(विवेक रंजन श्रीवास्तव -विनायक फीचर्स)
जब व्यवस्था बहरी हो जाती है तब व्यंग्य ही समाज का लाउडस्पीकर बनता है। सुप्रसिद्ध लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने एक बार कहा था कि हर व्यंग्य अपने आप में एक तरह का सच होता है। आज के दौर में जब समाज को मुफ्त की रेवड़ियों के बदले नेता व्यवस्था के आसन खरीद लेना चाहते हैं। जब जनता को सम्मान और रोजगार की दरकार है, लेकिन मुख्यधारा के राजनेता जनता को सिर्फ एक मतदाता संख्या समझने की भूल कर रहे लगते हैं, तब व्यंग्य ही राजनेताओं के सत्ता के अहंकार को चोट पहुंचा सकता है।
आज की युवा पीढ़ी यानी जेन जी इस मामले में समझदार है। वह राजनेताओं के लंबे-चौड़े और उबाऊ भाषणों से दूर हो चुकी है। यह पीढ़ी मीम्स, रील्स और धारदार चुटकुलों के जरिए सीधे उस नस पर हाथ रख रही है ,जहां समाज को असल दर्द हो रहा है। भारत में हाल ही में उभरी कॉकरोच जनता पार्टी ने खुद को आलसी और बेरोजगारों का मोर्चा कहकर व्यवस्था के उस पूरे नैरेटिव को ही ध्वस्त कर दिया जो युवाओं के जमीनी संघर्ष को कमतर आंकता था।
खुद को खुदा मान बैठे अदालती टिप्पणी के विरोध और नीट जैसी परीक्षाओं में पेपर लीक के खिलवाड़ तथा बेरोजगारी जैसे गंभीर मुद्दों से उपजी इस व्यंग्यात्मक डिजिटल पार्टी ने सोशल स्पेस में स्थापित राजनीतिक दलों को अपनी सामूहिक ताकत का अहसास करा दिया है।
भारत की यह कॉकरोच जनता पार्टी कोई पहली ऐसी कोशिश नहीं है। दुनिया के इतिहास में जब-जब राजनीतिक व्यवस्था सड़ी-गली और संवेदनहीन हुई है, तब-तब आम जनता ने मजाकिया और व्यंग्यात्मक राजनीतिक दल बनाकर शासकों को आईना दिखाया है। वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो पोलैंड में साल उन्नीस सौ नब्बे में बनी पोलिश बीयर-लवर्स पार्टी इसका एक बड़ा उदाहरण है। इस पार्टी ने नारा दिया था कि लोग वोदका छोड़कर अच्छी बीयर पिएं ताकि संसद को भी बीयर बार की तरह शांति से चलाया जा सके। मजाक से शुरू हुए इस सिलसिले को जनता ने इस कदर हाथों-हाथ लिया कि साल उन्नीस सौ नब्बे के चुनाव में इस दल ने संसद की सोलह सीटें जीत ली थीं।
इसी तरह साल दो हजार नौ में आर्थिक मंदी से जूझ रहे आइसलैंड में द बेस्ट पार्टी अस्तित्व में आई। इसके संस्थापक एक कॉमेडियन थे और उनका मुख्य वादा यह था कि वे सत्ता में आकर अपने सारे वादे तोड़ देंगे क्योंकि बाकी पारंपरिक नेता भी यही करते हैं। व्यवस्था से नाराज जनता ने इसके संस्थापक को देश की राजधानी रेकजाविक का मेयर चुन लिया था।
कनाडा की राइनोसेरोस पार्टी भी इतिहास का एक दिलचस्प हिस्सा है जिसकी स्थापना साल उन्नीस सौ तिरेसठ में हुई थी। इस पार्टी ने कनाडाई चुनावी संस्कृति के खोखले वादों को बेनकाब करने के लिए अजीबोगरीब घोषणा की थी कि वे देश से गुरुत्वाकर्षण का कानून ही खत्म कर देंगे ताकि लोगों को भारी वजन न उठाना पड़े। इस दल ने दशकों तक वहां की राजनीति को झकझोरा।
हंगरी में साल दो हजार छह में बनी हंगेरियन टू-टेल्ड डॉग पार्टी ने सरकार के तानाशाही रवैये और प्रोपेगैंडा के खिलाफ मोर्चा खोला। उन्होंने जनता से वादा किया कि वे हर नागरिक को अमरता देंगे और दिन में दो बार सूर्यास्त करवाएंगे। यह दल आज भी वहां के युवाओं के विरोध का सबसे बड़ा चेहरा है।
वहीं यूनाइटेड किंगडम की मॉन्स्टर रेविंग लूनी पार्टी ब्रिटिश राजनीति के पाखंड को उजागर करने के लिए हर चुनाव में उतरती है और उनका सुझाव रहता है कि बेरोजगारी के आंकड़े छुपाने के लिए सरकारी फॉर्म छोटे अक्षरों में छापे जाने चाहिए। ये सभी वैश्विक उदाहरण बताते हैं कि व्यंग्य हमेशा से एक वैश्विक लोकतांत्रिक ढाल रहा है।
