नई दिल्ली। जाति जनगणना के मुद्दे को लेकर अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के वरिष्ठ राष्ट्रीय महामंत्री राघवेन्द्र सिंह राजू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुला पत्र लिखकर कड़ा ऐतराज जताया है। पत्र में जाति जनगणना को सामाजिक सच्चाई से परे बताते हुए इसे एक सुनियोजित राजनीतिक प्रयोग करार दिया गया है। पत्र में कहा गया है कि सनातन परंपरा में समाज को चार वर्णों—क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र—में विभाजित किया गया था, लेकिन प्रत्येक वर्ण के भीतर अनेक जातियां हैं, जिनमें आपसी बेटी-व्यवहार, रहन-सहन, बोली, पहनावा और खान-पान में स्पष्ट अंतर है। इसके बावजूद राजनीतिक लाभ के लिए विभिन्न जातियों को एक नाम के अंतर्गत समाहित कर दिया गया।
पत्र में विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि अहीर, यादव और ग्वाला जैसी अलग-अलग जातियों को राजनीतिक उद्देश्य से “यादव” नाम के अंतर्गत जोड़ दिया गया। आरोप लगाया गया है कि इसी जातीय समीकरण के जरिए सत्ता हासिल की गई और जातीय आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ की गई।
राघवेन्द्र सिंह राजू ने बिहार की जाति जनगणना पर सवाल उठाते हुए कहा कि वर्ष 1931 में जिन यादवों की संख्या लगभग 6 प्रतिशत थी, वह हालिया गणना में 14 प्रतिशत दर्शाई गई, जो तथ्यात्मक रूप से संदिग्ध है। उन्होंने दावा किया कि ब्राह्मण और राजपूत जैसी जातियां, जिनकी आबादी 12–13 प्रतिशत के बीच रही है, उन्हें 5 प्रतिशत के आसपास दिखाना वास्तविकता से परे है।
झूठे आंकड़ों पर कार्रवाई की मांग
खुले पत्र में सवाल उठाया गया कि जब झूठा जाति प्रमाण पत्र बनवाकर नौकरी करने, न्यायालय में झूठ बोलने या फर्जी मुकदमा दर्ज कराने पर सजा का प्रावधान है, तो फिर जाति के नाम पर झूठे आंकड़े प्रस्तुत कर समाज को बांटने पर कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए।
पत्र में केंद्र सरकार से “बछड़ा प्रवृत्ति” छोड़कर “शेर प्रवृत्ति” से शासन करने की अपील की गई है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि जाति आधारित राजनीति को समय रहते नहीं रोका गया, तो विपक्षी गठबंधन देश को जातीय संघर्ष की ओर धकेल सकता है, जिसकी जिम्मेदारी सरकार पर आएगी।
अंत में लेखक ने कटु सत्य लिखने के लिए क्षमा मांगते हुए देश की एकता, सामाजिक समरसता और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की अपील की है।

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