प्रभात यादव
देश की वर्तमान राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ चुनावी रणनीति, जनभावनाएँ और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच लगातार खींचतान दिखाई दे रही है। सत्ता और विपक्ष दोनों ही अपने-अपने दावों के साथ जनता के सामने हैं, लेकिन आम नागरिक के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजनीति वास्तव में उसकी समस्याओं के समाधान की दिशा में आगे बढ़ रही है, या फिर यह केवल सत्ता-संघर्ष तक सीमित रह गई है।
आज की राजनीति केवल संसद या विधानसभाओं तक सीमित नहीं है। यह सड़कों, सामाजिक मंचों और जनआंदोलनों तक फैल चुकी है। बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और किसान जैसे मुद्दे बार-बार उठाए जाते हैं, लेकिन इन पर ठोस समाधान की अपेक्षा राजनीतिक बयानबाज़ी अधिक दिखाई देती है। यही कारण है कि जनता का एक बड़ा वर्ग राजनीतिक वादों पर भरोसा करने से पहले अब परिणाम देखना चाहता है।
वर्तमान समय में सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों को लेकर आक्रामक है। विकास योजनाओं, बुनियादी ढांचे और राष्ट्रीय सुरक्षा को अपनी राजनीति का केंद्र बनाकर वह जनता के बीच संदेश देने का प्रयास कर रहा है कि देश सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। वहीं विपक्ष सरकार को महंगाई, बेरोज़गारी और सामाजिक असंतोष जैसे मुद्दों पर घेरने की कोशिश कर रहा है। यह टकराव लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन चिंता तब पैदा होती है जब विचारों की जगह आरोप-प्रत्यारोप हावी हो जाते हैं।
एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि राजनीति में सामाजिक वर्गों और पहचान की भूमिका लगातार बढ़ रही है। जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण पहले से कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। अल्पकालिक चुनावी लाभ के लिए यदि समाज को विभाजित किया जाता है, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव लोकतांत्रिक एकता पर पड़ता है। राजनीति का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, न कि उसे बाँटना।
युवाओं की भूमिका वर्तमान राजनीति में निर्णायक बनती जा रही है। देश की बड़ी आबादी युवा है, जो जागरूक भी है और सवाल पूछने का साहस भी रखती है। लेकिन यह भी सत्य है कि युवाओं का एक हिस्सा राजनीति से निराश होकर उससे दूरी बना रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो लोकतंत्र कमजोर होगा। आवश्यकता इस बात की है कि युवा केवल मतदाता बनकर न रह जाए, बल्कि सजग नागरिक के रूप में राजनीतिक प्रक्रियाओं में भागीदारी करे।
मीडिया और सामाजिक संवाद के मंचों ने राजनीति को अधिक पारदर्शी बनाया है, लेकिन इसके साथ ही अफवाहों और अधूरी सूचनाओं का खतरा भी बढ़ा है। वर्तमान राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि सत्य और भ्रम के बीच जनता सही निर्णय कैसे ले। इस स्थिति में राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे तथ्य और नीति के आधार पर संवाद करें।
आज की राजनीति का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह जनहित को कितनी प्राथमिकता देती है। यदि सत्ता केवल चुनाव जीतने का साधन बनकर रह गई, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होगी। लेकिन यदि राजनीति जनसमस्याओं के समाधान, पारदर्शिता और जवाबदेही को अपना मूल मंत्र बना ले, तो यही राजनीति राष्ट्र को सशक्त बनाने का माध्यम बन सकती है।
निष्कर्षतः, वर्तमान राजनीति एक परीक्षा के दौर से गुजर रही है। यह परीक्षा सत्ता और विपक्ष दोनों की है, लेकिन उससे भी अधिक यह परीक्षा लोकतंत्र की है। जनता अब केवल वादे नहीं, बल्कि कार्य और परिणाम देखना चाहती है। जो राजनीति इस भावना को समझेगी, वही भविष्य की राजनीति की दिशा तय करेगी।
वर्तमान राजनीति : जनविश्वास, चुनावी रणनीति और लोकतंत्र की परीक्षा


