इंदौर। मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पेयजल ने भीषण त्रासदी को जन्म दे दिया है। अब तक 13 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि बड़ी संख्या में लोग अब भी अस्पतालों में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। घटना के कई दिन बीत जाने के बावजूद हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हो सके हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि डेढ़ से दो साल से नाली की लाइन पीने के पानी की पाइपलाइन से जुड़ी हुई थी। इस गंभीर समस्या की कई बार शिकायत की गई, लेकिन न तो नगर निगम ने ध्यान दिया और न ही प्रशासन ने समय रहते कोई ठोस कदम उठाया। नतीजा यह हुआ कि दूषित पानी लोगों के घरों तक पहुंचता रहा और अब इसकी कीमत मासूम जानों को गंवाकर चुकानी पड़ रही है।
प्रशासनिक चुप्पी पर सवाल
घटना के बाद भी नगर आयुक्त और जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई बड़ी या ठोस कार्रवाई न होने से जनता में भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई होती, तो यह हादसा टाला जा सकता था। इलाके में इस वक्त गुस्सा और डर दोनों का माहौल है।
सीएम मोहन यादव पर बढ़ता दबाव
इस पूरे मामले को लेकर अब सीधे तौर पर मोहन यादव सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। विपक्ष के साथ-साथ आम नागरिक भी पूछ रहे हैं कि इतने बड़े जनहानि कांड के बाद भी सरकार निर्णायक कदम क्यों नहीं उठा पा रही है।
क्या कैलाश विजयवर्गीय फैक्टर बना बाधा?
इंदौर की राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि स्थानीय राजनीति में कैलाश विजयवर्गीय के मजबूत प्रभुत्व के चलते मुख्यमंत्री कोई बड़ा प्रशासनिक या राजनीतिक एक्शन लेने से कतरा रहे हैं। हालांकि सरकार की ओर से इस पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन यह सवाल अब सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन चुका है।
भागीरथपुरा के लोगों की मांग साफ है फिलहाल, इंदौर जैसे स्मार्ट सिटी के दावे इस हादसे के बाद कठघरे में खड़े नजर आ रहे हैं, और सवाल यही है कि क्या सरकार जिम्मेदारी तय करेगी या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।





