(आर. सूर्य कुमारी – विभूति फीचर्स)
राखी का त्योहार अत्यंत निकट आ गया है। भाई-बहन के बीच प्यार और सद्भावना का यह पर्व हर साल नई उत्सुकता और उमंग लेकर आता है। बाजारों में हलचल शुरू हो गई है। भाई बहनों के लिए उपहार चुनने में लगे हैं और बहनें भाइयों के लिए मनपसंद राखी और व्यंजन तय करने में व्यस्त हैं। आज हम बहनों के लिए परम्परागत तरीके से राखी मनाने के कुछ सुझाव लेकर आए हैं।
आज सच पूछा जाए तो भाई-बहन राखी बांधने की औपचारिकता पूरी कर बाहर जाकर खाने-पीने और मस्ती करने में ज्यादा आनंद महसूस करने लगे हैं। लेकिन यह तरीका हमारी परम्परागत, नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को कमजोर करता है, क्योंकि सनातन में राखी की अत्यंत मर्यादा है।
हमारी बहनों से, चाहे वे किसी भी आयु वर्ग की हों, अनुरोध है कि राखी को सम्मानपूर्वक मनाएं और अपने छोटे-बड़े भाइयों व पूरे परिवार का दिल जीतें।
बाहर जाकर हम क्या खाते हैं? अशुद्ध तेल और घी से बने व्यंजन। चाट, मंगौड़े, गोलगप्पे, मोमोज, पिज्जा, बर्गर, हॉटडॉग, मंचूरियन, आमलेट,ऐसे न जाने कितने व्यंजन। त्योहार के कारण भीड़-भाड़ ज्यादा रहती है, इसलिए दुकानदार मौके का फायदा उठाते हैं और गुणवत्ता पर ध्यान नहीं देते। परिणामस्वरूप बीमार पड़ना तय है।
वैसे भी ये व्यंजन न हमारी परम्परा के लिए अच्छे हैं, न हमारे स्वास्थ्य के लिए। राखी तो बांधते हैं, लेकिन ऐसा खान-पान हमारी सभ्यता-संस्कृति पर बड़ा कुठाराघात है। इसके विपरीत हमारे पास बीसों स्वादिष्ट और पौष्टिक पारम्परिक व्यंजन हैं। मीठे में गुझिया, हलवा, पूरन पोली, पूरन पूरी, मालपुए, तरह-तरह के लड्डू, खीर, मीठी सैंडविच पकौड़ी हैं तो खट्टे-चटपटे में पुलाव, दही वड़ा, भजिए, सेव, पपड़ी, मठरी, रायता, ढोकला, कढ़ी।
बहनों को अपने भाइयों का ख्याल रखना चाहिए। एक दिन में कोई हृष्ट-पुष्ट नहीं हो जाएगा, पर प्यार का प्रभाव जरूर पड़ेगा। बस थोड़ा समय निकालना है।
आजकल बाजार में मिलावटी मिठाइयों की भरमार है। पता ही नहीं चलता और हम खरीद लाते हैं। इससे न भाई स्वस्थ रहेंगे, न हम। चाहें तो किसी विश्वसनीय प्रतिष्ठान से थोड़ी मिठाई मंगवा लें, पर शुद्ध-विशुद्ध घरेलू व्यंजन ही आपकी राखी को यादगार बनाएगा। सावन की फुहारों में जब पूरा परिवार एक साथ बैठकर राखी मनाएगा, वही पल सबसे अनमोल होगा। आपकी राखी कुशल-मंगल हो। ईश्वर से यही प्रार्थना है। (विभूति फीचर्स)


