(विवेक रंजन श्रीवास्तव-विभूति फीचर्स)
हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श ने समाज की आधी आबादी के संघर्ष, अस्मिता और अधिकारों को मुखर किया है। शायद इस तमाम विमर्श के बाद भी स्त्री की सामाजिक स्थिति में क्या बदलाव हुए, यह अध्ययन का विषय है। पुरुष के कंधों से टकराती स्त्री पारदर्शी हुई जरूर दिखती है,कम से कम वेशभूषा में, वह मीडिया में एक क्लिक पर अनावृत हो रही है। जिम्मेदारी के मामले में उसने पैंट पहनकर भी संस्कार की पायल नहीं उतारी है। उसका वार्डरोब छोटे कपड़ों के साथ छै गजी महंगी साड़ियों से भी भरा हुआ है।
परंतु वर्तमान में पुरुष विमर्श की जो पुकार उठ रही है, वह संयोग नहीं है। यह प्रश्न कि “स्त्री विमर्श, पुरुष की भूमिका से मुक्त कहाँ?” गहरे सामाजिक, कानूनी और मनोवैज्ञानिक संदर्भों की ओर संकेत करता है। समाज दोनों इकाइयों से बना है, और पुरुष का ज़िक्र स्वाभाविक रूप से होता ही है, फिर भी पुरुष विमर्श को अलग से रेखांकित करने की आवश्यकता क्यों अनुभव की जा रही है?
संकट की आहट और सोशल मीडिया का स्वर
पिछले दिनों बेंगलुरु के एआई इंजीनियर अतुल सुभाष और दिल्ली के कैफे मालिक पुनीत खुराना की आत्महत्याओं ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। दोनों ने अपनी पत्नियों और ससुराल पक्षों द्वारा मानसिक प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाते हुए आत्महत्या की थी। अतुल सुभाष ने 90 मिनट का वीडियो और विस्तृत सुसाइड नोट छोड़ा, जिसमें उन्होंने अपने साथ हुए वर्षों के दुर्व्यवहार का चित्रण किया।
तब सोशल मीडिया पर ‘#MenToo’, ‘#JusticeForAtulSubhash’, ‘#legal genocide of men’ जैसे हैशटैग ने जोर पकड़ा। पुरुषों ने अपने व्यक्तिगत दुःखों को साझा करना शुरू किया, जिसमें विवाह में प्रताड़ना, बच्चों की कस्टडी से वंचित करना और अत्यधिक भरण-पोषण (मेन्टेनेंस) की माँगें चर्चा में आईं। इसके साथ ही, एकतरफा कानून की समीक्षा की आवश्यकता महसूस की गई।
भारत में पुरुषों की आत्महत्या दर महिलाओं की तुलना में काफी अधिक है। मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ती चर्चा के बावजूद, पुरुषों के लिए परामर्श और सहायता सेवाएँ सीमित हैं। पुरुषों को मजबूत होने की सामाजिक अपेक्षा उन्हें अपनी मानसिक पीड़ा व्यक्त करने से रोकती है।
कानूनी विसंगतियाँ और दुरुपयोग
धारा 498A (अब BNS की धारा 85-86) का दुरुपयोग:
वर्ष 1983 में दहेज हत्याओं की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए IPC की धारा 498A (विवाह में क्रूरता) को लागू किया गया था। परंतु समय के साथ इसके दुरुपयोग की गंभीर शिकायतें उठने लगीं।
जुलाई 2014, सुप्रीम कोर्ट ने 498A में गिरफ्तारी से पहले 9 सूत्रीय चेकलिस्ट का पालन करने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि यह धारा “असंतुष्ट पत्नियों द्वारा ढाल की बजाय हथियार के रूप में उपयोग किए जाने वाला संदिग्ध प्रावधान बन गया है”।
दिसंबर 2024: सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि वैवाहिक विवादों में वृद्धि के परिणामस्वरूप, इस प्रावधान का पति और उसके परिवार के खिलाफ व्यक्तिगत प्रतिशोध के उपकरण के रूप में दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
