शरद कटियार
लखनऊ| उत्तर प्रदेश में 2027 की विधानसभा चुनावी लड़ाई अब पूरी तरह आकार ले चुकी है। करीब 27 करोड़ आबादी वाले इस प्रदेश में सत्ता की जंग केवल सरकार बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तय करेगी कि आने वाले वर्षों में देश की राजनीति किस दिशा में जाएगी। प्रदेश में 403 विधानसभा सीटें हैं और सत्ता के लिए 202 सीटों का बहुमत जरूरी है। यूपी में करीब 8.5 से 9 करोड़ मतदाता हैं, जिनका फैसला न सिर्फ लखनऊ की कुर्सी तय करता है, बल्कि दिल्ली की सत्ता की दिशा भी प्रभावित करता है।
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन ने 255 से अधिक सीटें जीतकर दोबारा सरकार बनाई थी, जबकि समाजवादी पार्टी गठबंधन को 125 सीटें मिली थीं। बसपा और कांग्रेस क्रमशः 1 और 2 सीटों पर सिमट गई थीं। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद बदले राजनीतिक संकेतों ने यह साफ कर दिया है कि 2027 की लड़ाई पहले जैसी आसान नहीं होगी।
अगर यूपी के जातीय समीकरण की बात करें तो यहां 17–19 प्रतिशत सवर्ण मतदाता हैं, जिन्हें भाजपा का कोर वोट बैंक माना जाता है। इनमें लगभग 10 प्रतिशत ब्राह्मण, 5 प्रतिशत राजपूत, 2 प्रतिशत वैश्य, 2 प्रतिशत भूमिहार और अन्य सवर्ण जातियां शामिल हैं।
इसके साथ ही यूपी की राजनीति में सबसे निर्णायक भूमिका ओबीसी वोट बैंक की मानी जाती है, जो 42–43 प्रतिशत के आसपास है। ओबीसी वर्ग जिस ओर झुकता है, उसकी जीत लगभग तय मानी जाती है। पिछले दो चुनावों में बड़ी संख्या में ओबीसी मतदाताओं ने भाजपा का साथ दिया, खासकर गैर-यादव ओबीसी, जिससे भाजपा को बड़ी जीत मिली।
ओबीसी वर्ग के भीतर भी अलग-अलग जातियों का अपना प्रभाव है—
लगभग 10 प्रतिशत यादव, 5 प्रतिशत कुर्मी, 5 प्रतिशत मौर्य, 4 प्रतिशत जाट, 4 प्रतिशत राजभर, 3 प्रतिशत लोधी, 2 प्रतिशत गुर्जर, 4 प्रतिशत निषाद, केवट, मल्लाह और करीब 6 प्रतिशत अन्य पिछड़ी जातियां शामिल हैं। यादव मतदाता लगभग पूरी तरह समाजवादी पार्टी के साथ खड़े दिखाई देते हैं, जबकि गैर-यादव ओबीसी का बड़ा हिस्सा अब भी भाजपा के साथ नजर आता है।
इसके अलावा यूपी में दलित मतदाता करीब 21 प्रतिशत हैं। इनमें 11 प्रतिशत जाटव, 3.5 प्रतिशत पासी, 1 प्रतिशत कोरी, 1 प्रतिशत धोबी और 4.5 प्रतिशत खटिक, धनगर, बाल्मीकि व अन्य दलित जातियां शामिल हैं। दलित वोट बैंक पर अब भी बसपा का परंपरागत प्रभाव माना जाता है, हालांकि पिछले कुछ चुनावों में इसमें बिखराव भी देखा गया है।
वहीं मुस्लिम मतदाता करीब 19 प्रतिशत हैं, जो कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं और आमतौर पर भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर मतदान करते हैं।
राजनीतिक मोर्चे पर योगी आदित्यनाथ सरकार अपने लगभग 9 वर्षों के कार्यकाल को आधार बनाकर कानून-व्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर, धार्मिक पहचान और सख्त शासन को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। दूसरी ओर अखिलेश यादव खुद को मुख्य विपक्षी चेहरे के तौर पर स्थापित कर चुके हैं और पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) की राजनीति को धार देने में जुटे हैं। 2027 की लड़ाई में योगी बनाम अखिलेश की सीधी टक्कर अब साफ दिखाई देने लगी है।
कांग्रेस और बसपा भी चुनावी मैदान में हैं, लेकिन फिलहाल उनकी भूमिका सत्ता हासिल करने से ज्यादा समीकरण बिगाड़ने या बनाने वाली नजर आ रही है। कांग्रेस संगठन को फिर से खड़ा करने की कोशिश में है, जबकि बसपा अपने पारंपरिक दलित वोट बैंक को दोबारा जोड़ने के संघर्ष में है।
प्रदेश की जनसंख्या संरचना इस लड़ाई को और अहम बनाती है। यूपी में करीब 60 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है और लगभग 77 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। ऐसे में बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की आय, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे जनता के लिए सबसे बड़े सवाल बने हुए हैं।
कुल मिलाकर, सत्ताइस के सत्ताधीश की यह जंग सिर्फ सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं है। यह 27 करोड़ लोगों के भविष्य, 403 सीटों के गणित और करोड़ों मतदाताओं की उम्मीदों का संघर्ष है। 2027 का फैसला न केवल उत्तर प्रदेश की सरकार तय करेगा, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव की राजनीतिक दिशा भी काफी हद तक इसी पर निर्भर करेगी।भा चुनाव की राजनीतिक दिशा भी काफी हद तक इसी से तय होगी।

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