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Sunday, May 10, 2026

लघुकथा: ममत्व की छांव

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(आर . सूर्य कुमारी -विनायक फीचर्स)

बात उन दिनों की है जब में कालेज में पढ़ा करती थी । बी . ए . फाइनल की परीक्षा थी । सेंटर कॉलेज से काफी दूरी पर दिया गया था । ट्रेन से एक घंटे का रास्ता था । स्टेशन पर उतरकर रिक्शे पर लगभग पंद्रह – बीस मिनट का रास्ता था । उस स्टेशन का नाम था पुरूलिया , जो पश्चिम बंगाल में आता था ।
दो परीक्षाएं तो मैंने दे दी , उसके बाद एक दिन परीक्षा हाल में ही तबियत बिगड़ गई । मैंने किसी तरह सम्हाला और पेपर पूरा किया । फिर स्टेशन के पास की रेलवे डिस्पेंसरी से मैंने दवाइयां दी । एक परिचित चिकित्सा कर्मी के घर में विश्राम लिया । बताया गया कि अत्यंत श्रम के कारण , नींद पूरी न होने के कारण तबियत बिगड़ी है । जब पांच छः उल्टियां भी हो गईं तो डिहाइड्रेशन हो गया है ।
और इस पूरे जद्दोजहद के पीछे मेरी ट्रेन कब छूट गयी , पता ही नहीं चला । अब बाद वाली ट्रेन मैंने पकड़ी । गाड़ी के अंदर लाइट भी नहीं थी । किसी तरह यात्रा शुरू हुई, हम आद्रा में रहते थे , और ट्रेन रात आठ बजे आद्रा पहुंची ।
मैं अंदर ही अंदर कुढ़ रही थी । एक तो बाद वाले पेपर की तैयारी करनी थी । मन में आ रहा था कि आजकल किसी से उम्मीद नहीं करनी चाहिए । भैया अपनी पढ़ाई में व्यस्त । माता जी पर घर की देख – रेख का पूरा दायित्व था । कौन आएगा मुझे लेने । मैं मर भी जाऊंगी , तो भी कोई पूछने वाला नहीं । उस समय शाम छः सात बजे के बाद लड़कियां अकेली आना जाना नहीं करती थीं । कोई बंदिश तो नहीं थी , मगर वे स्वयं ही घबराती थीं ।
और तमाम अंतर्द्वंद्व के बाद जब मैं गाड़ी से उतरी और निकासी की ओर गई , मैंने वहां माता जी को इंतजार करते पाया । मेरा मन खुशी से भर गया और एक समाधान भी मिल गया कि किसी से उम्मीद की जाए या नहीं माता-पिता जब तक हैं , बच्चों को नाउम्मीद नहीं होना चाहिए । (विनायक फीचर्स)

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