वकील आशीष दीक्षित कहते हैं, “दुर्भाग्य से, इस देश में कानून महिलाओं के पक्ष में थोड़ा झुका हुआ है। इससे न्याय के प्रशासन में असंतुलन पैदा होता है और पतियों के लिए मानसिक प्रताड़ना और अवसाद की स्थिति बनती है।” वरिष्ठ अधिवक्ता विकास पाहवा का सुझाव है कि उच्चतम न्यायालय को इसका संज्ञान लेना चाहिए और झूठे मामले दर्ज करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।
यौन अपराध की परिभाषा:
BNS की धारा 63 (पूर्व IPC की धारा 375) बलात्कार को केवल “पुरुष द्वारा महिला पर” किए गए कृत्य के रूप में परिभाषित करती है। इसका अर्थ है कि यदि कोई महिला किसी पुरुष के साथ असंम्मत यौन कृत्य करती है, तो उसे कानूनी रूप से बलात्कार नहीं माना जाता। नेशनल कमीशन फॉर वूमेन (NCW) के एक अध्ययन के अनुसार, 2022 में भारत में पुरुषों के साथ यौन उत्पीड़न के 3,000 मामले रिपोर्ट किए गए।
राष्ट्रीय पुरुष आयोग की माँग
पुरुष अधिकार कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय पुरुष आयोग की स्थापना की माँग उठाई है, ताकि झूठे मामलों, वैवाहिक दुर्व्यवहार और कानूनी उत्पीड़न से पुरुषों की सुरक्षा की जा सके। वकील और फिल्म निर्माता दीपिका नारायण भारद्वाज, जो इस क्षेत्र में सक्रिय हैं, कहती हैं: “कानून अत्यधिक ब्लैकमेल और जबरन वसूली का उपकरण बन गया है।”
यद्यपि NCRB 2023 के आँकड़े बताते हैं कि महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की रिपोर्टेड घटनाओं में झूठे मामलों का प्रतिशत कम है (लगभग 8.3%), परंतु कार्यकर्ताओं का तर्क है कि एक झूठा मामला भी किसी व्यक्ति का करियर और सामाजिक प्रतिष्ठा नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। साथ ही, द लैंसेट (2025) के अनुसार, भारत में लगभग 13.5% पुरुष बचपन में यौन हिंसा का शिकार हुए हैं, जो एक मूक त्रासदी है।
पुरुष विमर्श की दिशाएँ और संभावनाएँ
सच्ची समानता के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:
1.कानूनों को लिंग-तटस्थ (Gender-Neutral) बनाना: धारा 498A, घरेलू हिंसा अधिनियम और बलात्कार की परिभाषा को सभी लिंगों के लिए समान बनाना।
2.झूठे मामलों के लिए दंड:झूठी शिकायतें करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई।
3. राष्ट्रीय पुरुष आयोग:पुरुषों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक स्वतंत्र संस्थान।
4. मानसिक स्वास्थ्य सहायता: पुरुषों के लिए समर्पित परामर्श और हेल्पलाइन का विस्तार।
अंत में, यह समझना आवश्यक है कि पुरुष विमर्श स्त्री विमर्श का विरोधी नहीं, बल्कि पूरक होना चाहिए। जिस प्रकार महादेवी वर्मा ने ‘बंधन-मुक्ति’ को मानवीय पहल के रूप में देखा, उसी प्रकार पुरुष विमर्श भी एक मानवीय पहल है, जो एक ऐसी व्यवस्था की माँग करता है जहाँ किसी भी लिंग के विरुद्ध अन्याय न हो।
पुरुष विमर्श को अलग से रेखांकित करने की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि वह आवाज़ अब तक दबी रही है, और दबी आवाज़ को मुखर होने का पूरा अधिकार है। (विभूति फीचर्स)


