लखनऊ। प्रदेश में जनधन योजना के तहत खोले गए खातों को लेकर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। प्रदेश के आठ जिलों में करीब 20 लाख जनधन खातों में एक भी रुपया जमा नहीं है। लंबे समय से निष्क्रिय पड़े इन खातों को अब बैंकों ने संदिग्ध श्रेणी में डालना शुरू कर दिया है, जिससे बैंकिंग तंत्र में चिंता बढ़ गई है।
बैंकों द्वारा राज्य सरकार को भेजी गई रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में कुल जनधन खातों की संख्या लगभग 10.22 करोड़ है, जो देश के कुल खातों का करीब 18 प्रतिशत है। इनमें से बड़ी संख्या महिलाओं के खातों की है। हालांकि आठ जिलों—आगरा, आजमगढ़, बिजनौर, गाजीपुर, जौनपुर, कुशीनगर, मेरठ और सहारनपुर—में बड़ी संख्या में खाते पूरी तरह खाली पाए गए हैं।
रिपोर्ट बताती है कि इन आठ जिलों में कुल 1.60 करोड़ से अधिक जनधन खाते हैं, जिनमें से लगभग 20 लाख खातों का बैलेंस शून्य है। जबकि शेष खातों में करीब 7800 करोड़ रुपये जमा हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर निष्क्रिय खाते बैंकिंग व्यवस्था के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं।
इन खातों को संचालित और सक्रिय बनाए रखने में बैंकों को भारी खर्च उठाना पड़ रहा है। एक खाते पर सालाना करीब 3500 रुपये तक का खर्च आता है, जिसमें आईटी सिस्टम, कर्मचारियों का वेतन और शाखा संचालन शामिल है। इस हिसाब से सिर्फ इन 20 लाख निष्क्रिय खातों को बनाए रखने में ही बैंकों पर करीब 700 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
बैंकों ने इन खातों को ‘मनी म्यूल’ के रूप में संदिग्ध श्रेणी में डालना शुरू कर दिया है। दरअसल, ऐसे खाली या लंबे समय से निष्क्रिय खाते साइबर अपराधियों के लिए आसान माध्यम बन सकते हैं। इनमें अचानक बड़ी रकम जमा कर उसे तुरंत निकाल लेने जैसे मामलों के चलते इन खातों के दुरुपयोग की आशंका रहती है।
बैंक अधिकारियों का कहना है कि कई खातों में केवाईसी अपडेट नहीं है, जिससे इनका गलत इस्तेमाल होने का खतरा और बढ़ जाता है। फर्जी दस्तावेजों के सहारे ऐसे खातों को सक्रिय कर साइबर ठगी या अवैध लेन-देन के लिए उपयोग किया जा सकता है।


