नई दिल्ली/लखनऊ: बजट सत्र से पहले लोक सभा अध्यक्ष (Lok Sabha Speaker) ओम बिरला (Om Birla) ने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं एवं संसद सदस्यों से सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने में सहयोग देने की अपील की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सदन में नियोजित गतिरोध और लगातार व्यवधान देश के लोकतंत्र के लिए उचित नहीं हैं। जब सदन बाधित होता है, तो सबसे अधिक नुकसान उस आम नागरिक का होता है, जिसकी समस्याओं और अपेक्षाओं पर चर्चा होनी होती है।
लोक सभा अध्यक्ष ने कहा कि लोकतंत्र में Disruption नहीं, बल्कि Discussion और Dialogue की संस्कृति को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि जनता के प्रति जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही केवल चुनाव के समय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सतत दायित्व है, जिसे हर दिन निभाना चाहिए।
यह विचार लोक सभा अध्यक्ष ने उत्तर प्रदेश विधान भवन, लखनऊ में 19 से 21 जनवरी 2026 तक आयोजित 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। सम्मेलन के समापन अवसर पर उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री, राज्य सभा के माननीय उपसभापति, उत्तर प्रदेश विधान परिषद के माननीय सभापति तथा उत्तर प्रदेश विधान सभा के माननीय अध्यक्ष ने भी अपने विचार रखे।
राष्ट्रीय विधायी सूचकांक बनेगा
अपने समापन भाषण में श्री बिरला ने घोषणा की कि देश की विधायिकाओं को अधिक प्रभावी, उत्तरदायी और जनोपयोगी बनाने के उद्देश्य से एक ‘राष्ट्रीय विधायी सूचकांक’ तैयार किया जाएगा। इसके लिए एक समिति का गठन भी किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस सूचकांक के माध्यम से देशभर के विधानमंडलों के कार्य निष्पादन का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन संभव होगा और विधायिकाओं के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा।
लोक सभा अध्यक्ष ने जोर देते हुए कहा कि सभी राज्य विधान मंडलों में प्रति वर्ष कम से कम 30 बैठकें सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सदन जितना अधिक चलेगा, उतनी ही अधिक गंभीर, सार्थक और परिणामोन्मुख चर्चाएं संभव होंगी। इससे विधानमंडल जनता की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं की सशक्त अभिव्यक्ति का प्रभावी मंच बन सकेंगे।
श्री बिरला ने कहा कि पीठासीन अधिकारी केवल सदन की कार्यवाही संचालित करने वाले नहीं होते, बल्कि वे संविधान के प्रहरी और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के संरक्षक होते हैं। उनकी निष्पक्षता, संवेदनशीलता और दृढ़ता ही सदन की गरिमा और दिशा तय करती है।
छह महत्वपूर्ण संकल्प पारित
86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में कुल छह महत्वपूर्ण संकल्प पारित किए गए। इनमें वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य में योगदान, राज्य विधान मंडलों की न्यूनतम 30 बैठकें सुनिश्चित करना, विधायी कार्यों में प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देना, जनप्रतिनिधियों की डिजिटल क्षमता वृद्धि, शोध एवं अनुसंधान सहयोग को सुदृढ़ करना तथा राष्ट्रीय विधायी सूचकांक के निर्माण जैसे विषय शामिल रहे।
तीन दिवसीय इस सम्मेलन में देश के 24 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों से 36 पीठासीन अधिकारियों ने सहभागिता की। सहभागिता की दृष्टि से यह अब तक का सबसे बड़ा अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन रहा।