आज के दौर में मुफ्तखोरी बनाम आत्मसम्मान समाज की सबसे बड़ी त्रासदी बन चुका है। कल्याणकारी राज्य की आड़ में नेताओं ने जनता को एक तरह से याचक बना दिया है। कभी मुफ्त बिजली, कभी मुफ्त राशन तो कभी बैंक खातों में कुछ हजार रुपये ट्रांसफर करके बुनियादी और असल मुद्दों को दबा दिया जाता है। मुफ्तखोरी की यह राजनीति देश को आर्थिक रूप से खोखला तो करती ही है, साथ ही एक नागरिक के आत्मसम्मान को भी मार देती है। समाज की वास्तविक जरूरत मुफ्त की चीजें नहीं बल्कि एक पारदर्शी व्यवस्था, सुरक्षित परीक्षाएं, बेहतर अस्पताल और सम्मानजनक रोजगार के अवसर हैं। जब देश के पढ़े-लिखे युवाओं को कॉकरोच या परजीवी जैसे शब्दों से नवाजा जाता है, तो उनका आत्मसम्मान बुरी तरह आहत होता है और यहीं से एक मौन विद्रोह पनपता है। यह विद्रोह आज डिजिटल स्वरूप में अभिव्यक्त हो रहा है। पकड़ो किसे कहां पकड़ोगे ।
इस समस्या का एक आशाजनक समाधान मीम से मुख्यधारा की राजनीति की ओर बढ़ने में छिपा है। व्यंग्य और मीम्स किसी भी वैचारिक क्रांति की शुरुआत तो कर सकते हैं, लेकिन वे अंतिम समाधान नहीं हो सकते। लोकतंत्र को वास्तव में संविधान के सिद्धांतों के अनुरूप चलाने के लिए इस डिजिटल आक्रोश को एक सकारात्मक दिशा देनी होगी।
इसके लिए सबसे पहले व्यंग्य को एक नीतिगत सजग प्रहरी की भूमिका में आना होगा। जैसे कभी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था, वैसे ही अब व्यंग्य को पांचवें स्तंभ के रूप में स्थापित होना पड़ेगा।
कॉकरोच जनता पार्टी जैसी पहलों को केवल एक ट्रेंड बनकर नहीं रुकना चाहिए बल्कि युवाओं को इन मंचों का उपयोग सूचना के अधिकार का प्रयोग करने, सरकारी नीतियों का जमीनी विश्लेषण करने और सरकार से सीधे डेटा आधारित सवाल पूछने के लिए करना चाहिए।
इसके साथ ही इस आलोचनात्मक सोच को वास्तविक राजनीतिक भागीदारी में बदलना बेहद जरूरी है।
आज के युवाओं की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे किसी बंधी-बंधाई विचारधारा के बंधक नहीं हैं। वे आज की सरकार की गलती पर मीम बना सकते हैं, तो कल विपक्ष की नाकामी पर भी खुलकर हंस सकते हैं। समाधान यही है कि युवाओं की यह वैचारिक तटस्थता वोटिंग बूथ तक पहुंचे। युवा सही उम्मीदवारों का चयन करें या फिर पारंपरिक पार्टियों के भीतर दबाव समूह बनाकर उनके एजेंडे को मुफ्तखोरी से बदलकर विकास और रोजगार पर लाने के लिए मजबूर करें। अंततः एक सम्मान आधारित व्यवस्था का निर्माण ही एकमात्र रास्ता है। राजनेताओं को यह समझना होगा कि देश का युवा अब अंधभक्त नहीं रह गया है। असली समाधान इस बात में छिपा है कि देश में जवाबदेही के कानून कड़े हों। अगर कोई पेपर लीक होता है, तो केवल छोटे अपराधियों पर कार्रवाई न हो, बल्कि जिम्मेदार मंत्रियों और शीर्ष अधिकारियों को तुरंत अपना पद छोड़ना पड़े। जब व्यवस्था के भीतर जनता के प्रति डर होगा, तभी आम नागरिक को उसका वास्तविक सम्मान मिलेगा।
कॉकरोच की सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती है कि वह हर विषम परिस्थिति में खुद को जीवित रख सकता है, चाहे कोई बड़ी आपदा ही क्यों न आ जाए। आज का युवा खुद को इस रूप में इसलिए देख रहा है क्योंकि वह इस भ्रष्ट और सुस्त सिस्टम की मार झेलकर भी अपनी उम्मीदों के साथ जिंदा है। लेकिन जब यही युवा हंसते-हंसते व्यवस्था की कमियों पर तंज कसता है, तो बड़े-बड़े राजनेताओं के सिंहासन हिलने लगते हैं। यह रचनात्मक व्यंग्य ही आने वाले समय में लोकतंत्र को स्वच्छ और जवाबदेह बनाने का सबसे प्रभावी जरिया साबित होगा। (विनायक फीचर्स)


