
शरद कटियार
किसी भी देश की सबसे बड़ी पूंजी उसके प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि उसके युवा होते हैं। जब यही युवा अपनी बात कहने के लिए सड़कों पर उतरें, अपनी नाराजगी सार्वजनिक रूप से व्यक्त करें और व्यवस्था से जवाब मांगें, तो इसे केवल विरोध के रूप में नहीं, बल्कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य की कसौटी के रूप में देखा जाना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का यह कहना कि “युवा पीढ़ी की शिकायतें जायज़ हैं और उनसे पहले संवाद होना चाहिए था” एक ऐसा विचार है, जिस पर सरकार, समाज और सभी राजनीतिक दलों को गंभीरता से आत्ममंथन करना चाहिए।
आज का युवा इंटरनेट और तकनीक के दौर में जी रहा है। उसके पास सूचनाओं की कमी नहीं है। वह प्रश्न पूछता है, तर्क करता है और अपने अधिकारों के प्रति सजग है। इसलिए उसे केवल निर्देश देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उसकी बात सुननी भी होगी। लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता और जनता के बीच सतत संवाद में निहित है। जब संवाद कमजोर पड़ता है, तब असंतोष आंदोलन का रूप ले लेता है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि विरोध को लोकतंत्र का दुश्मन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की एक आवश्यक प्रक्रिया माना जाए। संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी बात शांतिपूर्ण तरीके से रखने का अधिकार देता है। यदि विरोध संवैधानिक दायरे में है, तो उसे दबाने के बजाय उसके कारणों को समझने का प्रयास होना चाहिए। आखिर हर आंदोलन के पीछे कोई न कोई पीड़ा, अपेक्षा या असंतोष होता है।
मोहन भागवत ने शिक्षा पर राष्ट्रीय बजट का छह प्रतिशत खर्च करने की आवश्यकता भी दोहराई है। यह केवल आर्थिक मांग नहीं, बल्कि भारत के भविष्य में निवेश का सुझाव है। आज देश में शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगारपरक पाठ्यक्रम, अनुसंधान, कौशल विकास और तकनीकी प्रशिक्षण जैसे अनेक क्षेत्रों में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। यदि शिक्षा मजबूत होगी तो रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, नवाचार को बढ़ावा मिलेगा और युवाओं का आत्मविश्वास भी मजबूत होगा।
देश की युवा आबादी विश्व में सबसे बड़ी आबादियों में से एक है। यह भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर भी है और सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी। यदि युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा मिली, तो भारत वैश्विक नेतृत्व की ओर तेजी से बढ़ेगा। लेकिन यदि उनकी अपेक्षाओं की लगातार उपेक्षा हुई, तो यही ऊर्जा असंतोष में बदल सकती है। इसलिए नीति निर्माण से लेकर शिक्षा, रोजगार, तकनीक और सामाजिक विकास तक हर स्तर पर युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
आज आवश्यकता किसी एक पक्ष को सही या गलत साबित करने की नहीं, बल्कि संवाद की संस्कृति को मजबूत करने की है। सरकार को सुनने की संवेदनशीलता दिखानी होगी, विपक्ष को रचनात्मक सुझाव देने होंगे और युवाओं को भी अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों का संतुलन बनाए रखना होगा।
भारत विकसित राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है। इस यात्रा की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि देश अपने युवाओं को केवल ‘भविष्य’ कहकर सम्मानित करता है या उन्हें ‘वर्तमान का भागीदार’ बनाकर निर्णय प्रक्रिया में भी स्थान देता है। क्योंकि जिस राष्ट्र की युवा शक्ति संतुष्ट, शिक्षित और सहभागी होती है, उसका भविष्य स्वतः सुरक्षित हो जाता है।


