एच. एन. शर्मा
भारत विविधताओं का देश है। यहां भाषा, संस्कृति, धर्म, परंपरा और सामाजिक संरचनाओं की विशालता दुनिया को आकर्षित करती है। लेकिन इसी विविधता के बीच एक ऐसी सच्चाई भी लगातार गहरी होती जा रही है, जो समाज को भीतर ही भीतर कमजोर कर रही है, जातीय संगठनों का तेजी से बढ़ता प्रभाव और उसके कारण समाज का खंड-खंड होना।
आज देश के लगभग हर हिस्से में किसी न किसी जाति, उपजाति या बिरादरी के नाम पर संगठन खड़े हो चुके हैं। कहीं महासभाएं बन रही हैं, कहीं युवा मंच, कहीं सेना और कहीं अधिकार मोर्चे। हर संगठन अपने समाज के सम्मान, हिस्सेदारी और अधिकारों की बात करता है। पहली नजर में यह सामाजिक जागरूकता का प्रतीक दिखाई देता है, लेकिन जब यही पहचान सामाजिक समरसता से ऊपर उठकर राजनीतिक शक्ति और दूसरे समाजों से प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनने लगती है, तब समस्या शुरू होती है।
किसी भी समाज का संगठित होना गलत नहीं है। शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुधार और सामूहिक सहयोग के लिए संगठन जरूरी भी हैं। इतिहास गवाह है कि जिन समाजों ने शिक्षा और संगठन को अपनाया, उन्होंने प्रगति की। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब संगठन “समाज निर्माण” से ज्यादा “दूसरों के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन” का माध्यम बन जाते हैं।
आज कई जातीय संगठन अपने समाज के गौरव की बात कम और राजनीतिक दबाव की राजनीति ज्यादा करते दिखाई देते हैं। समाज को यह बताया जाता है कि उनकी दुर्दशा का कारण कोई दूसरी जाति या समुदाय है। इससे सामाजिक दूरी बढ़ती है और आपसी विश्वास कमजोर होने लगता है।
भारतीय राजनीति ने भी इस प्रवृत्ति को लगातार बढ़ावा दिया है। चुनाव आते ही जातीय सम्मेलन, बिरादरी पंचायतें और सामाजिक समीकरणों की चर्चा तेज हो जाती है। राजनीतिक दल विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य से ज्यादा जातीय वोट बैंक के गणित में उलझ जाते हैं।
नेताओं को पता है कि बंटा हुआ समाज ज्यादा आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। यही कारण है कि जातीय संगठनों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है। कई बार ऐसे संगठन सामाजिक मंच कम और राजनीतिक प्रयोगशाला ज्यादा दिखाई देते हैं।
स्थिति यह हो गई है कि आज व्यक्ति की पहचान उसकी योग्यता, विचार या कर्म से पहले उसकी जाति से तय की जाने लगी है। यह लोकतंत्र और आधुनिक समाज दोनों के लिए गंभीर संकेत है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि जातीय सोच अब नई पीढ़ी तक गहराई से पहुंच रही है। सोशल मीडिया ने इसे और तेज कर दिया है। युवा वर्ग, जो तकनीक और आधुनिकता के दौर में आगे बढ़ सकता था, वह भी जातीय श्रेष्ठता और सामाजिक प्रतिस्पर्धा की बहसों में उलझता जा रहा है।
विद्यालयों और विश्वविद्यालयों तक में जातीय ध्रुवीकरण दिखाई देने लगा है। इससे सामाजिक सौहार्द प्रभावित हो रहा है और सामूहिक राष्ट्रीय चेतना कमजोर पड़ रही है।
समाधान जातीय पहचान मिटाने में नहीं, बल्कि उसे सामाजिक समरसता के साथ संतुलित करने में है। अपनी परंपरा, इतिहास और समाज पर गर्व होना स्वाभाविक है, लेकिन वह गर्व दूसरों के प्रति घृणा या श्रेष्ठता में नहीं बदलना चाहिए।
जरूरत इस बात की है कि संगठन समाज को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और नैतिक मूल्यों की दिशा में आगे बढ़ाएं, न कि टकराव और विभाजन की राजनीति का हिस्सा बनें। राजनीतिक दलों को भी जातीय ध्रुवीकरण के बजाय विकास आधारित राजनीति को बढ़ावा देना होगा।
भारत की ताकत उसकी विविधता में एकता रही है। यदि समाज लगातार जातियों, उपजातियों और छोटे-छोटे समूहों में बंटता गया, तो सामाजिक ताना-बाना कमजोर होता जाएगा। जातीय संगठन यदि सामाजिक उत्थान का माध्यम बनें तो स्वागत योग्य हैं, लेकिन यदि वे समाज को खंड-खंड करने लगें, तो यह आने वाले समय के लिए गंभीर चेतावनी है।
देश को ऐसी चेतना की जरूरत है जहां व्यक्ति की पहचान उसकी जाति नहीं, बल्कि उसका चरित्र, कर्म और योगदान बने। तभी वास्तविक सामाजिक समरसता और मजबूत राष्ट्र का निर्माण संभव होगा।
लेखक पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर के राजनैतिक सलाहकार रहे हैं।
जातीय संगठन और खंड-खंड होता समाज: एकता की तलाश में बंटता भारत


