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Tuesday, September 29, 2026

महिला सुरक्षा: कागज़ी व्यवस्था से आगे ज़मीनी जवाबदेही की दरकार

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(डॉ. दीपक गोस्वामी-विनायक फीचर्स)

सड़क खुली है, बाजार खुला है, बस चल रही है, पार्क खुला है,फिर भी बेटी के लिए रास्ता सुरक्षित क्यों नहीं? यह प्रश्न किसी एक शहर, एक सरकार, एक पुलिस थाने या किसी एक अपराधी का नहीं है। यह भारतीय गणराज्य की उस संवैधानिक प्रतिज्ञा की परीक्षा है, जिसमें प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के साथ जीने का अधिकार दिया गया है।
संविधान का अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है। अनुच्छेद 15 लिंग के आधार पर भेदभाव से सुरक्षा देता है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इन अधिकारों का अर्थ केवल इतना नहीं कि राज्य बेटी को जीवित रहने दे, अर्थ यह भी है कि वह सार्वजनिक जीवन में भय से सिकुड़कर न जिए। जिस सड़क पर बेटे का रास्ता है, उसी सड़क पर बेटी का अधिकार भी है। फिर बार-बार ऐसा क्यों हो रहा है कि लड़की घर से निकलती है तो परिवार की चिंता उसके कदमों से पहले चलने लगती है?
28 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली-एनसीआर में हाल की बलात्कार और यौन हिंसा की घटनाओं पर स्वतः संज्ञान लिया। न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न भी आया कि 2012 के निर्भया कांड के लगभग चौदह वर्ष बाद सार्वजनिक सुरक्षा की व्यवस्थाओं में वास्तविक बदलाव कितना आया है।
यह किसी आरोपी की दोषसिद्धि का निर्णय नहीं है। यह उससे बड़ा प्रश्न है कि क्या हमारी व्यवस्था अपराध होने के बाद सक्रिय होने से आगे बढ़कर अपराध की संभावना को पहले पहचानने और घटाने में सक्षम हुई है?
यहीं से असली बहस शुरू होती है। दिल्ली के आस्था कुंज पार्क की हाल की घटना में 17 वर्षीय किशोरी के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया। आरोपियों पर स्वयं को पुलिसकर्मी बताकर किशोरी और उसके मित्र को अलग करने का आरोप है। इसी समय दिल्ली-एनसीआर में चलती स्लीपर बस में नाबालिग से कथित सामूहिक दुष्कर्म का मामला भी सामने आया। इन घटनाओं को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने व्यापक सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाए हैं।
यहाँ पत्रकारिता की पहली जिम्मेदारी है,आरोप को आरोप ही लिखना, न्यायिक निष्कर्ष को आरोप से अलग रखना और पीड़िता की पहचान की रक्षा करना लेकिन दूसरी जिम्मेदारी उससे भी बड़ी है,घटना के पीछे छिपे व्यवस्था के छेद को पहचानना। समस्या यह नहीं कि व्यवस्था बिल्कुल नहीं है,समस्या यह है कि वह अंतिम छोर तक कितनी पहुँचती है
महिला सुरक्षा के नाम पर देश में संस्थागत ढाँचा मौजूद है। निर्भया कोष के अंतर्गत वित्त वर्ष 2024-25 तक ₹7,712.85 करोड़ आवंटित किए गए और ₹5,846.08 करोड़ उपयोग किए गए, जो आवंटित राशि का लगभग 76 प्रतिशत है। इसी व्यवस्था के अंतर्गत आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली 112, महिला हेल्पलाइन 181, वन स्टॉप सेंटर, त्वरित न्यायालय, महिला सहायता डेस्क, सुरक्षित शहर परियोजनाएँ, साइबर फोरेंसिक प्रयोगशालाएँ तथा परिवहन सुरक्षा जैसी योजनाएँ समर्थित हैं। इसलिए यह कहना कि सरकार ने महिला सुरक्षा के लिए कुछ किया ही नहीं, तथ्य के विरुद्ध होगा।
लेकिन यहीं से अगला और अधिक असुविधाजनक प्रश्न पैदा होता है कि व्यवस्था तो बनी, पर क्या व्यवस्था चलती भी है?
