लखनऊ
राजधानी में हाल ही में प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची ने लोकतंत्र की एक अनोखी और प्रेरणादायक तस्वीर सामने रखी है। आंकड़ों के अनुसार जिले में 100 वर्ष से अधिक आयु के कुल 180 मतदाता दर्ज हैं, जिन्हें लोकतंत्र के ‘बुजुर्ग प्रहरी’ कहा जा रहा है। इन शतायु मतदाताओं की सक्रिय मौजूदगी न केवल चुनावी प्रक्रिया की निरंतरता को दर्शाती है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी गहरी आस्था को भी उजागर करती है।
मतदाता सूची के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि इन बुजुर्ग मतदाताओं की संख्या शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण और बाहरी विधानसभा क्षेत्रों में अधिक है। सबसे अधिक 54 शतायु मतदाता बीकेटी क्षेत्र में दर्ज किए गए हैं। इसके बाद मलिहाबाद में 35, सरोजनीनगर में 30 और मोहनलालगंज में 17 मतदाता 100 वर्ष से अधिक उम्र के हैं। ये सभी क्षेत्र ग्रामीण या अर्ध-शहरी माने जाते हैं, जहां आज भी पारंपरिक जीवनशैली, सामुदायिक जुड़ाव और पारिवारिक संरचना मजबूत बनी हुई है।
इसके विपरीत शहर के प्रमुख विधानसभा क्षेत्रों में इन बुजुर्ग मतदाताओं की संख्या अपेक्षाकृत कम है। लखनऊ पश्चिम में केवल चार, कैंट क्षेत्र में छह और सेंट्रल क्षेत्र में सात शतायु मतदाता ही दर्ज हैं। लखनऊ उत्तर और पूर्व में भी यह संख्या क्रमशः 12 और 15 तक सीमित है। विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी जीवनशैली में तेजी से आए बदलाव, एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति और रोजगार के लिए पलायन जैसे कारणों से शहरों में बुजुर्ग आबादी का अनुपात घटा है।
हालांकि संख्या भले ही सीमित हो, लेकिन इन बुजुर्ग मतदाताओं की भूमिका लोकतंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। एक सदी से अधिक जीवन का अनुभव रखने वाले ये मतदाता कई चुनावों और राजनीतिक बदलावों के साक्षी रहे हैं। उनकी भागीदारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूती प्रदान करती है और युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनती है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि ऐसे मतदाताओं की उपस्थिति यह दर्शाती है कि लोकतंत्र केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चलती आ रही एक मजबूत परंपरा है, जिसे इन बुजुर्ग प्रहरियों ने अपने अनुभव और भागीदारी से जीवित रखा है।


