नई दिल्ली। डॉ. निर्मलानंद स्वामी, आदि चुचुन गिरी सोसाइटी से संबद्ध, ने नई दिल्ली में एच. एन. शर्मा और प्रशांत तिवारी के साथ हिंदू दर्शन की विभिन्न धाराओं पर गहन एवं विचारोत्तेजक चर्चा की। संवाद का मुख्य केंद्र अद्वैत और द्वैत दर्शन की मूल अवधारणाओं, उनके दार्शनिक आधार तथा भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में उनके महत्व पर रहा।
चर्चा में अद्वैत वेदांत की उस मूल अवधारणा पर विचार किया गया, जिसमें आत्मा और परमात्मा की एकता को प्रमुखता दी जाती है। वहीं द्वैत दर्शन जीव और परमात्मा के बीच भेद को स्वीकार करते हुए भक्ति, ईश्वर के प्रति समर्पण और व्यक्तिगत आध्यात्मिक साधना को विशेष महत्व देता है। दोनों परंपराओं के बीच मौजूद दार्शनिक अंतर के साथ-साथ उनके आध्यात्मिक उद्देश्यों और भारतीय चिंतन पर पड़े व्यापक प्रभाव पर भी विचार-विमर्श हुआ।
संवाद के दौरान नाथ पंथ की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक भूमिका भी चर्चा का महत्वपूर्ण विषय रही। प्रतिभागियों ने विचार किया कि नाथ परंपरा ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में योग, साधना, लोकआध्यात्मिकता और गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से किस प्रकार अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। नाथ संतों और योगियों की यात्राओं, शिक्षाओं तथा स्थानीय परंपराओं के साथ उनके संवाद ने भारतीय समाज और संस्कृति को अनेक स्तरों पर प्रभावित किया।
चर्चा में यह भी रेखांकित किया गया कि भारतीय दर्शन की परंपरा केवल मतभेदों तक सीमित नहीं रही, बल्कि विभिन्न विचारधाराओं के बीच निरंतर संवाद और विमर्श इसकी प्रमुख विशेषता रही है। अद्वैत, द्वैत और नाथ परंपरा जैसी विविध धाराओं ने अपने-अपने दृष्टिकोण से भारतीय आध्यात्मिक चिंतन को समृद्ध किया।


