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Monday, February 16, 2026

निजी अस्पतालों और आशा बहुओं के मुद्दे पर सदन में तीखी बहस

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा के सत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर जोरदार बहस देखने को मिली। समाजवादी पार्टी के विधायक अतुल प्रधान ने सरकार से सवाल करते हुए कहा कि प्रदेश के कई सरकारी अस्पतालों में न तो पर्याप्त दवाएं उपलब्ध हैं और न ही जरूरी जांच की समुचित व्यवस्था है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई स्थानों पर गर्भवती महिलाएं अस्पतालों की फर्श पर प्रसव करने को मजबूर होती हैं, जिसके चलते मरीज मजबूरन निजी अस्पतालों का रुख करते हैं।

विधायक ने पूछा कि निजी अस्पतालों के खिलाफ मिलने वाली शिकायतों पर क्या कभी ठोस कार्रवाई हुई है? साथ ही क्या सरकार निजी अस्पतालों में ली जाने वाली फीस और जांच शुल्क को नियंत्रित करने पर कोई विचार कर रही है, ताकि आम जनता को राहत मिल सके।

इस पर स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक ने सदन को बताया कि निजी अस्पतालों के संबंध में लगभग 500 शिकायतें प्राप्त हुई हैं। जांच के बाद 178 अस्पतालों के लाइसेंस निरस्त किए गए हैं, जबकि 280 अस्पतालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई है, जो निर्धारित मानकों के विपरीत संचालित हो रहे थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो लोग निजी अस्पतालों को निशाना बनाकर अवैध वसूली करते हैं, उनके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जाएगी।

बहस की अगली कड़ी में सपा विधायक राकेश वर्मा ने आशा बहुओं के मुद्दे को उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि आशा कार्यकर्ताओं से टीबी, कुष्ठ निवारण और कुपोषण जैसे महत्वपूर्ण सरकारी अभियान चलवाए जाते हैं, लेकिन उन्हें राज्य कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया गया है। उनका मानदेय भी नहीं बढ़ाया गया, जो “समान काम समान वेतन” के सिद्धांत का उल्लंघन है।

इस पर स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक ने जवाब देते हुए कहा कि वर्तमान सरकार सपा शासनकाल की तुलना में दोगुना मानदेय दे रही है। उन्होंने बताया कि पूर्व में जहां एक हजार रुपये दिए जाते थे, वहीं अब दो हजार रुपये मानदेय दिया जा रहा है। साथ ही आशा बहुओं को मातृत्व अवकाश की सुविधा भी प्रदान की जा रही है। मंत्री ने कहा कि गर्भवती महिला को अस्पताल लाने पर आशा बहुओं के ठहरने की व्यवस्था सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में की गई है और भविष्य में उनकी सुविधाओं को और बेहतर बनाने पर सरकार ध्यान देगी।

सदन में हुई इस बहस के बाद प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था, निजी अस्पतालों की निगरानी और आशा कार्यकर्ताओं की स्थिति को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है।

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