नई दिल्ली। यूपीआई के जरिए होने वाले बड़े कारोबारी भुगतानों पर प्रस्तावित शुल्क के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। हालांकि अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर पूछा है कि ₹2000 से अधिक के व्यापारी भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाने का नियम किस आधार पर तय किया गया है। मामले की अगली सुनवाई में सरकार को अपना पक्ष रखना होगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने अधिवक्ता अंजन दत्ता की जनहित याचिका पर सुनवाई की। याचिका में ₹2000 की सीमा तय करने के आधार और यूपीआई तथा रुपे कार्ड के लिए अलग-अलग व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने इस व्यवस्था को रद्द करने की मांग की है।
याचिका में यह भी दलील दी गई कि शुल्क से जुड़ा फैसला पर्याप्त सार्वजनिक चर्चा के बिना किया गया। याचिकाकर्ता ने भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10ए को भी चुनौती दी है। उनका कहना है कि इस प्रावधान के जरिए सरकार को डिजिटल भुगतान के अलग-अलग माध्यमों पर शुल्क तय करने की व्यापक शक्ति मिलती है।
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमण ने अदालत को बताया कि आम लोगों के बीच होने वाले यूपीआई लेनदेन पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा। सरकार का कहना है कि छोटे कारोबारियों के अधिकांश भुगतानों पर भी नए शुल्क का असर नहीं पड़ेगा।
प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, जिन व्यापारियों का मासिक यूपीआई संग्रह ₹1 लाख से अधिक है, उनके लिए ₹2000 से अधिक के प्रत्येक भुगतान पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट लागू होगा। इसके साथ जीएसटी भी देय होगा। वहीं ₹2000 तक के भुगतान पर शुल्क नहीं लगेगा। ₹75,000 या उससे अधिक के एक भुगतान पर शुल्क की अधिकतम सीमा ₹300 और उस पर जीएसटी बताई गई है।
छोटे व्यापारियों के लिए अलग व्यवस्था रखी गई है। जिनका मासिक यूपीआई संग्रह ₹1 लाख तक है, उनके लेनदेन पर शुल्क नहीं लगेगा। यदि कोई व्यापारी लगातार तीन महीने तक इस सीमा से अधिक यूपीआई भुगतान प्राप्त करता है, तो उसे बड़े व्यापारी की श्रेणी में रखा जा सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि ₹2000 की सीमा पूरे दिन की बिक्री पर नहीं, बल्कि प्रत्येक अलग भुगतान पर लागू होगी।
मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने की सुविधा के बदले व्यापारी से लिया जाता है। यह ग्राहक से सीधे वसूल किया जाने वाला शुल्क नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद फिलहाल प्रस्तावित व्यवस्था पर रोक नहीं लगी है, लेकिन केंद्र सरकार को इसके आधार और कानूनी व्यवस्था पर अदालत के सवालों का जवाब देना होगा।


