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Monday, July 27, 2026

अनिद्रा: आधुनिक जीवन की मौन महामारी

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डॉ विजय गर्ग
मनुष्य के स्वस्थ जीवन के लिए भोजन, पानी और शुद्ध वायु जितने आवश्यक हैं, उतनी ही आवश्यक है पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद। नींद केवल शरीर को आराम देने का माध्यम नहीं, बल्कि मस्तिष्क, हृदय, प्रतिरक्षा तंत्र और मानसिक स्वास्थ्य को संतुलित रखने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया है। किंतु आधुनिक जीवनशैली ने इस अमूल्य आवश्यकता को सबसे अधिक प्रभावित किया है। देर रात तक मोबाइल और लैपटॉप का उपयोग, बढ़ता कार्यभार, प्रतिस्पर्धा, तनाव, अनियमित दिनचर्या और बदलती सामाजिक आदतों ने अनिद्रा (इंसोम्निया) को एक सामान्य समस्या बना दिया है। यही कारण है कि आज अनिद्रा को आधुनिक जीवन की “मौन महामारी” कहा जाने लगा है।

अनिद्रा का अर्थ केवल पूरी रात जागते रहना नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को सोने में कठिनाई होती है, रात में बार-बार नींद खुल जाती है, सुबह बहुत जल्दी जाग जाता है या पर्याप्त समय बिस्तर पर बिताने के बावजूद ताजगी महसूस नहीं होती, तो यह भी अनिद्रा का संकेत हो सकता है। जब यह स्थिति सप्ताह में कई बार होने लगे और लंबे समय तक बनी रहे, तो इसका प्रभाव व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक जीवन पर पड़ने लगता है।

आधुनिक समाज में अनिद्रा के सबसे बड़े कारणों में तनाव प्रमुख है। नौकरी की चिंता, आर्थिक दबाव, परीक्षा का तनाव, पारिवारिक समस्याएँ और भविष्य की अनिश्चितता लोगों के मन को लगातार सक्रिय बनाए रखती हैं। मस्तिष्क को आराम नहीं मिल पाता और व्यक्ति बिस्तर पर लेटने के बाद भी विचारों के जाल में उलझा रहता है। परिणामस्वरूप नींद आने में देर लगती है या नींद बार-बार टूटती रहती है।

डिजिटल तकनीक ने भी इस समस्या को बढ़ाया है। देर रात तक मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, वीडियो स्ट्रीमिंग और ऑनलाइन गेम्स का उपयोग शरीर की जैविक घड़ी (बॉडी क्लॉक) को प्रभावित करता है। स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी मेलाटोनिन हार्मोन के स्राव को कम कर देती है, जो नींद लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही कारण है कि आज बच्चों, किशोरों और युवाओं में भी अनिद्रा की समस्या तेजी से बढ़ रही है।

अनिद्रा केवल थकान का कारण नहीं बनती, बल्कि अनेक गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का आधार भी बन सकती है। पर्याप्त नींद न मिलने से स्मरण शक्ति कमजोर होती है, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई होती है, निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है और कार्यक्षमता घट जाती है। लंबे समय तक अनिद्रा रहने पर उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, मोटापा, अवसाद, चिंता और कमजोर प्रतिरक्षा जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। सड़क दुर्घटनाओं और कार्यस्थल पर होने वाली कई दुर्घटनाओं के पीछे भी नींद की कमी एक महत्वपूर्ण कारण होती है।

बच्चों और किशोरों पर इसका प्रभाव और भी गंभीर हो सकता है। पर्याप्त नींद न मिलने से उनकी सीखने की क्षमता, याददाश्त, व्यवहार, भावनात्मक संतुलन और शारीरिक विकास प्रभावित हो सकता है। पढ़ाई में गिरावट, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की कमी जैसे लक्षण अक्सर नींद की कमी से जुड़े होते हैं।

वृद्ध लोगों में भी अनिद्रा एक सामान्य समस्या है। उम्र बढ़ने के साथ नींद का पैटर्न बदल सकता है, लेकिन यदि लगातार नींद न आए या दिनभर थकान बनी रहे, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई बार यह किसी अन्य शारीरिक या मानसिक बीमारी का संकेत भी हो सकता है।

अनिद्रा से बचाव के लिए दवाइयों पर निर्भर रहने के बजाय जीवनशैली में सुधार अधिक प्रभावी माना जाता है। प्रतिदिन एक निश्चित समय पर सोना और जागना, सोने से कम-से-कम एक घंटे पहले मोबाइल और अन्य स्क्रीन से दूरी बनाना, शाम के समय चाय, कॉफी और अन्य कैफीनयुक्त पेय सीमित करना, नियमित व्यायाम करना तथा शांत और अंधेरे वातावरण में सोना अच्छी नींद के लिए लाभदायक होता है। ध्यान, योग और गहरी साँस लेने जैसी तकनीकें भी तनाव कम करने और नींद की गुणवत्ता सुधारने में सहायक हो सकती हैं।

यदि अनिद्रा कई सप्ताह तक बनी रहे, दिनचर्या को प्रभावित करे या अत्यधिक थकान, अवसाद अथवा चिंता के साथ दिखाई दे, तो चिकित्सक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना आवश्यक है। स्वयं दवाइयाँ लेना या बार-बार नींद की गोलियों का उपयोग करना उचित नहीं है, क्योंकि इससे निर्भरता और अन्य दुष्प्रभाव हो सकते हैं।

आज आवश्यकता केवल बेहतर उपचार की नहीं, बल्कि बेहतर जागरूकता की भी है। विद्यालयों, कार्यस्थलों और परिवारों में नींद के महत्व पर चर्चा होनी चाहिए। जैसे संतुलित आहार और नियमित व्यायाम को स्वस्थ जीवन का आधार माना जाता है, वैसे ही पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद को भी स्वास्थ्य का अनिवार्य स्तंभ समझा जाना चाहिए।

निष्कर्षतः, अनिद्रा आधुनिक जीवन की एक ऐसी मौन महामारी है, जो धीरे-धीरे व्यक्ति के शरीर, मन और सामाजिक जीवन को प्रभावित करती है। इसे सामान्य थकान या व्यस्तता का परिणाम मानकर अनदेखा करना उचित नहीं है। यदि हम स्वस्थ जीवनशैली अपनाएँ, तनाव का प्रभावी प्रबंधन करें और नींद को प्राथमिकता दें, तो न केवल अनिद्रा से बचा जा सकता है बल्कि एक अधिक स्वस्थ, ऊर्जावान और संतुलित जीवन भी जिया जा सकता है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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