कैमरा लगा होना और कैमरे की निगरानी होना दो अलग बातें हैं। हेल्पलाइन का नंबर उपलब्ध होना और संकट की घड़ी में प्रभावी सहायता मिलना दो अलग बातें हैं। महिला सहायता डेस्क का बोर्ड लगा होना और पीड़िता को संवेदनशील, प्रशिक्षित तथा त्वरित सहायता मिलना दो अलग बातें हैं। बस में सुरक्षा उपकरण होना और किसी संकट के समय उस व्यवस्था का काम करना दो अलग बातें हैं। यानी चुनौती अब केवल व्यवस्था बनाने की नहीं है। चुनौती है,व्यवस्था को जमीन पर जीवित रखने की।”
सुरक्षा का पहला प्रमाण बजट नहीं, बेटी का व्यवहार है। किसी शहर को सुरक्षित घोषित करने का सबसे सरल तरीका यह नहीं कि उसके पास कितने कैमरे हैं। देखना यह चाहिए कि शाम को कॉलेज से लौटती लड़की क्या सोचती है। क्या वह निर्भय होकर बस में बैठती है? क्या वह सुनसान रास्ते से गुजरते समय सहायता की व्यवस्था जानती है? क्या उसके परिवार को हर शाम यह संदेश भेजना पड़ता है-“कहाँ पहुँची?”
क्या वह किसी पार्क में बैठने से पहले यह सोचती है कि वहाँ कोई देख भी रहा है या नहीं?
यदि नागरिक स्वतंत्रता का उपयोग करने से पहले नागरिक भय की गणना करने लगे, तो समस्या केवल अपराध की नहीं रहती। समस्या सार्वजनिक जीवन की गुणवत्ता की हो जाती है और यही संविधान की असली परीक्षा है।
अपराध के बाद पुलिस की गति महत्वपूर्ण है, अपराध से पहले व्यवस्था की आँख उससे भी महत्वपूर्ण है
अपराध होने के बाद प्राथमिकी, गिरफ्तारी, जांच और अभियोजन आवश्यक हैं लेकिन आधुनिक महिला सुरक्षा इससे पहले शुरू होती है।
कौन से स्थान बार-बार शिकायतों के केंद्र बन रहे हैं?कहाँ प्रकाश व्यवस्था खराब है? कहाँ सार्वजनिक परिवहन की शिकायतें लगातार आ रही हैं? कहाँ स्कूल-कॉलेज से लौटने वाली छात्राओं को परिवहन की समस्या है? कहाँ रात में सार्वजनिक उपस्थिति अचानक समाप्त हो जाती है? कहाँ पहले से दर्ज शिकायतों के बावजूद वही स्थान फिर अपराध की सूचना दे रहा है?
यानी पुलिसिंग को केवल घटना-आधारित नहीं, जोखिम-आधारित भी होना होगा। जिस स्थान पर लगातार शिकायतें हैं, वहाँ अपराध होने के बाद पुलिस भेजना प्रतिक्रिया है। अपराध होने से पहले वहाँ उपस्थिति बढ़ाना रोकथाम है। इन दोनों के बीच ही आधुनिक सार्वजनिक सुरक्षा का अंतर छिपा है।
हमारे देश में कानून कठोर है,लेकिन अब सवाल उसकी निश्चितता और गति का है। महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों के लिए वर्तमान कानूनों में गंभीर दंडात्मक प्रावधान मौजूद हैं। भारतीय न्याय संहिता, 2023 में बलात्कार और सामूहिक बलात्कार सहित यौन अपराधों के लिए विशिष्ट प्रावधान हैं। इसलिए हर घटना के बाद केवल कानून और कठोर करो, कहना समस्या का पूरा समाधान नहीं है। अपराधी के मन में भय केवल दंड की अधिकतम अवधि से नहीं पैदा होता। भय पैदा होता है जब उसे विश्वास हो कि पकड़े जाने की संभावना वास्तविक है,साक्ष्य सुरक्षित रहेंगे,जांच टलेगी नहीं,गवाह टूटेगा नहीं,मुकदमा अनिश्चितकाल तक नहीं खिंचेगा और दोष सिद्ध होने पर कानून लागू होगा। यही कारण है कि महिला सुरक्षा को पुलिस, अभियोजन, फोरेंसिक, न्यायपालिका और प्रशासन सभी की संयुक्त जिम्मेदारी मानना होगा।
मात्र मुकदमा दर्ज होना न्याय मिलना नहीं है। इसी कारण राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों की चर्चा करते समय एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। दर्ज मामलों की संख्या अपराध की गंभीरता का संकेत देती है, लेकिन वह अपने-आप में अपराध की वास्तविक कुल संख्या नहीं बताती, उसी प्रकार किसी वर्ष निपटाए गए मामलों में दोषसिद्धि का प्रतिशत कुल दर्ज मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता।
