वीडियो वायरल होने के बाद जागी लखनऊ पुलिस
लखनऊ। नदवा के मौलाना इरफान अहमद रिजवी की हत्या की कथित साजिश का खुलासा करने का दावा करने वाली लखनऊ पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए चार आरोपियों में से तीन महज 24 घंटे के भीतर जमानत पर जेल से बाहर आ गए। हैरानी की बात यह रही कि आरोपियों की रिहाई की जानकारी संबंधित हजरतगंज पुलिस को सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद हुई।
हजरतगंज पुलिस ने 21 अगस्त को हत्या की कथित साजिश में शामिल चार लोगों को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया था। अदालत ने सभी को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। इसके अगले ही दिन 22 अगस्त को तीन आरोपियों को एसीजेएम-3 की अदालत से जमानत मिल गई और रविवार को वे जेल से बाहर आ गए। जमानत पाने वालों में कथित बिचौलिया अमन कुरैशी तथा अधिवक्ता सोहेल अहमद सिद्दीकी और फरहान अहमद सिद्दीकी शामिल बताए गए हैं।
मामले में पुलिस की निगरानी और कानूनी पैरवी पर इसलिए भी सवाल उठ रहे हैं क्योंकि आरोप है कि जमानत से पहले पुलिस से रिपोर्ट तक नहीं मांगी गई और न ही पुलिस को अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस मिला। जमानतदारों के सत्यापन को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि इन प्रक्रियाओं की वास्तविक स्थिति संबंधित न्यायालयी अभिलेखों और पुलिस के आधिकारिक पक्ष से स्पष्ट होगी।
पुलिस के मुताबिक हत्या की साजिश का मामला
पुलिस के अनुसार पूरा मामला नदवा के मौलाना इरफान अहमद रिजवी की हत्या की कथित सुपारी से जुड़ा है। आरोप है कि मदरसे और करोड़ों रुपये की संपत्ति पर कब्जे के विवाद में मौलाना की हत्या की योजना बनाई गई थी। पुलिस ने इससे पहले कथित शूटर मोहम्मद शाहिद और मोहम्मद जमील को चोरी की बाइक और पिस्तौल के साथ गिरफ्तार करने का दावा किया था।
पूछताछ के दौरान पुलिस को कथित तौर पर शूटरों और साजिशकर्ताओं के बीच 157 बार फोन पर बातचीत होने की जानकारी मिली। शूटरों के मोबाइल से मौलाना की तस्वीर मिलने की बात भी सामने आई थी। पुलिस का दावा था कि शूटरों को दो लाख रुपये, पिस्तौल और चोरी की बाइक उपलब्ध कराई गई थी।
अब पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल पुलिस की केस मॉनिटरिंग, अभियोजन से समन्वय और आरोपियों की जमानत पर नजर रखने की व्यवस्था को लेकर है। जिस मामले को पुलिस ने हत्या की साजिश का गंभीर प्रकरण बताते हुए कार्रवाई की, उसके तीन आरोपी इतनी जल्दी जेल से बाहर कैसे आ गए और उनकी रिहाई की जानकारी पुलिस को सोशल मीडिया वीडियो से क्यों मिली—इन सवालों के जवाब अब पुलिस की कार्यप्रणाली पर लगी निगाहों के बीच तलाशे जा रहे हैं।


