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Thursday, October 15, 2026

हर भाषा के लुप्त होने से एक संसार मिट जाता है

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*डॉ. विजय गर्ग*

भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह किसी समुदाय के इतिहास, संस्कृति, परंपराओं, ज्ञान और सामूहिक स्मृतियों का जीवंत भंडार है। प्रत्येक भाषा दुनिया को समझने का एक अनूठा दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। जब कोई भाषा लुप्त हो जाती है, तो मानवता केवल कुछ शब्द नहीं खोती, बल्कि विचारों, अनुभवों और सांस्कृतिक ज्ञान का एक पूरा संसार खो बैठती है।

दुनियाभर में बोली जाने वाली हजारों भाषाएँ मानव सभ्यता की अद्भुत विविधता को दर्शाती हैं। लेकिन आज अनेक भाषाएँ विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रही हैं, क्योंकि नई पीढ़ी शिक्षा, रोजगार और सामाजिक उन्नति के लिए अधिक प्रचलित भाषाओं को अपना रही है। इसके परिणामस्वरूप छोटे समुदायों की भाषाएँ धीरे-धीरे दैनिक जीवन से गायब होती जा रही हैं।

हर भाषा में पीढ़ियों का संचित ज्ञान समाहित होता है। औषधीय पौधों, कृषि, मौसम, जंगलों, जीव-जंतुओं और स्थानीय पारिस्थितिकी से जुड़ी पारंपरिक जानकारी अक्सर स्थानीय शब्दों, मुहावरों, गीतों और कहानियों में संरक्षित रहती है। जब कोई भाषा समाप्त हो जाती है, तो इस ज्ञान के बड़े हिस्से को दोबारा प्राप्त करना कठिन हो सकता है। यह क्षति केवल सांस्कृतिक नहीं होती, बल्कि वैज्ञानिक समझ और प्रकृति के साथ हमारे संबंधों को भी प्रभावित करती है।

भाषा का संबंध हमारी पहचान और अपनेपन की भावना से भी गहराई से जुड़ा है। मातृभाषा बच्चों को अपने दादा-दादी और नाना-नानी से संवाद करने, पारिवारिक परंपराओं को समझने तथा अपनी जड़ों से जुड़े रहने में सहायता करती है। लोकगीत, कहावतें, लोरियाँ, लोककथाएँ और मौखिक इतिहास ऐसी भावनाओं एवं अनुभवों को संजोते हैं, जिन्हें किसी दूसरी भाषा में पूरी तरह व्यक्त करना हमेशा संभव नहीं होता। प्रत्येक भाषाई समुदाय मानवता की साझा कहानी में अपनी विशिष्ट आवाज जोड़ता है।

वैश्वीकरण, पलायन, शहरीकरण और प्रमुख भाषाओं के बढ़ते प्रभाव ने भाषाओं के लुप्त होने की प्रक्रिया को तेज कर दिया है। अनेक परिवारों में माता-पिता बच्चों को केवल अधिक प्रचलित भाषाएँ बोलने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे बच्चों की शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। दूसरी भाषाएँ सीखना निस्संदेह उपयोगी है, लेकिन प्रगति की कीमत अपनी मातृभाषा को त्यागना नहीं होनी चाहिए।

इस प्रवृत्ति को रोकने में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। विशेषकर प्रारंभिक वर्षों में बच्चों को अपनी मातृभाषा में सीखने के अवसर मिलने चाहिए। विद्यालयों में कहानी सुनाने के सत्र, स्थानीय भाषाओं में साहित्यिक गतिविधियाँ, लोकगीत प्रतियोगिताएँ और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। पुस्तकालय क्षेत्रीय साहित्य को संरक्षित कर सकते हैं, जबकि डिजिटल मंच ऑडियो, वीडियो, शब्दकोशों और ऑनलाइन शिक्षण संसाधनों के माध्यम से संकटग्रस्त भाषाओं को सुरक्षित रखने तथा उनके प्रसार में सहायता कर सकते हैं।

सरकारों, विश्वविद्यालयों, लेखकों, शोधकर्ताओं और सामाजिक संगठनों को संकटग्रस्त भाषाओं का दस्तावेजीकरण करने तथा उन्हें पुनर्जीवित करने के लिए मिलकर काम करना चाहिए। लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी संबंधित समुदायों की अपनी है। कोई भाषा तभी जीवित रहती है, जब लोग उसे घरों में बोलते हैं, दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं, उसमें साहित्य रचते हैं और अगली पीढ़ी तक पहुँचाते हैं। दस्तावेजीकरण महत्वपूर्ण है, लेकिन भाषा का जीवंत संवाद का माध्यम बने रहना भी आवश्यक है।

तकनीक इस प्रयास में एक शक्तिशाली सहयोगी बन सकती है। डिजिटल शब्दकोश, अनुवाद के साधन, भाषा सीखने वाले ऐप, पॉडकास्ट और ऑनलाइन अभिलेखागार युवाओं को अपनी भाषाई विरासत से दोबारा जोड़ सकते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी भाषा संरक्षण में सहायता कर सकती है, बशर्ते संबंधित समुदायों का अपने ज्ञान और सांस्कृतिक संसाधनों पर अधिकार बना रहे।

भाषाई विविधता की रक्षा करने का अर्थ प्रगति का विरोध करना या दूसरी भाषाएँ सीखने से इनकार करना नहीं है। बहुभाषिकता व्यक्ति और समाज दोनों को समृद्ध बनाती है। कोई व्यक्ति वैश्विक संवाद के लिए अंग्रेजी सीख सकता है, व्यापक सांस्कृतिक संपर्क के लिए हिंदी या पंजाबी अपना सकता है और साथ ही अपनी स्थानीय अथवा पैतृक भाषा को गर्व से बोल सकता है। वास्तविक उद्देश्य ऐसा संसार बनाना है, जहाँ भाषाएँ अस्तित्व के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने के बजाय एक-दूसरे की पूरक बनें।

हर लुप्त होती भाषा मानवता की सांस्कृतिक संपदा को कम करती है। जब किसी भाषा का अंतिम धाराप्रवाह वक्ता मौन हो जाता है, तो उसके साथ कौन-सा ज्ञान, रचनात्मकता और सोचने के अनूठे तरीके समाप्त हो जाते हैं, इसका हमें शायद कभी पूरी तरह पता न चल सके। इसलिए संकटग्रस्त भाषाओं की रक्षा केवल अतीत की स्मृतियों को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि मानव ज्ञान, गरिमा और विविधता में निवेश है।

भाषा तभी जीवित रहती है, जब उसे बोला, गाया, लिखा, सिखाया और प्रेम किया जाता है। आइए, बच्चों को अपनी मातृभाषा से प्रेम करना सिखाएँ, स्थानीय साहित्य को प्रोत्साहित करें और प्रत्येक भाषाई समुदाय का सम्मान करें। मानवता को एक-दूसरे के करीब आने के लिए कम भाषाओं की आवश्यकता नहीं है, बल्कि विभिन्न भाषाओं के बीच अधिक समझ, सहयोग और सम्मान की आवश्यकता है।

*जब कोई भाषा मरती है, तो एक संसार मिट जाता है। जब कोई भाषा जीवित रहती है, तो मानवता का एक अनूठा हिस्सा भी जीवित रहता है।*

*डॉ. विजय गर्ग*
सेवानिवृत्त प्राचार्य | शिक्षाविद् एवं प्रख्यात वैज्ञानिक
स्ट्रीट कौर चंद, एम.एच.आर. मलोट, पंजाब – 152107
मोबाइल: 9465682110

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