यही कारण है कि आँकड़ों को राजनीतिक या सामाजिक नारे में बदलने के बजाय उनकी संरचना समझना जरूरी है। असल सवाल तीन हैं- कितने मामले दर्ज हुए? कितने मामलों की जांच समय पर पूरी हुई?कितने मामलों में न्यायिक प्रक्रिया पूरी हुई और दोष सिद्ध होने पर दंड मिला? और चौथा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है,कि जो मामला वर्षों तक लंबित रहा, उसकी कीमत किसने चुकाई? पीड़िता ने,परिवार ने,गवाह नेऔर अंततः न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता ने।
नाबालिग पीड़िता के मामले में मीडिया और समाज की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। पॉक्सो अधिनियम की धारा 23 मीडिया में बच्चे की पहचान उजागर करने पर रोक लगाती है। नाम, पता, फोटो, परिवार, विद्यालय, पड़ोस अथवा ऐसी अन्य जानकारी प्रकाशित नहीं की जा सकती जिससे पहचान सामने आए, सिवाय कानून में निर्धारित सीमित अपवाद के।
इसलिए किसी घटना की रिपोर्टिंग करते समय “कहाँ की लड़की”, “किस मोहल्ले की”, “किस विद्यालय की” जैसे विवरण भी सावधानी से देखने होंगे और मोबाइल युग ने इस खतरे को और बड़ा कर दिया है। किसी अपराध का वीडियो बनाकर प्रसारित करना पीड़िता के लिए घटना के बाद भी हिंसा को जारी रख सकता है। वीडियो मिटाना केवल डिजिटल सफाई नहीं,पीड़िता की गरिमा की रक्षा है। वीडियो आगे भेजने वाला व्यक्ति यह तर्क नहीं दे सकता कि उसने स्वयं अपराध नहीं किया। क्योंकि डिजिटल प्रसार पीड़िता की पहचान, भय और सामाजिक अपमान को बढ़ा सकता है।
समाज की सबसे बड़ी भूल है बेटी की स्वतंत्रता को खतरा मान लेना।“शाम से पहले घर आ जाना।” “अकेले मत जाना।” “उस रास्ते से मत जाना।”“लड़कों के साथ मत बैठना।”“बस में सावधान रहना।” इन सलाहों में माता-पिता की चिंता है, उन्हें अपराध कहना उचित नहीं।
लेकिन यदि पूरी सामाजिक व्यवस्था का समाधान अंततः लड़की के कदम छोटे करने में बदल जाए, तो हमने अपराधी को नहीं, पीड़िता की स्वतंत्रता को नियंत्रित करना शुरू कर दिया है। सावधानी तो हर स्तर पर जरूरी है लेकिन सावधानी को स्वतंत्रता का विकल्प बनाना संविधानसम्मत समाधान नहीं हो सकता।
लड़की का पार्क में बैठना अपराध नहीं है। बस में अकेले यात्रा करना अपराध नहीं है। कॉलेज जाना अपराध नहीं है। बाजार जाना अपराध नहीं है। रात की पाली में काम करना भी अपराध नहीं। अपराध वह है जो अपराधी करता है। बस इस एक वाक्य को समाज की चेतना में गहराई तक उतरना होगा।
संस्कार जरूरी हैं, लेकिन केवल संस्कार कह देना पर्याप्त नहीं। यौन अपराधों की चर्चा होते ही हम अक्सर संस्कार ही नहीं हैं, कहकर रुक जाते हैं। संस्कार निश्चित रूप से आवश्यक हैं,सम्मान, सहमति, मर्यादा, आत्मनियंत्रण और दूसरे मनुष्य को वस्तु न समझने की शिक्षा बचपन से होनी चाहिए। लेकिन अपराध केवल संस्कार की कमी का परिणाम मान लेना भी वैज्ञानिक और प्रशासनिक दृष्टि से अधूरा है।
अपराध पर प्रभाव डालने वाली कई परतें हैं।परिवार,विद्यालय,डिजिटल वातावरण,नशे की उपलब्धता,
सार्वजनिक स्थानों की संरचना,पुलिस की उपस्थिति,कानून का पालन,साक्ष्य की गुणवत्ता,न्याय की गति और अपराध के बाद सामाजिक प्रतिक्रिया।
संस्कार मनुष्य को भीतर से रोकता है, कानून बाहर से सीमा खींचता है,व्यवस्था उस सीमा को लागू करती है।
हमें तीनों चाहिए।
अब केवल नए नारे नहीं, मापी जा सकने वाली जवाबदेही चाहिए। हर संवेदनशील सार्वजनिक स्थान का सुरक्षा मानचित्र बने। बार-बार शिकायत वाले हर स्थान की अलग निगरानी हो। खराब प्रकाश व्यवस्था की शिकायत के लिए समयबद्ध उत्तरदायित्व तय हो।
सार्वजनिक परिवहन में सत्यापन, वाहन-स्थान निगरानी और शिकायत तंत्र का नियमित परीक्षण हो।आपातकालीन प्रणालियों की केवल संख्या नहीं, वास्तविक प्रतिक्रिया और परिणाम का भी स्वतंत्र मूल्यांकन हो। पुलिस थाने में महिला सहायता डेस्क केवल कक्ष न हो,वह प्रशिक्षित मानव सहायता केंद्र बने।
यौन अपराधों की जांच में वैज्ञानिक साक्ष्य, फोरेंसिक क्षमता और अभियोजन के बीच समन्वय मजबूत हो।
