देखा है कभी तुमने कहीं, ठहरता सा आदमी,
तपते हुए बदन से सुनहरा सा आदमी,
बालों मे घुली सफेदी से, ककहरा सा आदमी,
भीगे हुए पसीने से इकहरा सा आदमी।
मायूसियों को साथ लिए तरसता सा आदमी,
हालात से जमाने के ठिठकता सा आदमी,
रिश्तों के टूटने से बिखरता सा आदमी,
कहीं भीड़ के किनारे पर छरहरा सा आदमी।
आखों मे नाउम्मीदी लिए, झिझकता सा आदमी,
बिस्तर की सिलवटों सा, सिमटता सा आदमी,
हालात से हार मानकर, खोया सा आदमी,
आंखो की किनारी से ढुलकता सा आदमी।
मिल जाए कहीं तुमको तो फिर देखना वहीं
ना मिले कहीं तो मुझसे कभी आके ही मिलो,
शायद कभी दिखा सकूं, सब झेलता हुआ,
बोझिल कदम को टेककर, दीवार के बिना,
काँधे पे जज्ब लेके, ठहरता सा आदमी।
अमित वर्मा
लेखक न्यायिक विभाग से ताल्लुक रखते हैं।


