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Sunday, May 3, 2026

सरकारी खरीद के सख्त मानकों में फंसा किसान

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आलू औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर

फर्रुखाबाद। जनपद में पिछले पांच दिनों से शुरू हुई आलू की सरकारी खरीद किसानों के लिए राहत का जरिया बनने के बजाय नई परेशानी खड़ी कर रही है। सख्त गुणवत्ता मानकों के चलते किसान सरकारी क्रय केंद्रों पर अपना आलू बेचने में असफल हो रहे हैं, जिससे उन्हें 650.09 रुपये प्रति क्विंटल के निर्धारित समर्थन मूल्य का लाभ नहीं मिल पा रहा है। मजबूरन किसान अपनी उपज को मंडियों में बेहद कम दाम पर बेचने को विवश हैं, जहां कीमतें 150 से 400 रुपये प्रति क्विंटल तक सिमट गई हैं।
दरअसल, केंद्र सरकार द्वारा आलू की गिरती कीमतों से किसानों को राहत देने के उद्देश्य से हाफेड के माध्यम से फर्रुखाबाद जनपद में दो क्रय केंद्र स्वीकृत किए गए थे। इनमें से एक क्रय केंद्र शहर स्थित सातनपुर मंडी, फर्रुखाबाद में बीते मंगलवार को शुरू किया गया। लेकिन केंद्र खुलने के पांच दिन बाद भी एक किलो आलू की भी खरीद नहीं हो सकी है, जो व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
कई किसान अपने आलू के नमूने लेकर केंद्र पर पहुंचे, लेकिन तेज धूप के कारण आलू के ढीले पड़ जाने से सभी नमूने गुणवत्ता परीक्षण में फेल हो गए। इससे किसानों में निराशा और आक्रोश दोनों देखने को मिला। किसानों का कहना है कि खेत से निकला आलू कुछ समय में ही प्राकृतिक कारणों से प्रभावित हो जाता है, ऐसे में अत्यधिक कठोर मानक व्यावहारिक नहीं हैं।
कई किसानों ने केंद्र प्रभारी को ज्ञापन सौंपकर आलू खरीद के मानकों में ढील देने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि मानकों में व्यावहारिक संशोधन नहीं किया गया तो सरकारी खरीद केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी और किसानों को इसका कोई वास्तविक लाभ नहीं मिल पाएगा।
इधर पूर्व मे जिलाधिकारी अंकुर लाठर ने भी सातनपुर मंडी स्थित क्रय केंद्र का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को खरीद प्रक्रिया को सुचारू बनाने के निर्देश दिए, लेकिन गुणवत्ता मानकों की बाधा अभी भी बनी हुई है।
गौरतलब है कि इस समय बाजार में मांग कम होने और कीमतों में भारी गिरावट के कारण किसान आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे में सरकारी खरीद से उन्हें बड़ी उम्मीद थी, जो फिलहाल पूरी होती नजर नहीं आ रही है।
किसानों का कहना है कि यदि जल्द ही मानकों में बदलाव कर खरीद प्रक्रिया को सरल नहीं बनाया गया, तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। प्रशासन और सरकार से अब किसानों को राहत भरे फैसले का इंतजार है, ताकि उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल सके।

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