
शरद कटियार
विश्व स्वतंत्रता दिवस नाम में जितना गौरव है, आज की हकीकत उतनी ही बेचैन करने वाली है। दुनिया झंडे लहराकर आज़ादी का जश्न मना रही है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि आज़ादी का दायरा लगातार सिमट रहा है। लोकतंत्र, जिसे जनता की ताकत कहा जाता था, अब कई देशों में सत्ता के नियंत्रण का औजार बनता नजर आ रहा है।
इतिहास में जब भी आज़ादी की बात होती है, तो भारत का इंडियन इंडिपेंडेंस मूवमेंट एक मिसाल बनकर सामने आता है जहां लाखों लोगों ने बलिदान देकर स्वतंत्रता हासिल की। लेकिन आज वही आज़ादी नए खतरों के घेरे में है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले दुश्मन सामने था, अब वह सिस्टम के भीतर छुपा है।
आंकड़े इस सच्चाई को और भी स्पष्ट कर देते हैं। दुनिया की केवल 7.8% आबादी ही पूर्ण लोकतंत्र में जी रही है, जबकि करीब 39% लोग तानाशाही शासन के अधीन हैं। 167 देशों में से केवल 24 देश ही ऐसे हैं जिन्हें पूरी तरह लोकतांत्रिक माना जाता है। पिछले दो दशकों में हालात लगातार बिगड़े हैं—आज दुनिया की सिर्फ 21% आबादी ही “पूरी तरह स्वतंत्र” देशों में रह गई है, जो 2005 में लगभग 46% थी।
सबसे बड़ा संकट अभिव्यक्ति की आज़ादी पर है। प्रेस, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, आज खुद दबाव में है। दुनिया के आधे से ज्यादा देशों में मीडिया की स्थिति खराब या गंभीर है और केवल 1% आबादी ही ऐसे देशों में रहती है जहां प्रेस पूरी तरह स्वतंत्र है। इसका सीधा मतलब है सच बोलना अब सबसे बड़ा जोखिम बन चुका है।
भारत की स्थिति भी इस वैश्विक परिदृश्य से अलग नहीं है। लोकतंत्र मजबूत है, संस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय आकलनों में भारत को “आंशिक स्वतंत्र” श्रेणी में रखा गया है। यह संकेत देता है कि अभिव्यक्ति, मीडिया और डिजिटल स्वतंत्रता के क्षेत्र में चुनौतियां बढ़ रही हैं।
नई सदी में गुलामी का रूप बदल गया है। अब जंजीरें दिखाई नहीं देतीं, लेकिन नियंत्रण पहले से ज्यादा मजबूत हो गया है। इंटरनेट शटडाउन, डेटा निगरानी, फेक न्यूज और एल्गोरिद्म के जरिए सोच को प्रभावित करना—यह सब मिलकर एक अदृश्य सिस्टम तैयार कर रहे हैं, जो इंसान की स्वतंत्रता को सीमित कर रहा है।
सबसे बड़ा सवाल आज की युवा पीढ़ी से है। क्या हम सिर्फ सोशल मीडिया पर आज़ादी का जश्न मनाएंगे, या उसे बचाने की जिम्मेदारी भी निभाएंगे? क्योंकि इतिहास गवाह है जब युवा खड़ा होता है, तो बदलाव आता है, और जब युवा चुप रहता है, तो लोकतंत्र कमजोर पड़ जाता है।
विश्व स्वतंत्रता दिवस हमें यह याद दिलाता है कि आज़ादी कोई एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि हर दिन की जिम्मेदारी है। यह सिर्फ अधिकार नहीं, बल्कि संघर्ष और जागरूकता का दूसरा नाम है।
आज हालात साफ इशारा कर रहे हैं आज़ादी खतरे में है। अब फैसला हमें करना है कि हम खामोश रहेंगे या अपने अधिकारों की रक्षा के लिए खड़े होंगे।


