विकास करें।

## टिकाऊ डिजिटल भविष्य की ओर

डिजिटल तकनीक न तो अपने आप में हानिकारक है और न ही स्वतः पर्यावरण-अनुकूल। इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि यह कितने संसाधनों का उपयोग करती है, इसे कौन-सा बुनियादी ढाँचा समर्थन देता है और इसका इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

ऑनलाइन शिक्षा कुछ यात्राओं को कम कर सकती है, डिजिटल दस्तावेज कागज की बचत कर सकते हैं और बुद्धिमान प्रणालियाँ इमारतों, उद्योगों तथा परिवहन की दक्षता बढ़ा सकती हैं। दूसरी ओर, बिजली, कंप्यूटिंग बुनियादी ढाँचे और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बढ़ती माँग नई पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी पैदा कर सकती है।

वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल प्रगति के लाभ बिना आवश्यकता पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए प्राप्त किए जाएँ। तकनीकी नवाचार के साथ ऊर्जा संरक्षण, संसाधनों का पुनः उपयोग, जिम्मेदार विनिर्माण और पर्यावरण के प्रति जवाबदेही को भी महत्त्व देना होगा।

*डिजिटल दुनिया भले ही दिखाई न देती हो, लेकिन उसका पर्यावरणीय प्रभाव वास्तविक है। प्रत्येक उपकरण के पीछे कच्चे माल और ऊर्जा के उपयोग का इतिहास है, हर डिजिटल सेवा भौतिक बुनियादी ढाँचे पर निर्भर करती है और हर तकनीकी विकल्प के अपने परिणाम होते हैं। टिकाऊ भविष्य के लिए हमें स्क्रीन से परे देखकर उन संसाधनों को समझना होगा, जो हमारे जुड़े हुए डिजिटल जीवन को संभव बनाते हैं। हमारा लक्ष्य प्रगति को कम करना नहीं, बल्कि उसे अधिक समझदार बनाना होना चाहिए—ऐसी प्रगति, जो मानवता की सेवा करे और पृथ्वी की रक्षा भी करे।*

*डॉ. विजय गर्ग*
सेवानिवृत्त प्राचार्य | शैक्षिक स्तंभकार | प्रख्यात वैज्ञानिक
गली कौर चंद, एम.एच.आर., मलोट, पंजाब – 152107
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