शरद कटियार
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता और सामाजिक एकता रही है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक विमर्श का केंद्र जिस तेजी से रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और आर्थिक विकास जैसे मूलभूत मुद्दों से हटकर धार्मिक एवं साम्प्रदायिक बहसों की ओर स्थानांतरित हुआ है, उसने देश के भविष्य को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। ऐसे समय में जब बेरोजगारी, महंगाई और किसानों की समस्याएं आम नागरिक के जीवन को प्रभावित कर रही हैं, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि राजनीति का वास्तविक एजेंडा आखिर क्या होना चाहिए?
लोकतंत्र में सरकारों का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उन्होंने युवाओं को कितने रोजगार दिए, किसानों की आय कितनी बढ़ाई, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को कितना बेहतर बनाया तथा आम आदमी की जिंदगी को कितना आसान किया। लेकिन दुर्भाग्य से अक्सर चुनावी चर्चाओं में ये विषय पीछे छूट जाते हैं और पहचान आधारित राजनीति प्रमुखता हासिल कर लेती है।
देश की सबसे बड़ी आबादी युवा वर्ग की है। हर वर्ष लाखों छात्र-छात्राएं शिक्षा पूरी कर रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। लेकिन रोजगार के अवसरों की सीमित उपलब्धता उनके सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक असंतोष का भी कारण बनती है। जब युवाओं को अवसर नहीं मिलते तो उनका विश्वास व्यवस्था से कमजोर होने लगता है।
किसानों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता और बाजार में उचित मूल्य न मिल पाने के कारण कृषि क्षेत्र लगातार दबाव में है। देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार होने के बावजूद किसान आज भी अपनी उपज का लाभकारी मूल्य प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहा है। ऐसे में राजनीतिक दलों की प्राथमिकता किसानों की आय बढ़ाने और कृषि को लाभकारी बनाने पर होनी चाहिए।
इसी प्रकार महंगाई का असर समाज के हर वर्ग पर पड़ रहा है। रसोई गैस, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और दैनिक जरूरतों की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के बजट को प्रभावित किया है। आम नागरिक चाहता है कि सरकार और राजनीतिक दल इन मुद्दों पर ठोस समाधान प्रस्तुत करें।
स्मार्ट मीटर, बिजली दरों और सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता को लेकर भी देश के कई हिस्सों में असंतोष देखने को मिल रहा है। जनता यह जानना चाहती है कि नई व्यवस्थाओं से उसे क्या लाभ होगा और उसके आर्थिक बोझ में कितनी कमी आएगी। लोकतंत्र में इन सवालों का जवाब देना सरकारों की जिम्मेदारी है।
भारत का इतिहास बताता है कि जब-जब समाज ने एकजुट होकर विकास और राष्ट्र निर्माण को प्राथमिकता दी है, तब-तब देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। वहीं सामाजिक विभाजन और टकराव का सबसे अधिक नुकसान आम नागरिक और आने वाली पीढ़ियों को उठाना पड़ा है। इसलिए राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता को बनाए रखना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
आज जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक बहस का केंद्र धर्म और जाति से आगे बढ़कर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि, उद्योग, निवेश और सुशासन बने। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब नागरिक अपने वोट का मूल्य इन वास्तविक मुद्दों के आधार पर तय करेंगे। आने वाली पीढ़ियों का भविष्य इसी पर निर्भर करेगा कि आज का समाज विभाजन की राजनीति को चुनता है या विकास और जनकल्याण की राजनीति को।
देश के सामने खड़ी चुनौतियां इतनी बड़ी हैं कि उनका समाधान केवल सामाजिक एकता, सकारात्मक राजनीति और जनहित केंद्रित नीतियों से ही संभव है। यदि राजनीति जनता के वास्तविक सरोकारों की ओर लौटती है तो न केवल लोकतंत्र मजबूत होगा बल्कि भारत की विकास यात्रा भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचेगी।