पीड़िता को न्याय की प्रक्रिया में केवल मामले की गवाह नहीं, गरिमा और अधिकार वाली नागरिक माना जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण,जिस विभाग की जिम्मेदारी तय है, उसके काम का सार्वजनिक प्रदर्शन-आकलन हो।
कितनी सड़कें सुरक्षित हुईं? कितने जोखिम वाले स्थान सुधरे? कितनी शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हुई? कितने मामलों में जांच समय पर पूरी हुई? कितने गवाह सुरक्षित रहे? कितने मामलों में पीड़िता को सहायता मिली? सुरक्षा को इन परिणामों से मापा जाना चाहिए।
किसी क्षेत्र में अपराध हो गया, इसलिए संबंधित अधिकारी को स्वतः दोषी ठहरा देना न्याय नहीं है। लेकिन यदि जांच में यह सामने आए कि शिकायत की उपेक्षा हुई, निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, सुरक्षा व्यवस्था जानबूझकर निष्क्रिय छोड़ी गई या कर्तव्य में प्रमाणित लापरवाही हुई, तो जवाबदेही से बचना भी न्याय नहीं है।
न तो भीड़ का न्याय, न प्रशासन की ढाल,केवल कानून का शासन। यही संविधान का संतुलन है।
जिम्मेदार केवल अपराधी नहीं लेकिन सबसे पहले अपराध का उत्तरदायित्व अपराधी का ही है। उसके बाद वह व्यवस्था जिम्मेदार है जो अपने अधिकार क्षेत्र में उपलब्ध साधनों का उपयोग नहीं करती। वह परिवहन तंत्र जिम्मेदार है जो निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन नहीं करता। वह प्रशासनिक तंत्र जिम्मेदार है जो बार-बार सामने आ रहे जोखिमों को पहचानकर भी सुधार नहीं करता। वह जांच व्यवस्था जिम्मेदार है जो वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने में विफल होती है।
न्यायिक व्यवस्था नहीं, बल्कि व्यापक तंत्र की लंबित प्रक्रियाएँ प्रश्नों के घेरे में आती हैं क्योंकि न्यायपालिका भी संवैधानिक सीमाओं और निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों के भीतर काम करती है। और समाज भी जिम्मेदार है जब वह अपराधी से प्रश्न पूछने के बजाय पीड़िता के चरित्र की जांच शुरू कर देता है। मीडिया भी जिम्मेदार है जब वह सनसनी को खबर और पीड़िता की पहचान को सामग्री बना देता है। डिजिटल समाज भी जिम्मेदार है जब वह किसी की त्रासदी को आगे भेजने योग्य दृश्य समझ लेता है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हमारी बेटी को सुरक्षित रहने के लिए स्वतंत्रता छोड़नी होगी? यदि उत्तर हाँ है, तो हमने सुरक्षा की परिभाषा गलत बना दी है।
सुरक्षित शहर वह नहीं जहाँ लड़कियों को जल्दी घर लौटना पड़े,सुरक्षित शहर वह है जहाँ उन्हें लौटने की जल्दी नहीं, विश्वास हो। सुरक्षित बस वह नहीं जिसमें अपराध होने के बाद पुलिस पहुँच जाए। सुरक्षित बस वह है जिसमें अपराध की संभावना को पहले ही गंभीरता से लिया गया हो। सुरक्षित पार्क वह नहीं जहाँ घटना के बाद कैमरे खोजे जाएँ। सुरक्षित पार्क वह है जहाँ प्रकाश, दृश्यता, निगरानी और त्वरित सहायता पहले से मौजूद हों। सुरक्षित समाज वह नहीं जो बेटी से कहे “तुम बाहर मत निकलो।” सुरक्षित समाज वह है जो अपराधी से कहे-“तुम्हारी वजह से किसी नागरिक की स्वतंत्रता छोटी नहीं होगी।”
यही इस पूरे प्रश्न का संवैधानिक केंद्र है। लाड़ली बिटिया को सुरक्षा के नाम पर घर की चारदीवारी में वापस धकेलना समाधान नहीं। उसे निर्भय होकर सड़क पर चलने का अधिकार देना ही समाधान की दिशा है क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा संसद के भीतर नहीं होती।
उसकी असली परीक्षा उस सड़क पर होती है,जहाँ रात उतर रही हो,एक लड़की अकेली घर लौट रही हो,
और उसके माता-पिता को फोन पर यह पूछने की जरूरत न पड़े कि “बेटी,कहाँ पहुँची?” बल्कि उन्हें विश्वास हो कि
“भारत का संविधान उसके साथ चल रहा है।” (विनायक फीचर्स)

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