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Thursday, June 25, 2026

“मैं शेर को पिंजरे में नहीं देखने जाऊंगी…” — जब एक पत्नी बनीं पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सबसे बड़ी ताकत

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प्रो. एच. एन. शर्मा
भारतीय राजनीति में ऐसे नेताओं की संख्या बहुत कम है जिनकी पहचान सत्ता से नहीं, बल्कि संघर्ष, स्वाभिमान और सिद्धांतों से बनी। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर उन्हीं विरले नेताओं में शामिल थे। उन्हें अक्सर “युवा तुर्क” कहा गया, क्योंकि वे सत्ता से टकराने का साहस रखते थे और अपने विचारों पर अडिग रहते थे। लेकिन उनके इस व्यक्तित्व के पीछे एक ऐसी महिला थीं, जिनका नाम राजनीति के मंचों पर कभी नहीं गूंजा, फिर भी जिनके बिना चंद्रशेखर का संघर्ष शायद इतना मजबूत नहीं होता। वह थीं उनकी पत्नी दूजा (द्विजा) देवी।

दूजा देवी पढ़ी-लिखी नहीं थीं। उन्हें राजनीतिक शब्दावली का ज्ञान नहीं था, न ही वे संसद, चुनाव या सत्ता की जटिलताओं से परिचित थीं। लेकिन उन्हें अपने पति के व्यक्तित्व की गहराई समझ में आती थी। यही कारण था कि उन्होंने कभी चंद्रशेखर के रास्ते में बाधा बनने के बजाय हर कठिन मोड़ पर उनका संबल बनने का निर्णय लिया।
25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू हुआ। हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं को जेल भेज दिया गया। चंद्रशेखर भी गिरफ्तार कर लिए गए। परिवार के लोगों से कहा गया कि वे जेल जाकर मुलाकात कर सकते हैं।

इसी दौरान एक प्रसंग वर्षों से राजनीतिक हलकों और संस्मरणों में सुनाया जाता है। कहा जाता है कि जब दूजा देवी से जेल जाकर मिलने की बात कही गई तो उन्होंने शांत स्वर में कहा—

“मैं शेर को पिंजरे में नहीं देखने जाऊंगी। देखती हूं, कब तक उसे बंद रखेंगे।”

इस कथन का आधिकारिक दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह प्रसंग लंबे समय से चंद्रशेखर के जीवन से जुड़ी चर्चित स्मृतियों का हिस्सा माना जाता है। यह वाक्य केवल एक पत्नी का उत्तर नहीं था, बल्कि अपने पति के साहस और सिद्धांतों पर अटूट विश्वास की घोषणा था।
भारतीय राजनीति में ऐसे अनेक अवसर आए जब चंद्रशेखर आर्थिक और राजनीतिक दोनों दृष्टि से कठिन दौर से गुजरे। कई बार सत्ता उनके सामने थी, लेकिन उन्होंने सिद्धांतों से समझौता स्वीकार नहीं किया। इसका सीधा असर परिवार पर भी पड़ा। संसाधनों की कमी रही, सुविधाओं का अभाव रहा, लेकिन दूजा देवी ने कभी शिकायत नहीं की।

उन्होंने न कभी पद की मांग की, न सरकारी सुविधाओं का मोह रखा और न ही अपने पति पर सत्ता के लिए समझौता करने का दबाव बनाया। यही कारण था कि चंद्रशेखर अंतिम समय तक अपनी बेबाक राजनीति के लिए पहचाने गए।
1990 में जब चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने, तब भी उनके निजी जीवन में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। सत्ता उनके व्यक्तित्व पर कभी हावी नहीं हुई। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी परिवार की सादगी चर्चा का विषय रही। दूजा देवी सार्वजनिक जीवन से लगभग पूरी तरह दूर रहीं। उन्हें प्रचार, कैमरे और राजनीतिक मंचों से कोई लगाव नहीं था।
कहा जाता है कि प्रधानमंत्री आवास में भी उनकी जीवनशैली एक सामान्य ग्रामीण गृहिणी जैसी ही रही। वे उसी सहजता और सादगी के साथ परिवार की जिम्मेदारियां निभाती रहीं।
औपचारिक शिक्षा किसी व्यक्ति के ज्ञान का एक माध्यम हो सकती है, लेकिन जीवन की समझ अनुभव से आती है। दूजा देवी इसका उदाहरण थीं। उन्होंने शायद किताबें नहीं पढ़ीं, लेकिन उन्होंने त्याग, धैर्य, विश्वास और आत्मसम्मान का वह पाठ पढ़ाया जिसे बड़े-बड़े विश्वविद्यालय भी नहीं सिखा सकते।
उन्होंने अपने बच्चों को संस्कार दिए, परिवार को संभाला और अपने पति को यह भरोसा दिया कि वे बिना किसी चिंता के देश और समाज के लिए संघर्ष कर सकते हैं।
1983 में चंद्रशेखर ने कन्याकुमारी से दिल्ली तक ऐतिहासिक भारत यात्रा निकाली। हजारों किलोमीटर पैदल चलकर उन्होंने गांव-गांव जाकर देश की वास्तविक स्थिति को समझने का प्रयास किया। यह यात्रा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि भारतीय समाज को करीब से देखने का अभियान थी।

इतने लंबे समय तक घर से दूर रहने वाले व्यक्ति के पीछे एक ऐसा परिवार था जिसने कभी शिकायत नहीं की। दूजा देवी ने घर की जिम्मेदारियां पूरी तरह संभाल लीं, ताकि चंद्रशेखर अपने उद्देश्य पर केंद्रित रह सकें।

आज की राजनीति के लिए एक संदेश

आज राजनीति में शक्ति का अर्थ अक्सर पद, प्रचार, सुरक्षा और संसाधनों से लगाया जाता है। लेकिन चंद्रशेखर और दूजा देवी की कहानी बताती है कि किसी नेता की सबसे बड़ी ताकत उसके पीछे खड़ा वह परिवार होता है, जो बिना किसी अपेक्षा के उसके संघर्ष को अपना संघर्ष बना लेता है।

दूजा देवी ने कभी भाषण नहीं दिया, कोई चुनाव नहीं लड़ा, किसी सरकारी पद की इच्छा नहीं की, लेकिन भारतीय लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण नेता के व्यक्तित्व को गढ़ने में उनकी भूमिका किसी भी राजनीतिक सहयोगी से कम नहीं थी।

इतिहास केवल उन लोगों का नहीं होता जो मंच पर दिखाई देते हैं। इतिहास उन मौन चरित्रों को भी याद रखता है, जो प्रकाश से दूर रहकर भी किसी युगपुरुष के जीवन को दिशा देते हैं। दूजा देवी ऐसी ही एक असाधारण भारतीय नारी थीं—जिन्होंने यह साबित किया कि शिक्षा से बड़ा जीवन का विवेक होता है, और सत्ता से बड़ा होता है विश्वास।

आज जब रिश्तों का मूल्य अक्सर स्वार्थ और सुविधाओं से तय किया जाता है, तब चंद्रशेखर और दूजा देवी का जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्चा साथ वही है, जो संघर्ष के दिनों में भी बिना शर्त साथ खड़ा रहे। शायद इसी वजह से चंद्रशेखर केवल एक नेता नहीं बने, बल्कि भारतीय राजनीति में स्वाभिमान, सादगी और सिद्धांतों के प्रतीक बन गए।
लेखक पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर के अति करीबियों मे शुमार रहे

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