प्रयागराज| इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि किसी आपराधिक मामले में यदि कोई व्यक्ति न तो शिकायतकर्ता है और न ही पीड़ित, तो उसे उस मामले में आरोपी की जमानत रद्द करने की मांग करने का अधिकार नहीं है। इसी टिप्पणी के साथ न्यायालय ने निखिल कुमार द्वारा दायर जमानत रद्द करने की अर्जी को खारिज करते हुए उस पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।
यह आदेश न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की एकल पीठ ने गाजियाबाद के साहिबाबाद थाना क्षेत्र निवासी निखिल कुमार की याचिका पर दिया। निखिल कुमार ने हत्या के एक पुराने मामले में आरोपी अमीर को ट्रायल कोर्ट से मिली जमानत रद्द करने की मांग करते हुए दावा किया था कि 2017 में उसके पिता की हत्या अमीर एवं अन्य आरोपियों ने की थी, और यदि आरोपी को दोबारा जमानत मिलती है तो उसकी जान को खतरा हो सकता है। इसलिए 2012 के मामले में मिली जमानत भी रद्द की जानी चाहिए।
प्रतिवादी पक्ष के अधिवक्ता ने दलील दी कि याची 2012 के मूल मामले में न तो गवाह है, न पीड़ित और न ही शिकायतकर्ता। यह अर्जी न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है और व्यक्तिगत प्रतिशोध के चलते दाखिल की गई है। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि याची पूरी तरह “बाहरी व्यक्ति” है और उसके पास किसी पुरानी जमानत को रद्द कराने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी तुच्छ याचिकाएं न्यायिक कार्य में बाधा पैदा करती हैं और अधिवक्ताओं का भी यह दायित्व है कि वे अपने मुवक्किलों को अनावश्यक मुकदमेबाजी से रोकें। अंततः हाईकोर्ट ने निखिल कुमार की याचिका खारिज करते हुए 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया।



