(डॉ.दीपक गोस्वामी-विभूति फीचर्स)
पीली सरसों से ढके खेत जब धरती पर सुनहरी चादर बिछाते हैं, तब भारत की कृषि-समृद्धि का अद्भुत दृश्य दिखाई देता है। लेकिन इसी सुनहरी फसल के पीछे एक कड़वा सत्य भी खड़ा है जिस देश की मिट्टी मूंगफली, सरसों, सोयाबीन और सूरजमुखी पैदा करती है, वही देश खाद्य तेल के लिए विदेशों पर निर्भर हो गया है?
भारत हर वर्ष लगभग 280 लाख टन खाद्य तेल की खपत करता है और इसका बड़ा हिस्सा आयात करना पड़ता है। हाल के वर्षों में लगभग 140 लाख टन खाद्य तेल आयात हुआ, जिसमें करीब 69 लाख टन पाम तेल था। वैश्विक बाजार में होने वाला एक निर्णय भारत की रसोई तक पहुँच जाता है। इंडोनेशिया द्वारा जैव-डीजल में पाम तेल का मिश्रण बढ़ाने की घोषणा और उसके बाद उस निर्णय के टलने से यह स्पष्ट हुआ कि हमारी खाद्य तेल सुरक्षा अभी भी अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भर है। यह केवल व्यापार का विषय नहीं, इससे हमारी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा भी प्रभावित हो रही है।
हमारे यहां सबसे पहला संकट बीज का है। कृषि अनुसंधान संस्थानों ने अधिक उत्पादन, रोग प्रतिरोध और सूखा सहनशीलता वाली अनेक उन्नत किस्में विकसित की हैं, लेकिन प्रयोगशाला से खेत तक पहुँचने में भारी अंतर दिखाई देता है। उदाहरण के लिए सोयाबीन की उत्पादकता भारत में कई क्षेत्रों में ब्राजील जैसे प्रमुख उत्पादक देशों से काफी कम है। सरसों में भी संभावित उत्पादकता और वास्तविक औसत उत्पादकता के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
भरतपुर स्थित सरसों अनुसंधान तंत्र से विकसित नई किस्में इस अंतर को कम करने की क्षमता रखती हैं। कुछ उन्नत किस्मों और संकरों में 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन की संभावना बताई जाती है, जबकि देश की औसत उत्पादकता इससे काफी नीचे है। अब लग रहा है कि हमारे देश में समस्या केवल वैज्ञानिक ज्ञान की नहीं है,समस्या ज्ञान के खेत तक पहुँचने की है।
सोयाबीन में भी यही कहानी दिखाई देती है। भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित कुछ किस्में कम अवधि, रोग प्रतिरोध और सूखा सहनशीलता जैसी विशेषताओं के साथ उपलब्ध हैं। फिर भी अनेक क्षेत्रों में वैज्ञानिक प्रदर्शन और किसान के वास्तविक उत्पादन के बीच उल्लेखनीय अंतर रहता है। किसान को किस्म का नाम पता होना पर्याप्त नहीं है, उसे प्रमाणित बीज, सही समय, सही मात्रा और सही कृषि तकनीक भी मिलनी चाहिए।
सूरजमुखी की कहानी और भी गंभीर है। उन्नत संकर किस्म ने उत्पादन और तेल प्रतिशत बढ़ाने की क्षमता दिखाई है, फिर भी देश में इसका क्षेत्रफल लंबे समय में काफी घटा है। कारण स्पष्ट है,किसान उस फसल की ओर क्यों जाएगा जिसके लिए उसे सुनिश्चित बाजार, उचित मूल्य और जोखिम से सुरक्षा नहीं मिले?
यही दूसरा संकट है,किसान को अपनी उपज की कीमत का भरोसा नहीं है। सरकार समर्थन मूल्य घोषित करती है, लेकिन यदि वास्तविक खरीद सीमित हैं तो घोषित मूल्य किसान की आय की गारंटी नहीं बनता। मंडी में किसान को मजबूरी में कम कीमत पर उपज बेचनी पड़ती है। फसल आने के समय यदि बाजार में सस्ता आयातित तेल उपलब्ध हो जाए तो घरेलू तिलहन पर दबाव और बढ़ जाता है। किसान की लागत बढ़ती है, लेकिन उसका मूल्य-निर्धारण उसके हाथ में नहीं रहता।
तीसरा संकट मौसम का है। सोयाबीन और मूंगफली जैसी फसलें वर्षा की अनिश्चितता से प्रभावित होती हैं। सूरजमुखी जैसी फसलों में पक्षियों और अन्य जैविक जोखिमों का प्रभाव पड़ सकता है। फसल बीमा की राशि यदि नुकसान के महीनों बाद मिले तो वह तत्काल संकट का समाधान नहीं कर पाती। किसान को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें जोखिम का बोझ अकेले उसके कंधे पर न हो।
चौथा संकट आयात नीति का है। यदि घरेलू सरसों की आवक के समय आयातित पाम तेल सस्ता हो जाए तो बाजार में प्रतिस्पर्धा असमान हो जाती है। इसलिए खाद्य तेल की आयात नीति को केवल उपभोक्ता के लिए सस्ता तेल उपलब्ध कराने के दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। उसमें किसान, उपभोक्ता और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता,तीनों का संतुलन आवश्यक है।
