बदायूं
सहसवान-रामपुर संगीत घराने की परंपरा ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को एक नई ऊंचाई दी है। इस घराने से जुड़े कलाकारों ने न केवल देश में बल्कि पूरी दुनिया में अपनी कला का परचम लहराया है। इसी परंपरा से जुड़ी संगीत साधना ने कई बड़े नामों को भी प्रभावित किया।
बॉलीवुड की मशहूर गायिका आशा भोसले का संबंध भी इसी संगीत परंपरा से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि उन्होंने सहसवान घराने के उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान से शास्त्रीय संगीत की तालीम ली थी। हालांकि आशा भोसले कभी बदायूं नहीं आईं, लेकिन उनकी संगीत यात्रा पर इस घराने की गहरी छाप मानी जाती है।
उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान, जिन्हें भारतीय शास्त्रीय संगीत का स्तंभ माना जाता है, का निधन 2021 में मुंबई में हुआ था। उन्हें उनके योगदान के लिए पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च सम्मान मिले थे। उनके शिष्यों की सूची में आशा भोसले के साथ-साथ सोनू निगम, ए.आर. रहमान, लता मंगेशकर, हरिहरन, शान और गीता दत्त जैसे कई दिग्गज नाम शामिल हैं।
सहसवान घराने की यह संगीत परंपरा इतनी समृद्ध रही है कि इससे जुड़े कलाकारों को अब तक नौ पद्म पुरस्कार मिल चुके हैं। यह परंपरा भारतीय संगीत के इतिहास में एक मजबूत स्तंभ के रूप में देखी जाती है, जिसने नई पीढ़ी के गायकों को भी गहराई और शास्त्रीय आधार दिया है।
आशा भोसले के प्रसिद्ध गीत “झुमका गिरा रे, बरेली के बाज़ार में” ने बरेली शहर को देशभर में एक अलग पहचान दिलाई। फिल्म ‘मेरा साया’ में शामिल यह गीत आज भी लोगों की जुबान पर है और बरेली को ‘झुमका सिटी’ के रूप में जाना जाने लगा है।
बाद में इस गीत की लोकप्रियता को सम्मान देते हुए बरेली में 14 फीट ऊंचा झुमका भी स्थापित किया गया। इस तरह संगीत, परंपरा और लोकप्रिय संस्कृति ने मिलकर बरेली को एक नई सांस्कृतिक पहचान दी, जो आज भी लोगों के दिलों में जीवित है।


