ऑकलैंड/नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्यूजीलैंड दौरे के दौरान एक बार फिर उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रेस ब्रीफिंग में एक पत्रकार ने सवाल किया कि प्रधानमंत्री विदेश दौरों के दौरान खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते। इस पर विदेश मंत्रालय के सचिव (पूर्व) रुद्रेंद्र टंडन ने जवाब देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री विभिन्न जनसभाओं, सार्वजनिक कार्यक्रमों और सीधे संवाद के माध्यम से लगातार लोगों से जुड़े रहते हैं तथा भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं पूरी तरह मजबूत हैं।
इस घटनाक्रम के बाद नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग, जिन्होंने पहले ओस्लो दौरे के दौरान भी प्रधानमंत्री मोदी से इसी विषय पर सवाल पूछा था, ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह देखकर अच्छा लग रहा है कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता और मीडिया से संवाद जैसे मुद्दों पर अब दूसरे देशों में भी चर्चा हो रही है। उन्होंने कहा कि छोटे देश भी लोकतांत्रिक विमर्श को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
हेले लिंग ने बताया कि नॉर्वे की घटना के बाद उन्होंने दुनिया भर के कई मीडिया संस्थानों को इंटरव्यू दिए, ताकि इस विषय पर व्यापक चर्चा हो सके। उन्होंने भारतीय विदेश मंत्रालय के उस जवाब पर भी टिप्पणी की, जिसमें कहा गया था कि प्रधानमंत्री जनता से सीधे संवाद करना पसंद करते हैं। लिंग ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारों के सवालों का जवाब देना भी महत्वपूर्ण प्रक्रिया का हिस्सा है।
गौरतलब है कि इससे पहले ऑस्ट्रेलिया में भी एक टीवी रिपोर्टर ने टिप्पणी की थी कि प्रधानमंत्री मोदी आमतौर पर बिना पूर्व निर्धारित प्रश्नों वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस से बचते हैं। इसके बाद न्यूजीलैंड में भी इसी मुद्दे पर सवाल पूछे गए, जिससे यह विषय अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का केंद्र बन गया।
वहीं, विदेश मंत्रालय का कहना है कि प्रधानमंत्री अपने भाषणों, जनसभाओं, डिजिटल माध्यमों और विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों के जरिए लगातार नागरिकों से संवाद करते हैं। इस मुद्दे को लेकर देश और विदेश में राजनीतिक तथा मीडिया जगत में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।


