(अंजनी सक्सेना-विभूति फीचर्स)
द्वापर में जब अनीति और अत्याचार चरम पर था, तब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर कुराज्य को मिटाया और सुराज्य की स्थापना की। बंदी-गृह में जन्म लेकर गोकुल में पले इस बालक ने कंस और जरासंध तक को परास्त किया और क्रांतिकारी नायक बनकर दुनिया को कर्मयोग का संदेश दिया।
श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर भगवान ने उस युग में फैली हुई अनीति और मूढ़ता को परास्त किया। अनीति बरतने वाले तृणावर्त, अघासुर, वत्सासुर, पूतना, कालिया नाग आदि धूर्तों से उन्होंने बचपन में ही टक्कर ली। थोड़े बड़े होने पर अन्यायी शासक कंस से भिड़ गए और कुराज्य को मिटाकर सुराज्य की स्थापना की।
उस समय निरीह प्रजा को अपना सारा दूध, घी धनिकों और सरदारों को देना पड़ता था। गोपियों को उनके आगे न झुकने और अपना आवश्यक भोजन स्वयं ही रखने के लिए उन्होंने सत्याग्रह करना सिखाया। उनका रास्ता रोका और सत्ताधारियों से न डरने का साहस उत्पन्न किया। बड़े हुए तो समझाने-बुझाने से न हटते देखकर उन्होंने महाभारत की योजना बनाई और स्वल्प साधन सम्पन्न पांच पांडवों को सत्ताधारी सौ कौरवों के समक्ष न्याय की मांग लेकर अड़ जाने के लिए खड़ा कर दिया। अठारह अक्षौहिणी सेना और अगणित सुभट मारे गए, पर इससे क्या? न्याय की रक्षा के लिए जो भी कीमत चुकानी पड़े, वह कम है।
उन दिनों भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटा हुआ था। छोटे-छोटे सामंत अपनी अलग-अलग सत्ता बनाए रखने के लिए देश को खंड-खंड में बांटे हुए थे। वे एकता की शक्ति से परिचित होते हुए भी अपने संकुचित स्वार्थों के लिए पृथकतावाद को ही प्रश्रय देते थे। इन पृथकतावादियों के विनाश की योजना बनाकर भगवान कृष्ण ने महाभारत युद्ध कराया और खंड-खंड भारत को एक परिपूर्ण राज्य, महाभारत बना दिया। इसके लिए युद्ध के रूप में भारी कीमत चुकानी पड़ी, पर कीमत चुकाए बिना कीमती चीज मिलती भी कहां है?
धर्म-अभिवर्धन के लिए जीवित रहने वाले ब्राह्मणों में श्रेष्ठ सुदामा को उन्होंने विपुल साधन प्रदान किए, ताकि वह संसार का अधिक भला करने में सफल हो सके। ग्वाल-बालों की सहायता से गोवर्धन जैसा महान पर्वत अंगुली पर उठा लिया। गौ ही तो मनुष्य की सच्ची संपत्ति है। उसका संवर्धन इतना महत्वपूर्ण समझा गया कि इस कार्य को करने के लिए भगवान ने स्वयं गौएं चराईं, गोप बने और गो-संवर्धन हेतु गोवर्धन जैसे महान और कठिन पर्वत को अंगुली पर उठाने जैसा सरल बनाकर दिखा दिया। इंद्र तक से टक्कर ली और ब्रजभूमि को जल-प्रलय से बचा लिया। गौ-वत्स चुराने वाले ब्रह्मा तक को मुंह की खानी पड़ी। अन्यायी जरासंध का मद चूर्ण किया।
कैदी माता-पिता की गोद में बंदी-गृह में उत्पन्न होने वाला, दूसरों के घर पलने वाला, गोप-परिवार में जन्म लेने वाला बालक भी अपने आत्मबल और पुरुषार्थ से कितना कुछ कर सकता है, भगवान कृष्ण ने अपना उदाहरण प्रस्तुत करके उन लोगों का मनोबल बढ़ाया, जो छोटी या साधनहीन परिस्थितियों में जन्मे या पले होने के कारण ऊंचे उठने की आशा ही छोड़ बैठते हैं। अर्जुन के सारथी बनकर उन्होंने बताया कि संसार में कोई काम छोटा नहीं है और लोक-कल्याण के लिए, धर्म-रक्षा के लिए छोटे दिखने वाले कार्यों को भी प्रसन्नतापूर्वक करना चाहिए।
धर्मराज्य स्थापित करने के लिए भगवान कृष्ण ने अपना सारा जीवन लगाया। धर्म ही इस संसार का सार है। मनुष्य जाति की प्रगति और इस निखिल विश्व की शांति इसी पर निर्भर है। हर परिस्थिति में हंसते रहना ही कृष्ण का जीवन-दर्शन है। भगवान कृष्ण के जीवन का प्रारंभ ही एक ओर संघर्ष और दूसरी ओर लोक-कलाओं की प्रतिष्ठा से होता है। जो कलाएं राजाओं के भोग-विलास के लिए समर्पित थीं, भगवान कृष्ण ने उन्हें भक्ति और कल्याण की ओर मोड़ा। गीता के द्वारा उन्होंने कर्मयोग की शिक्षा दी। *(विभूति फीचर्स)*


