‘नशा मुक्त युवा’ का संकल्प युवाओं की रचनात्मक ताकत को बदलाव का माध्यम बनाने पर जोर
किसी भी राष्ट्र की वास्तविक ताकत उसकी युवा पीढ़ी होती है। युवा स्वस्थ, शिक्षित, जागरूक और लक्ष्य के प्रति समर्पित हों तो देश की विकास यात्रा को गति मिलती है, लेकिन यही युवा यदि नशे की गिरफ्त में आ जाएं तो इसका नुकसान केवल उनके भविष्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार, समाज और अंततः राष्ट्र की उत्पादक क्षमता पर भी पड़ता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ के 137वें संस्करण में इसी गंभीर चुनौती को केंद्र में रखते हुए देश के युवाओं से नशे के खिलाफ निर्णायक सामाजिक अभियान खड़ा करने का आह्वान किया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत’ अभियान तेजी से देशव्यापी रूप ले रहा है और बड़ी संख्या में युवा इससे जुड़ रहे हैं। संदेश साफ है कि नशामुक्ति को केवल सरकारी प्रयासों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए परिवार, विद्यालय, सामाजिक संगठन, युवा समूह और आम नागरिक—सभी को अपनी भूमिका निभानी होगी।
नशे की समस्या को अक्सर व्यक्तिगत आदत के रूप में देखा जाता है, जबकि इसका प्रभाव कहीं व्यापक होता है। नशे की गिरफ्त में आया व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक संबंधों को प्रभावित करता है। इसका सीधा असर उसके परिवार पर पड़ता है और कई बार पूरा परिवार मानसिक, सामाजिक और आर्थिक संकट से गुजरने लगता है।
प्रधानमंत्री का यह संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नशामुक्ति को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानने के बजाय इसे सामाजिक जिम्मेदारी और जनभागीदारी से जोड़ने की आवश्यकता है। समाज को नशे के खिलाफ केवल विरोध नहीं करना है, बल्कि उन लोगों की मदद भी करनी है जो पहले से इसकी गिरफ्त में हैं।
प्रधानमंत्री द्वारा 2 अगस्त को शुरू किए गए ‘नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत संकल्प अभियान’ को 100 सप्ताह के राष्ट्रव्यापी जनभागीदारी अभियान के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। अभियान के शुभारंभ के दौरान 28 हजार से अधिक स्थानों से एक करोड़ से ज्यादा युवाओं के जुड़ने का उल्लेख प्रधानमंत्री ने किया।
हर रविवार होने वाली गतिविधियां इस अभियान को केवल भाषणों तक सीमित नहीं रखतीं। खेलकूद, पदयात्रा, ध्यान, सांस्कृतिक कार्यक्रम, नुक्कड़ नाटक और जागरूकता अभियानों के माध्यम से युवाओं को सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
यही वह रास्ता है जिससे नशे के खिलाफ अभियान को एक स्थायी सामाजिक आंदोलन में बदला जा सकता है।
प्रधानमंत्री ने युवाओं को एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी सौंपी। उन्होंने नशामुक्ति के संदेश को रचनात्मक माध्यमों से जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया।
युवा प्रभावी नारे लिखें, संगीतकार नशामुक्त जीवन का संदेश देने वाले गीत तैयार करें और विद्यार्थी तथा रंगमंच से जुड़े समूह ऐसे छोटे नाटक प्रस्तुत करें, जो नशे के दुष्परिणामों के साथ-साथ उससे बाहर निकलने का रास्ता भी दिखाएं।
आज सोशल मीडिया युवाओं की सोच और व्यवहार को प्रभावित करने वाला बड़ा माध्यम है। इसलिए सकारात्मक और प्रेरणादायक सामग्री तैयार कर उसे भारतीय भाषाओं में व्यापक स्तर पर प्रसारित करना नशामुक्ति अभियान को नई ताकत दे सकता है। प्रधानमंत्री ने युवाओं से ऐसी सामग्री सोशल मीडिया पर #NashaMuktYuva के साथ साझा करने की अपील की।
‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री ने ‘हर घर तिरंगा’ अभियान का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार इस बार आठ करोड़ से अधिक तिरंगा सेल्फी अपलोड की गईं। तिरंगे से जुड़ी गतिविधियों का विस्तार देश की सीमाओं से बाहर तक होने का उल्लेख भी किया गया।
तिरंगा केवल राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक नहीं, बल्कि नागरिक जिम्मेदारी और एकता की भावना का भी प्रतीक है। यदि यही भावना समाज को नशामुक्त बनाने, स्वच्छता बढ़ाने और कमजोर वर्गों की मदद करने जैसे अभियानों से जुड़ती है तो देशभक्ति का भाव वास्तविक सामाजिक परिवर्तन में बदल सकता है।
प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश के रामपुर के युवाओं के ‘क्लीन-अप पटवाई’ अभियान का उदाहरण देते हुए बताया कि युवाओं की एक टीम ने चार गंगा घाटों की सफाई कर एक टन से अधिक प्लास्टिक कचरा हटाया। तालाबों और सार्वजनिक स्थानों की सफाई में भी युवाओं ने योगदान दिया।
यह उदाहरण बताता है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो तो छोटे समूह भी अपने आसपास के वातावरण में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। अमरनाथ यात्रा के दौरान स्वच्छता अभियानों में श्रद्धालुओं की भागीदारी भी इसी जनभागीदारी की तस्वीर पेश करती है।
प्रधानमंत्री ने पीएम स्वनिधि योजना का उल्लेख करते हुए महिला रेहड़ी-पटरी कारोबारियों की आर्थिक प्रगति को रेखांकित किया। छोटे कारोबार को आगे बढ़ाने, आय में वृद्धि करने और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में ऐसी योजनाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता केवल उनके व्यक्तिगत जीवन में बदलाव नहीं लाती, बल्कि पूरे परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती है। इसलिए विकास की तस्वीर में छोटे कारोबारियों और महिलाओं की भागीदारी को मजबूत करना आवश्यक है।
प्रधानमंत्री के इस संस्करण का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही रहा कि सामाजिक परिवर्तन केवल सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक प्रयासों से संभव नहीं है। सरकार दिशा दे सकती है, संसाधन उपलब्ध करा सकती है और अभियान चला सकती है, लेकिन किसी अभियान को जनआंदोलन बनाने की ताकत समाज के पास होती है।
नशे के खिलाफ लड़ाई में भी यही सूत्र लागू होता है। परिवार बच्चों से संवाद करें, विद्यालय जागरूकता बढ़ाएं, युवा खेल और रचनात्मक गतिविधियों से जुड़ें, सामाजिक संगठन जरूरतमंदों तक पहुंचें और डिजिटल मंचों पर सकारात्मक संदेश को बढ़ावा दिया जाए—तो नशामुक्त समाज की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।
भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की चर्चा केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं हो सकती। विकसित भारत का अर्थ ऐसा समाज भी है जहां युवा स्वस्थ हों, महिलाएं आत्मनिर्भर हों, सार्वजनिक स्थान स्वच्छ हों और नागरिक अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति जागरूक हों।
इस दृष्टि से ‘नशा मुक्त युवा’ का संदेश सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि जिस देश का युवा नशे से मुक्त, शिक्षा और कौशल से संपन्न तथा सकारात्मक सोच से भरा होगा, वही देश विकास की दौड़ में स्थायी बढ़त हासिल कर सकेगा।
अब जरूरत इस बात की है कि नशामुक्ति का संदेश केवल एक अभियान की अवधि तक सीमित न रहे। इसे परिवार की बातचीत, विद्यालय की शिक्षा, युवाओं की दिनचर्या और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी का हिस्सा बनाया जाए।
नशे के खिलाफ लड़ाई किसी एक सरकार, संगठन या व्यक्ति की लड़ाई नहीं है। यह पूरे समाज की लड़ाई है,और इस लड़ाई में सबसे बड़ी ताकत वही युवा हैं, जिनके कंधों पर भारत के भविष्य की जिम्मेदारी है।