लेकिन इन सभी संकटों से भी अधिक चिंताजनक है मिलावट का संकट। एक ओर किसान अपने खेत में शुद्ध सरसों पैदा करता है, उसे कोल्हू या छोटी मिल में प्रसंस्कृत करके शुद्ध तेल बनाता है। दूसरी ओर बाजार में सस्ता तेल उपभोक्ता को आकर्षित करता है। यदि किसी सस्ते तेल को दूसरे तेल के नाम पर बेचा जाए या लेबल और प्रस्तुति से उपभोक्ता को भ्रमित किया जाए तो नुकसान केवल ग्राहक का नहीं होता। इससे शुद्ध तेल बनाने वाला किसान भी बाजार में कमजोर पड़ता है।
शुद्धता की कीमत अधिक होती है, लेकिन मिलावट बाजार को कृत्रिम रूप से सस्ता बनाती है। परिणाम यह होता है कि उपभोक्ता शुद्ध तेल को महँगा समझता है और किसान को अपनी गुणवत्ता का उचित मूल्य नहीं मिलता। इस प्रकार मिलावट केवल खाद्य अपराध नहीं, बल्कि किसान की अर्थव्यवस्था पर भी हमला है। इसका समाधान केवल छापेमारी नहीं है,इसके लिए हमें पूरी आपूर्ति श्रृंखला को बदलना होगा।
पहला कदम होना चाहिए- गाँव तक प्रमाणित उन्नत बीज की समयबद्ध उपलब्धता। कृषि विश्वविद्यालय और अनुसंधान संस्थान नई किस्म विकसित करें, लेकिन उसकी सफलता तभी मानी जाए जब प्रमाणित बीज किसान के खेत तक पहुँचे और उसकी उत्पादकता में वास्तविक सुधार दिखाई दे।
दूसरा कदम है- गाँव के निकट प्रसंस्करण। किसान केवल बीज बेचने वाला न रहे,उसे तेल और खली दोनों का मूल्य प्राप्त हो। छोटे किसान उत्पादक समूह बनाकर स्थानीय तेल मिलें स्थापित कर सकते हैं। इससे परिवहन लागत घटेगी, रोजगार बढ़ेगा और किसान को मूल्यवर्धन का हिस्सा मिलेगा।
तीसरा कदम है-मूल्य की पारदर्शिता। समर्थन मूल्य की घोषणा के साथ प्रभावी खरीद व्यवस्था हो। जहाँ बाजार मूल्य समर्थन मूल्य से नीचे जाए, वहाँ अंतर की भरपाई की व्यवस्था पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
चौथा कदम है-आयात नीति का पूर्वानुमेय कैलेंडर। किसान को बुवाई के समय यह पता होना चाहिए कि फसल आने पर आयात शुल्क और व्यापार नीति कैसी होगी। अचानक नीति परिवर्तन किसान के निवेश को जोखिम में डालता है।
पाँचवाँ और सबसे निर्णायक कदमहै-मिलावट के विरुद्ध तकनीक आधारित युद्ध। हर जिले में नियमित मोबाइल परीक्षण प्रयोगशालाएँ हों। खाद्य तेल के नमूनों की जांच बढ़ाई जाए। दोषी व्यापारियों और निर्माताओं के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई हो। साथ ही शुद्ध स्थानीय तेल को डिजिटल पहचान दी जा सकती है। एक क्यूआर कोड, जिससे उपभोक्ता उत्पाद का स्रोत, उत्पादन की तारीख, प्रसंस्करण केंद्र और प्रमाणन जैसी जानकारी देख सके।
कल्पना कीजिए कि आप एक बोतल सरसों का तेल खरीदें तो उस बोतल पर लिखा हो कि यह किस किसान उत्पादक समूह की सरसों से बना है, किस गाँव में इसका प्रसंस्करण हुआ और इसकी गुणवत्ता की जांच कहाँ हुई। तब उपभोक्ता केवल तेल नहीं खरीदेगा,वह विश्वास खरीदेगा।
सरकार ने खाद्य तेल के क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर तिलहन और ऑयल पाम से संबंधित योजनाएँ शुरू की हैं। इन पहलों की वास्तविक सफलता का पैमाना केवल कितने पौधे लगाए गए या कितनी राशि स्वीकृत हुई, यह नहीं होना चाहिए। असली प्रश्न यह होना चाहिए कि क्या किसान की आय बढ़ी, क्या घरेलू उत्पादन बढ़ा, क्या आयात निर्भरता घटी और क्या उपभोक्ता को शुद्ध तेल मिला? भारत की खाद्य तेल समस्या का समाधान किसी एक योजना में नहीं छिपा है। इसका उत्तर खेत के बीज से लेकर रसोई की बोतल तक पूरी व्यवस्था में है।
हमें ऐसा भारत बनाना होगा जहाँ किसान अच्छी किस्म का बीज बोए, उसे उचित मूल्य मिले, गाँव में ही उसका प्रसंस्करण हो, शुद्ध तेल को प्रमाणित बाजार मिले और उपभोक्ता निश्चिंत होकर उसे खरीदे क्योंकि तेल केवल रसोई की वस्तु नहीं है। यह किसान की आय, उपभोक्ता के स्वास्थ्य, ग्रामीण रोजगार, विदेशी मुद्रा और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता,इन सभी को जोड़ने वाली आर्थिक धारा है।
आज हमारे सामने अवसर है। यदि हम बीज की गुणवत्ता सुधारें, अनुसंधान को खेत तक पहुँचाएँ, किसान को मूल्य का भरोसा दें, प्रसंस्करण गाँव तक ले जाएँ, आयात नीति को स्थिर बनाएं और मिलावट पर निर्णायक प्रहार करें, तो भारत अपनी खाद्य तेल निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकता है। (विभूति फीचर्स)


